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Showing posts from May, 2025

बाबा जी का सपना

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बाबा जी का सपना भूमिका नीचे कहानी रूप में प्रस्तुत एक वास्तविक दृढ़निश्चय का विवरण है। सीधीसादी ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं का अपने बाबा जी का सपना पूरा करने का संकल्प। बाबा जी का सपना बहुत समय पहले, उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक छोटा-सा गांव था — मीरपुर। इस गांव में एक बड़े और प्यारे परिवार के मुखिया थे श्री दल सिंह जी। वे बड़े ही समझदार और सोच-समझकर काम करने वाले इंसान थे। उन्होंने अपने परिवार को तीन जरूरी बातें सिखाईं — शिक्षा का महत्व, पारिवारिक एकता, और किसी भी काम को ईमानदारी से करना। उनकी बातें परिवार के हर सदस्य ने दिल से मानीं। धीरे-धीरे सभी ने मेहनत से पढ़ाई की, आपस में मिलजुल कर रहे और अच्छे फैसले लिए। बाबा जी का सपना था कि उनके परिवार से कोई बड़ा अफसर बने, ताकि गांव और देश का नाम रोशन हो। समय बीतता गया। पीढ़ियाँ बदलती गईं। पर बाबा जी का सपना दिलों में जिंदा रहा। 🧑‍🎓 एक दिन आया हर्ष का नंबर! हर्ष, बाबा जी की तीसरी पीढ़ी का होशियार और समझदार बच्चा था। बचपन से ही वह कुछ अलग करना चाहता था। जब वह पाँचवीं कक्षा में था, तभी उसने ठान लिया था — "मैं ऐसा काम करूंगा जिससे लो...

"हिमालय का हीरो: एडमंड हिलेरी की कहानी"

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एक सच्ची कहानी, बच्चों की ज़ुबानी बहुत समय पहले की बात है, एक छोटा सा देश है – न्यूजीलैंड । वहां एक प्यारा बच्चा रहता था – एडमंड हिलेरी । वह कोई राजकुमार नहीं था, न ही जादुई दुनिया से आया था। वह तो एक साधारण किसान के घर में पैदा हुआ था, और उसका मन मधुमक्खियों से खेलना और शहद इकट्ठा करना बहुत पसंद था। पर, एडमंड के दिल में एक और खास चीज़ थी – ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से दोस्ती करने की तमन्ना । जब वह छोटा था, तबसे बर्फ से ढके पहाड़ उसे बुलाते थे, जैसे कहते हों – "आओ, हमें छूकर दिखाओ!" और एडमंड कहता – "एक दिन जरूर!" धीरे-धीरे वह बड़ा हुआ और खूब मेहनत करने लगा। एक दिन वह आल्पस पहाड़ पर चढ़ गया। फिर एक-एक कर कई ऊँचे पहाड़ों को जीत लिया। पर उसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश थी – दुनिया के सबसे ऊँचे पहाड़ सागरमाथा (जिसे माउंट एवरेस्ट भी कहते हैं) पर चढ़ना। यह हिमालय में था और इसकी ऊँचाई थी – 8,848 मीटर! सब कहते – "यह तो नामुमकिन है!" पर एडमंड नहीं माना। उसने एक बहादुर नेपाली साथी तेनसिंग नोर्गे के साथ 29 मई, 1953 को उस विशाल पर्वत की चोटी पर झंडा फहरा दिया ! वो पल जैसे जादू...

छाती पर लगी गोली

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छाती पर लगी गोली (एकांकी) अवधि: 20-25 मिनिट्स पात्र रामवीर – 17-18 वर्षीय युवक, मासूम और भावुक माँ – सरल, आस्था और बेटे के सपनों से जुड़ी पिता – मेहनती किसान, सपनों में बेटा ही केंद्र पत्नी (बच्ची) – नई-नई ससुराल आई, भोली पड़ोसी चाचा (सत्यनारायण) – बुजुर्ग, आंदोलन में भागीदार पुलिस का सिपाही (वॉयसओवर या ऑफ-स्टेज) सामूहिक स्वर (नैरेटर) – जनता का प्रतिनिधि, भावों को जोड़ता है स्थान: एक साधारण गांव का आंगन – एक तरफ तुलसी चौरा, दूसरी तरफ रामवीर की तस्वीर पर माला टंगी हुई। प्रस्तावना : (धीमी रोशनी, पृष्ठभूमि में करुण संगीत) सामूहिक स्वर: “जब वादे छल जाएं, जब गोलियां सवाल बन जाएं… तब कोई रामवीर मरता नहीं… अमर हो जाता है। यह कहानी है एक ऐसे बेटे की… जिसकी छाती पर सिर्फ गोली नहीं लगी… लगा था एक पूरे समाज का दर्द।” दृश्य 1: घर का आंगन – सुबह (माँ तुलसी पर जल चढ़ा रही है, पिता बैल जोतने की बात कर रहे हैं। रामवीर हँसता हुआ लौटता है, पत्नी चुपचाप चौखट पर बैठी है।) माँ (खुश होकर): आ गया मेरा लाल? आज फिर देर कर दी सैर में? रामवीर: माँ, गांव में लोग कह रहे हैं, आंदोलन तेज हो गया है। आज जयपुर से कुछ ल...

संस्कार

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भूमिका प्रस्तुत एक अंकीय नाटक बच्चों को सिखाने में मदद करता है कि अच्छे संस्कार सिर्फ पढ़ाई से नहीं, अपितु जीवन के व्यवहार, परंपराओं और आसपास के समाज से सीखे जाते हैं। "संस्कार कोई पढ़ाई नहीं, पर जीवन की सबसे जरूरी शिक्षा है।"  🎭 अच्छे संस्कारों की पाठशाला पात्र (Characters) * टीचर सरिता – एक समझदार और प्यारी शिक्षिका * आरव – जिज्ञासु और बुद्धिमान छात्र * सिया – सहायक और समझदार लड़की * राज – शरारती लेकिन भला बच्चा * दादी माँ – परंपरा और अनुभव की प्रतीक अन्य छात्र/छात्राएँ – दर्शक या सहायक भूमिकाओं में प्रथम दृश्य : कक्षा में (स्टेज पर कक्षा का दृश्य। बच्चे बेंचों पर बैठे हैं। टीचर सरिता प्रवेश करती हैं।) टीचर सरिता: बच्चो, आज हम किताबें नहीं खोलेंगे। आज हम बात करेंगे संस्कारों की — उन बातों की जो जीवन में बहुत काम आती हैं, लेकिन किसी किताब में नहीं लिखी होतीं। आरव (हैरान होकर): लेकिन मैम, अगर ये किताबों में नहीं हैं, तो हम इन्हें कैसे सीख सकते हैं? सिया: शायद बड़ों से? जैसे दादी माँ, माँ-पापा? टीचर सरिता (मुस्कराते हुए): बिलकुल सही कहा सिया! अच्छे संस्कार ...

संवाद - “कर्ज नहीं, हिम्मत और हुनर से हो शुरुआत"

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भूमिका यह एक वास्तविक संवाद है। यह एक ऐसे युवा सूरज और जनचेतना मिशन के संयोजक इंजीनियर सत्यपाल सिंह के बीच का है, जो हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि कोई भी कार्य शुरू करने के लिए ऋण लेना ही एकमात्र रास्ता नहीं होता। आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी हमारे अपने कौशल, संसाधन और हिम्मत होती है। यह बातचीत दिखाती है कि कैसे एक सीमित साधनों वाला, शारीरिक रूप से अक्षम बालक भी यदि सही मार्गदर्शन और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े, तो बिना ऋण के भी एक सफल पहल कर सकता है। यह संवाद केवल सूरज की कहानी नहीं है — यह हर उस व्यक्ति की प्रेरणा बन सकता है जो कम साधनों के कारण अपने सपनों को रोककर बैठा है। संदेश स्पष्ट है:  "कर्ज से नहीं, कर्म से परिवर्तन आता है।" आरंभिक पूछताछ Support Proposal – Himalayan Varmi Compost Submitted by: Suraj Sharma स्थान: रौड़ी, धर्मपुर, जिला सोलन, हिमाचल प्रदेश श्रेणी: Sustainable Agriculture | Livelihood Enhancement | Disability Entrepreneurship आदरणीय NGO टीम, मेरा नाम सूरज शर्मा है। मैं हिमाचल प्रदेश के जिला सोलन के गाँव रौड़ी (धर्मपुर) का निवासी हूँ। मैं 90% दोनों ह...

जीवन को अर्थपूर्ण करने संबंधी नाटिका

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भूमिका साथियो, जीवन को गुनना हम सबकी सर्वोच्च प्राथमिकता पर होना चाहिए। यदि आप और हम अपने परिवेश को देखें तो पाएंगे कि जीवन को न गुनने ही के कारण धीरे धीरे समस्याओं का अंबार लगता चला जा रहा है और परिणामस्वरूप जीवन को सरल करना दुश्वार होता चला जा रहा है। ऐसे में प्रस्तुत नाटिका जीवन को गुनने के प्रभाव को स्पष्ट रूप में समझा सकती है ऐसा जन चेतना मिशन का मानना है। जीवन को गुनने संबंधी नाटिका 🎭 नाटक शीर्षक 'गुना हुआ जीवन'   पात्र 1. दादी – अनपढ़ लेकिन समझदार। 2. रवि – MBA किया हुआ, नौकरीपेशा बेटा।    3. राधा – रवि की पत्नी, व्यवहारिक लेकिन भावनाओं से दूर। 4. गुड्डी – रवि की छोटी बेटी, मासूम।  5. मोहन चाचा – पड़ोसी, गाँव के समझदार बुज़ुर्ग। 6. कथा-वाचक - मंच पर किनारे से, घटनाओं को जोड़ता है।  प्रथम दृश्य  साक्षर परिवार में सन्नाटा पसरा है। (मंच पर एक सुंदर ड्रॉइंग रूम, टीवी, लैपटॉप, किताबें बिखरी हैं। राधा मोबाइल चला रही है, रवि लैपटॉप पर काम कर रहा है। दादी कोने में बैठी हैं, शांत। गुड्डी दादी की गोद में आकर बैठती है।)  गुड्डी (मासूमियत से) - ...

दो जज और एक कलाकार

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भूमिका किसी भी रचना, व्यक्ति या कार्य की सही परख करना एक साधारण कार्य नहीं है। इसके लिए केवल बाहरी ज्ञान नहीं, बल्कि आंतरिक समझ, संवेदनशीलता और अनुभव की आवश्यकता होती है। आज के समय में, जहाँ आकलन और आलोचना एक चलन बन चुका है, वहाँ यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है — क्या परखने वाला स्वयं परखने योग्य है? यह कहानी — "दो जज और एक कलाकार" — केवल एक चित्रकार और दो आलोचकों की बात नहीं करती, बल्कि यह हमें उस गहरे सत्य से रूबरू कराती है कि असली मूल्यांकन वही कर सकता है जो विषय की आत्मा को पहचानता है, और जिसकी दृष्टि केवल दोष खोजने की नहीं, सत्य को समझने की होती है।                                             आकलन प्रक्रिया इस कहानी के माध्यम से यह प्रयास किया गया है कि हम यह समझ सकें — ज्ञान का मुखौटा ओढ़ लेना आसान है, लेकिन ज्ञान की सादगी और गहराई को जीना कठिन। जब कोई असावधान दृष्टि केवल सतह देखती है, तो वह सृजन की आत्मा को नहीं पहचान पाती। वहीं एक अनुभवी और शांत दृष्टि, बिना बोले ही...