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Showing posts from August, 2026

चंदू के जीजू

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चंदू के जीजू रिश्तों में थोड़ी शरारत हो तो अपनापन और भी गहरा हो जाता है... भूमिका कभी-कभी जीवन की सबसे खूबसूरत शामें किसी बड़े आयोजन से नहीं, बल्कि परिवार के साथ बिताए कुछ साधारण-से पलों से बनती हैं। और जब ऐसे पलों में कोई शरारती साला शामिल हो जाए, तो जीजा की शाम कब हँसी-मज़ाक, उलझन और परेशानी में बदल जाए—कहना मुश्किल है। जीतू भी उस दिन परिवार के साथ कुछ सुखद पल बिताने निकला था। उसे क्या पता था कि एक फ़ेसबुक पोस्ट उसकी शाम का नक्शा बदल देगी और रात को आने वाला सपना अगली सुबह एक मज़ेदार हकीकत का संकेत बन जाएगा! तो आइए, पढ़ते हैं जीजा-साले के रिश्ते की नोकझोंक, अपनापन और हास्य से भरी कहानी— ‘चंदू के जीजू’। कहानी शाम के छह बज रहे थे। जीतू के दफ़्तर से घर लौटने का समय हो गया था। घर पर उसकी पत्नी सोनाली और बेटा पिंकू पहले से ही नए कपड़े पहनकर तैयार बैठे थे। आज कई दिनों बाद पूरा परिवार साथ में कहीं घूमने जाने वाला था। जीतू ने घर की घंटी बजाई। सोनाली ने दरवाज़ा खोला। सोनाली को देखते ही जीतू के चेहरे पर मुस्कान आ गई। “क्या बात है, भाग्यवान! आज तो बड़ी सुंदर लग रही हो।” सोनाली कुछ कहती, उससे पहल...

एक कप चाय - प्रमिला त्रिवेदी

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एक कप चाय भूमिका क्या कभी ऐसा हुआ है कि एक ही घर में रहते हुए भी दो पीढ़ियाँ एक-दूसरे से कोसों दूर महसूस करें? क्या एक छोटी-सी बातचीत उस दूरी को पाट सकती है? और अगर बातचीत की शुरुआत एक कप चाय के साथ हो, तो क्या रिश्तों में जमी खामोशी भी पिघल सकती है? आइए, जानते हैं दादाजी और उनके पोते अंश की यह छोटी-सी, मगर रिश्तों की बड़ी सच्चाई कहती कहानी। एक कप चाय दादाजी बरामदे में बैठे थे। सामने उनका पोता अंश मोबाइल में खोया हुआ था। कई दिनों से दोनों के बीच बातचीत लगभग बंद थी। दादाजी को लगता था कि आज की पीढ़ी के पास बड़ों के लिए समय नहीं है, और अंश को लगता था कि दादाजी उसकी दुनिया समझना ही नहीं चाहते। एक शाम बिजली चली गई। मोबाइल की बैटरी भी समाप्त हो गई। अंश अनमने मन से बरामदे में आकर बैठ गया। दादाजी मुस्कुराए और बोले, “चलो, आज तुम्हें अपने बचपन की एक कहानी सुनाता हूँ।” अंश ने पहली बार ध्यान से सुना। कहानी पूरी हुई तो उसने कहा, “दादाजी, आपके ज़माने में सचमुच बहुत संघर्ष था।” दादाजी ने भी मुस्कुराकर पूछा, “और तुम मुझे यह बताओ कि यह मोबाइल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता कैसे काम करती है?” उस रात एक कप चाय क...

भरोसा - प्रमिला त्रिवेदी

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भरोसा भूमिका वैवाहिक जीवन की सबसे मजबूत नींव प्रेम नहीं, बल्कि भरोसा होता है। आकर्षण समय के साथ बदल सकता है, परिस्थितियाँ भी करवट लेती रहती हैं, पर जो हाथ कठिन समय में थामे रहें, वही सच्चे जीवनसाथी कहलाते हैं। यह कहानी केवल एक दंपति की यात्रा नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है जो सुख में नहीं, बल्कि संघर्ष की आँच में तपकर और अधिक मजबूत हुआ। यदि विवाह को जीवनभर का साथ बनाना है, तो इस कहानी का संदेश हर युवक-युवती और प्रत्येक परिवार के लिए विचारणीय है। भरोसा शादी के लिए दीपक जी से ऑनलाइन मुलाकात होने के बाद हमने अपनी-अपनी प्रोफाइल घर पर दिखाई। दोनों परिवारों को सब कुछ अच्छा लगा। दीपक जी ने मेरा नंबर लिया और हमारी बातचीत शुरू हुई। शुरुआत में मुझे लगा कि वे बहुत शर्मीले स्वभाव के हैं, लेकिन धीरे-धीरे हमारी बातचीत बढ़ने लगी। एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा, "तुम्हारे होने वाले पति से तुम्हारी क्या उम्मीदें हैं?" मैंने बिना रुके लंबी-चौड़ी सूची सुना दी—वह अच्छा दिखने वाला हो, आर्थिक रूप से सक्षम हो, उसकी अच्छी कमाई हो ताकि किसी चीज़ के लिए सोचना न पड़े, मेरा ख्याल रखे, जीवन में स्थिरता ह...

लघुकथा

एक कप चाय दादाजी बरामदे में बैठे थे। सामने उनका पोता अंश, मोबाइल में खोया हुआ था। कई दिनों से दोनों के बीच बातचीत लगभग बंद थी। दादाजी को लगता था कि आज की पीढ़ी के पास बड़ों के लिए समय नहीं, और अंश, को लगता था कि दादाजी उसकी दुनिया समझना ही नहीं चाहते। एक शाम बिजली चली गई। मोबाइल की बैटरी भी समाप्त हो गई। अंश,अनमने मन से बरामदे में आकर बैठ गया। दादाजी मुस्कुराए और बोले, "चलो, आज तुम्हें अपने बचपन की एक कहानी सुनाता हूँ।" अंश, ने पहली बार ध्यान से सुना। कहानी पूरी हुई तो उसने कहा, "दादाजी, आपके ज़माने में सचमुच बहुत संघर्ष था।" दादाजी ने भी मुस्कुराकर पूछा, "और तुम मुझे यह बताओ कि यह मोबाइल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता कैसे काम करती है?" उस रात एक कप चाय के साथ दो पीढ़ियाँ आमने-सामने नहीं, साथ-साथ बैठी थीं। अगले दिन से अंश, रोज़ कुछ समय दादाजी के साथ बिताने लगा। दादाजी उससे नई तकनीक सीखते, और अंश, उनसे जीवन के अनुभव। घर में कुछ भी नहीं बदला था—न दीवारें, न फर्नीचर। बदला था तो केवल संवाद का तरीका। उसी दिन सबने समझ लिया कि जनरेशन गैप उम्र का नहीं, संवाद का अंतर होता...

छुक-छुक करती ट्रेन और प्रकृति का अनमोल पाठ

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छुक-छुक करती ट्रेन और प्रकृति का अनमोल पाठ भूमिका   कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सीख किसी विद्यालय की कक्षा में नहीं, बल्कि यात्रा के दौरान सहज संवादों में मिल जाती है। मासूम बच्चों के मन में उठने वाले छोटे-छोटे प्रश्न ही उन्हें प्रकृति, जीवन और ईश्वर के गहरे रहस्यों तक पहुँचा देते हैं। प्रस्तुत कहानी भी एक ऐसे ही नन्हे बालक की है, जिसने ट्रेन की खिड़की से बाहर झाँकते हुए केवल पेड़, पहाड़ और बादलों को नहीं देखा, बल्कि प्रकृति के अद्भुत नियमों और संघर्ष में भी जीवन का अमूल्य संदेश खोज लिया। आइए, पढ़ते हैं यह प्रेरक बाल-कथा। छुक-छुक करती ट्रेन और प्रकृति का अनमोल पाठ आज बंटी बहुत खुश था, क्योंकि वह पहली बार ट्रेन में बैठा था। छुक-छुक करती ट्रेन और भागते-दौड़ते पेड़ उसे बहुत लुभा रहे थे। खंभे, बिजली के तार और दूर-दूर तक फैले खेत उसे ऐसे दिखाई दे रहे थे, मानो वे सब उसके साथ दौड़ रहे हों। वह उत्साह से दादी से बोला, "देखो दादी, ये खंभे हमसे भी तेज भाग रहे हैं, ना?" दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "और वह पेड़ भी?" बंटी ने हँसते हुए कहा, "हाँ दादी, वह पहाड़ भी... नदी भी... सब ह...