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Showing posts from July, 2025

उम्र कैद

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भूमिका प्रस्तुत कहानी माया शर्मा जी की सशक्त लेखनी का अद्भुत उदाहरण है जो मन वैचारिकी को नवल आयाम दे सकने में सक्षम है और लेखनी की पैनी धार की स्पष्ट अभिव्यक्ति।  उम्र कैद क्या शादी का मतलब कैद होता है? अगर रैना को पहले से इसका अंदाज़ा होता, तो शायद वह कभी शादी नहीं करती। हमेशा हँसमुख और आत्मविश्वासी रैना की शादी एक देखने में सुंदर और सुशील लगने वाले युवक से पारंपरिक रीति-रिवाज़ों के अनुसार कर दी गई। उस दौर में न मोबाइल थे, न इंटरनेट, और न ही मिलने-मिलाने की खुली छूट। लड़की और लड़के को बस एक औपचारिक झलक मिलती थी। अंतिम निर्णय तो माता-पिता और घर के बुजुर्गों का ही होता था। शादी संपन्न हो गई। लेकिन जैसे ही रैना ससुराल पहुँची, पहले ही दिन से उसे समझ आ गया कि अब उसे अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि घर की अपेक्षाओं के अनुसार ही जीना होगा। छह मीटर की साड़ी और सिर पर पल्लू तो अनिवार्य था ही, कई बार घूंघट गर्दन तक खींचना पड़ता। हालाँकि साड़ी या घूंघट से रैना को कोई परहेज़ नहीं था, लेकिन... "यहाँ मत जाओ", "वहाँ मत हँसो", "ऊँची आवाज़ में मत बोलो", "खुलकर मत मुस्कराओ...

मिनी ममता की सीमा, साहस की मिसाल

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  कहानी   "मिनी ममता की सीमा, साहस की मिसाल" ममता के गलियारों में… केरल के कोझीकोड में एक मध्यमवर्गीय परिवार की माँ थी मिनी, जिसकी आँखों में बेटे राहुल के लिए वही सपने थे जो हर माँ देखती है - पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने, खुश रहे, अपना नाम कमाए। लेकिन राहुल की आँखों ने इन सपनों के बजाय किसी और धुएँ को अपनाया था - नशे का धुआँ। राहुल ने 13 वर्ष की आयु में ड्रग्स का सेवन शुरू किया, और मिनी को इसका अहसास तब हुआ जब वह 18 का हो चुका था- जब घर में अचानक चीजें गायब होने लगीं, जब उसके स्वभाव में उग्रता आने लगी, जब उसका भविष्य गुम होता दिखा। ममता ने की कोशिशें… मिनी ने अपने बेटे को हर संभव तरीके से बचाने का प्रयास किया।डॉक्टरों के पास ले गई, नशामुक्ति केंद्र भेजा, पूजा-पाठ करवाए, खुद उपवास किए और हर बार जब बेटे ने आँखों में आँसू भरकर कहा -"अम्मा, अब नहीं करूंगा…"तो मिनी का दिल पिघल जाता। लेकिन सुधार अस्थायी था, और नशे की लत – एक स्थायी दैत्य। एक माँ और एक माँ की असहायता…राहुल अब हिंसक हो चुका था। उसने एक बार पैसे माँगे और ना मिलने पर घर में तोड़फोड़ की। एक मासूम बच्चे को काट खाया ...

कोमल की उड़ान

भूमिका धन्य हैं डॉ छाया शर्मा जी, जिन्होंने कोमल की सफलता की गाथा सुनते ही कहानी की रचना करने का मन बना लिया। और! कहानी सृजन भी ऐसा कि उसने सभी का मन मोह लिया। आप भी पढ़िये इस सच्ची कहानी को।  "कोमल की उड़ान" राजस्थान के एक छोटे से गाँव में जन्मी कोमल ठेकला को कभी बड़े शहरों की रौनक नहीं लुभाती थी। मिट्टी से सने पाँव, खेतों की सोंधी महक और माँ की साड़ी का आँचल- यही उसकी दुनिया थी। लेकिन उसके सपनों की कोई सीमा नहीं थी। जब बाकी बच्चे गुड्डे-गुड़ियों में खोए रहते, कोमल किताबों की दुनिया में रम जाती। उसके पिता एक किसान परिवार से थे और नर्सिंग ऑफिसर थे जबकि माँ गृहिणी। घर में तीन बेटियाँ थीं और समाज के कई सवाल। लेकिन कोमल के माता-पिता ने कभी कोई पूर्वागृह नहीं रखा। उन्होंने अपनी बेटियों को डॉक्टर, अफसर और इंसान बनने का अधिकार दिया। कोमल ने नीट (NEET) की तैयारी जयपुर में शुरू की और एक प्रयास में ही परीक्षा को क्रैक किया। गाँव में कोचिंग तो दूर, ठीक से इंटरनेट भी नहीं था। लेकिन उसने हार नहीं मानी। मोबाइल से यूट्यूब वीडियो देखकर, गाइड बुक्स से पढ़कर और देर रात तक दीपक की रौशनी में पढ...

मोबाइल और मासूमियत

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भूमिका बचपन एक ऐसी उम्र होती है, जहाँ जिज्ञासा स्वाभाविक होती है, मासूमियत दिल से झलकती है और नैतिक मूल्य धीरे-धीरे जीवन में आकार लेने लगते हैं। यही वो समय होता है जब सही और गलत के बीच का अंतर सीखने की शुरुआत होती है। प्रस्तुत लघु कथा दो ऐसे ही विद्यालय जाने वाले बच्चों — अभिषेक और भगवान — की है, जिनकी उम्र भले ही छोटी है, लेकिन उनके विचार और मूल्य बहुत बड़े हैं। ज़मीन पर पड़ा एक मोबाइल फोन जब उन्हें मिलता है, तो उनके मन में कई सवाल उठते हैं। क्या करें? किसका होगा? क्या रख लें या लौटाएँ? इस सरल-सी घटना में उनके भीतर छुपी नैतिकता, ईमानदारी और निर्णय लेने की क्षमता उभर कर सामने आती है। यह कहानी केवल एक खोए मोबाइल की नहीं, बल्कि उन संस्कारों की झलक है जो बच्चों को उनके परिवार और समाज से मिलते हैं। इसमें छुपी मासूम बातचीत, उनके निर्णय और भावनाएं न केवल एक प्रेरणा देती हैं, बल्कि यह भी याद दिलाती हैं कि सच्चाई और ईमानदारी की शिक्षा जब बचपन में दी जाती है, तो उसका असर जीवन भर रहता है।   कहानी "मोबाइल और मासूमियत" ( एक सच्ची प्रेरणा गाँव बनेठा, टोंक, राजस्थान से ) गर्मी की छुट्टियो...