कलम की दुनिया

 कहानी 

कलम की दुनिया

अनिरुद्ध एक साधारण-सा युवक था। बाहर से देखो तो बिल्कुल सामान्य —कार्यालय जाता, मित्रों के संग हँसी-मज़ाक करता और प्रति दिन ज़िंदगी जीता। लेकिन भीतर ही भीतर उसका मन एक अलग ही दुनिया में रहता।

उसकी डायरी ही उसकी सच्ची साथी थी। हर रात जब सब सो जाते, वह चुपके से अपनी डायरी खोलता और लिखना शुरू करता। शब्द ऐसे बहते जैसे किसी अज्ञात स्रोत से आ रहे हों। कभी बचपन की शरारतें उसमें उतर जातीं, कभी युवावस्था की धड़कनें। कई बार समाज की कड़वी सच्चाइयाँ उसकी कलम से लहू बनकर टपकतीं।

एक रात उसने लिखा—

"मैं क्या लिख रहा हूँ ? ये सब तो मेरे भीतर था भी नहीं। यह किसकी कहानी है?"

डायरी का पन्ना जैसे मुस्कराया-"यह तुम्हारी नहीं, तुम्हारे आसपास की अनकही कहानियाँ हैं। तुम केवल माध्यम हो।"धीरे-धीरे अनिरुद्ध समझने लगा कि लेखक का काम सिर्फ़ लिखना नहीं है, बल्कि पात्रों के दुख-दर्द में जीना है। वह जब किसी माँ की बेबसी लिखता, तो उसके आँसू खुद गालों तक बहते। जब किसी प्रेमी की बिछोह कहानी कहता, तो उसका दिल भी हूक से भर जाता। सचमुच वह अपने पात्रों की दुनिया में प्रवेश कर चुका था।

समाज में लोग उसे देखकर कहते—"अरे! यह तो बिल्कुल सामान्य लड़का है।" पर किसी ने उसके अन्तस की हलचल नहीं देखी थी। उसकी कलम उसके लिए तपस्या बन चुकी थी। कई बार नौकरी का सुख-चैन छूट जाता, कई बार रिश्तों की शिकायतें सुननी पड़तीं-"हर वक़्त लिखते रहते हो!" लेकिन वह जानता था, यह केवल उसका शौक नहीं, बल्कि एक साधना है।

उसकी रचनाएँ जब छपने लगीं, तो पाठक चकित रह गए- "अरे! ये तो हमारी ही कहानी है… यह तो हमारे मोहल्ले का दर्द है… यह तो मेरे जीवन का संघर्ष है!"

अनिरुद्ध मुस्करा दिया। उसे कोई बड़ा सम्मान न मिला हो, पर जब किसी साधारण पाठक ने कहा- "तुमने मेरी आत्मा को शब्द दे दिए।"

तो उसने महसूस किया कि यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह अब जान चुका था- लेखन व्यावसायिकता नहीं, यह समाज का दर्पण और भविष्य की पीढ़ियों के लिए दीपक है।

रचनाकार्

डाॅ. छाया शर्मा 

अजमेर, राजस्थान

प्रस्तुति



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