वक्त का खेल
✍ लघु कथा वक्त का खेल अरुण एक साधारण युवक था। उसका जीवन उतार‑चढ़ाव से भरा था। कभी व्यापार में सफलता मिलती तो वह खुद को सबसे बड़ा समझ बैठता, और कभी किसी नुकसान या असफलता से घिर जाता तो दिनभर उदास बैठा रहता। उसके मित्र उसे समझाते—“इतना मत सोचो, जीवन में सब चलता है”—पर अरुण की चिंता कम नहीं होती। एक दिन भारी नुकसान के बाद वह शहर के बाहर बने पुराने मंदिर में जा बैठा। वहाँ एक साधु बैठे थे—आचार्य निखिल। वे शांत भाव से जप कर रहे थे। अरुण उनके पास गया और बोला, “गुरुजी! सबकुछ हाथ से निकल रहा है। कभी खुशी में मैं खुद को भूल जाता हूँ और कभी दुख में हार मान लेता हूँ। क्या करूँ?” आचार्य निखिल ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, हर्ष में मदमत्त और गम में मायूस कभी भी मत होना, क्योंकि वक्त बड़ा खिलाड़ी है जो प्रतिदिन अपनी चाल बदलता है। आज तू दुख में है, कल वही समय तुझे हँसी देगा। जीवन में कुछ रास्ते सब्र के होते हैं और कुछ सबक के। दोनों को अपनाना सीख ले।” अरुण चुप हो गया। साधु ने आगे कहा, “जब तू खुश हो, तब विनम्र रह। जब तू दुख में हो, तब धैर्य रख। समय को अपना काम कर...