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Showing posts from September, 2025

वक्त का खेल

 ✍ लघु कथा           वक्त का खेल अरुण एक साधारण युवक था। उसका जीवन उतार‑चढ़ाव से भरा था। कभी व्यापार में सफलता मिलती तो वह खुद को सबसे बड़ा समझ बैठता, और कभी किसी नुकसान या असफलता से घिर जाता तो दिनभर उदास बैठा रहता। उसके मित्र उसे समझाते—“इतना मत सोचो, जीवन में सब चलता है”—पर अरुण की चिंता कम नहीं होती। एक दिन भारी नुकसान के बाद वह शहर के बाहर बने पुराने मंदिर में जा बैठा। वहाँ एक साधु बैठे थे—आचार्य निखिल। वे शांत भाव से जप कर रहे थे। अरुण उनके पास गया और बोला, “गुरुजी! सबकुछ हाथ से निकल रहा है। कभी खुशी में मैं खुद को भूल जाता हूँ और कभी दुख में हार मान लेता हूँ। क्या करूँ?” आचार्य निखिल ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, हर्ष में मदमत्त और गम में मायूस कभी भी मत होना, क्योंकि वक्त बड़ा खिलाड़ी है जो प्रतिदिन अपनी चाल बदलता है। आज तू दुख में है, कल वही समय तुझे हँसी देगा। जीवन में कुछ रास्ते सब्र के होते हैं और कुछ सबक के। दोनों को अपनाना सीख ले।” अरुण चुप हो गया। साधु ने आगे कहा, “जब तू खुश हो, तब विनम्र रह। जब तू दुख में हो, तब धैर्य रख। समय को अपना काम कर...

शब्दों का साधक

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शब्दों का साधक अनिरुद्ध बाहर से एक साधारण युवक था—नौकरी, दोस्त और हँसी-मज़ाक से भरा जीवन। लेकिन भीतर उसका मन एक अलग ही दुनिया में जीता था। रात के सन्नाटे में जब सब सो जाते, वह अपनी डायरी खोल लेता। उसकी कलम से बहते शब्द कभी बचपन की यादें बनते, कभी समाज की कड़वी सच्चाइयाँ। वह चौंक उठता—“ये किसकी कहानी है?” और जैसे कोई अदृश्य स्वर कहता—“ये तुम्हारी नहीं, तुम्हारे आसपास की अनकही व्यथाएँ हैं। तुम तो केवल माध्यम हो।” धीरे-धीरे अनिरुद्ध समझ गया कि लेखक होना केवल लिखना नहीं, बल्कि दूसरों के दुख-दर्द में जीना है। उसकी आँखें भीग जातीं जब वह किसी माँ की बेबसी लिखता, उसका दिल तड़प उठता जब वह किसी जुदाई की कथा कहता। लोग अब भी उसे सामान्य समझते थे, पर उसकी कलम उसके लिए तपस्या थी। और जब किसी पाठक ने कहा—“तुमने मेरी आत्मा को शब्द दे दिए,” तब अनिरुद्ध ने जाना कि यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। लेखन उसके लिए अब शौक नहीं, साधना था—समाज का दर्पण और आने वाली पीढ़ियों के लिए दीपक। सचमुच, वह शब्दों का साधक था। रचयिता पाठ्य विस्तार   प्रस्तुति

कलम की दुनिया

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  कहानी   कलम की दुनिया अनिरुद्ध एक साधारण-सा युवक था। बाहर से देखो तो बिल्कुल सामान्य —कार्यालय जाता, मित्रों के संग हँसी-मज़ाक करता और प्रति दिन ज़िंदगी जीता। लेकिन भीतर ही भीतर उसका मन एक अलग ही दुनिया में रहता। उसकी डायरी ही उसकी सच्ची साथी थी। हर रात जब सब सो जाते, वह चुपके से अपनी डायरी खोलता और लिखना शुरू करता। शब्द ऐसे बहते जैसे किसी अज्ञात स्रोत से आ रहे हों। कभी बचपन की शरारतें उसमें उतर जातीं, कभी युवावस्था की धड़कनें। कई बार समाज की कड़वी सच्चाइयाँ उसकी कलम से लहू बनकर टपकतीं। एक रात उसने लिखा— "मैं क्या लिख रहा हूँ ? ये सब तो मेरे भीतर था भी नहीं। यह किसकी कहानी है?" डायरी का पन्ना जैसे मुस्कराया-"यह तुम्हारी नहीं, तुम्हारे आसपास की अनकही कहानियाँ हैं। तुम केवल माध्यम हो।"धीरे-धीरे अनिरुद्ध समझने लगा कि लेखक का काम सिर्फ़ लिखना नहीं है, बल्कि पात्रों के दुख-दर्द में जीना है। वह जब किसी माँ की बेबसी लिखता, तो उसके आँसू खुद गालों तक बहते। जब किसी प्रेमी की बिछोह कहानी कहता, तो उसका दिल भी हूक से भर जाता। सचमुच वह अपने पात्रों की दुनिया में प्रवेश कर चुका ...