प्रणपथ
भूमिका इतिहास हमें दिशा देता है, पर मंज़िल तक पहुँचने के लिए कदम हमें स्वयं उठाने होते हैं। बीते युगों के महान व्यक्तित्व—जैसे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ—हमें यह सिखाते हैं कि साहस, संवेदना और संकल्प के साथ कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी जीता जा सकता है। परंतु केवल प्रेरित होना पर्याप्त नहीं; उस प्रेरणा को अपने आचरण, अपने परिश्रम और अपने निर्णयों में उतारना ही वास्तविक साधना है। प्रणपथ इसी सत्य को उद्घाटित करता है कि हर पीढ़ी को अपने समय की चुनौतियों के बीच स्वयं उदाहरण बनना होता है—क्योंकि इतिहास स्मरण के लिए होता है, निर्माण के लिए नहीं। निर्माण तो तब होता है जब व्यक्ति यह समझ ले कि सफलता कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि निरंतर समर्पण और आत्मविश्वास से निभाया गया प्रण है। यही बोध आने वाली पीढ़ियों को केवल सपने देखने वाला नहीं, बल्कि उन्हें साकार करने वाला नागरिक बनाता है। प्रणपथ अर्जुन एक साधारण-सा छात्र था। न साधनों की बहुतायत, न किसी ऊँचे पद का पारिवारिक उत्तराधिकार। उसके पास था तो बस एक छोटा-सा कमरा, कुछ किताबें और दीवार पर टँगी एक तस्वीर—फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की। वह तस्वीर अर्जुन क...