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Showing posts from June, 2026

चीकू - विजया डालमिया

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चीकू चीकू आम के बगीचे में जाकर चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में आँसू और पीड़ा—दोनों ही साफ़ दिखाई दे रहे थे। जब भी घर में कोई उसे कुछ कह देता, वह मायूस होकर आम के उसी पेड़ के नीचे आ बैठता, जहाँ उसकी दादी उसे अक्सर लेकर आया करती थीं। पेड़ की पत्तियाँ मानो उसे सहला रही होतीं और उनकी छाँव में उसे असीम शीतलता मिलती थी। अब शाम हो चली थी। थोड़ी ही देर में अँधेरा होने वाला था, पर चीकू को घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी। वह छोटा ज़रूर था, पर इतना समझता था कि घर पर कोई उसका इंतज़ार करने वाला नहीं है। हाँ, एक दादी ही थीं, जो उसे भरपूर लाड़-दुलार देती थीं। वे भी एक महीने पहले उसे छोड़कर भगवान के घर चली गई थीं। दादी ने ही उसे बताया था कि उसके मम्मी-पापा भगवान के घर में रहते हैं और तारे बनकर चमकते हैं। तभी से जब भी वह छत पर जाता, तारों भरे आकाश में अपने मम्मी-पापा को ढूँढ़ने की कोशिश करता। जो तारा सबसे अधिक चमकदार दिखाई देता, उसे लगता कि वही उसके मम्मी-पापा हैं। आज उसे दादी की बहुत याद आ रही थी। चाची के बच्चों ने उसे धक्का देकर गिरा दिया था। उसके मुँह से अनायास "माँ" शब्द निकल पड़ा। यह सुनते ह...

वादा - विजया डालमिया

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वादा भूमिका कुछ रिश्ते जन्म से मिलते हैं और कुछ परिस्थितियाँ उन्हें जन्म देती हैं। समय के साथ इन रिश्तों का स्वरूप बदलता है, भावनाएँ बदलती हैं और मन की व्याख्याएँ भी बदल जाती हैं। किन्तु हर प्रेम का अर्थ केवल प्रेमी-प्रेमिका का संबंध नहीं होता। कभी-कभी स्नेह, संरक्षण, अपनापन और त्याग भी प्रेम के सबसे पवित्र रूप बनकर सामने आते हैं। "वादा" ऐसी ही एक मार्मिक कहानी है, जिसमें भावनाओं की कोमलता, रिश्तों की गरिमा और आत्मसंयम का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह कथा बताती है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि दूसरे के सम्मान और सुख की रक्षा करने का नाम है। एक ऐसा वादा, जो बिछड़ने के बाद भी रिश्ते की पवित्रता को जीवनभर जीवित रखता है। कहानी "प्रेम, कहाँ हो तुम?"** कहते हुए प्रिया दनादन सीढ़ियाँ चढ़ गई। दूसरे माले पर प्रेम का कमरा था। जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ने की वजह से उसका गोरा चेहरा गुलाबी हो चला था। सफेद सलवार-सूट में वह मानो खिला हुआ गुलाब लग रही थी। कमरे के बाहर कमर पर हाथ रखे वह एकटक प्रेम को निहार रही थी, जो अपने ही संसार में खोया कुछ लिख रहा था। उससे अधिक देर प्रतीक्षा न...

गुड़िया की हँसी (लघुकथा)

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गुड़िया की हँसी भूमिका कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी उदासी को दूर करने के लिए किसी बड़े उपदेश की नहीं, बल्कि अपनत्व से भरे एक छोटे-से स्पर्श, मासूम संवाद और स्नेहिल मुस्कान की आवश्यकता होती है। बच्चों की निश्छल हँसी केवल उनके चेहरे की रौनक नहीं होती, बल्कि पूरे वातावरण को जीवंत कर देने वाली मधुर ध्वनि बन जाती है। पर जब वही हँसी कहीं खो जाए, तो संवेदनशील मन उसे खोजने निकल पड़ता है। प्रख्यात साहित्यकार विजया डालमिया द्वारा रचित लघुकथा गुड़िया की हँसी ऐसी ही भावनात्मक अनुभूति का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है, जहाँ एक वृद्धा का स्नेहिल अपनापन एक बच्ची के मन का बोझ हल्का कर देता है। आखिर गुड़िया की हँसी कहाँ खो गई थी? और बसंती काकी ने उसे कैसे लौटा दिया? यही जिज्ञासा इस मार्मिक लघुकथा को अंत तक पढ़ने के लिए पाठकों को बाँधे रखती है। लघुकथा गुड़िया की हँसी नीम के पेड़ के नीचे गुड़िया गुमसुम होकर  बैठी थी। बसंती काकी ने देखा आज उसकी आँखों में हँसी की जगह उदासी व आँसू थे। बसंती  काकी धीरे-धीरे उसके पास गई और कहा ..."अरे गुड़िया, तूने मेरा चश्मा कहीं देखा है क्या? मैं तो ढूंढ -ढूंढ कर थक गई। ...

आत्मविश्वास

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आत्मविश्वास भूमिका जीवन में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब सब कुछ होते हुए भी भीतर एक अजीब-सी खालीपन की अनुभूति होने लगती है। मन किसी अनजानी उलझन में घिर जाता है। न किसी से मिलने का मन करता है, न बात करने का, और न ही रोज़मर्रा की गतिविधियों में कोई रुचि रह जाती है। बाहर से सब सामान्य दिखाई देता है, पर भीतर विचारों का एक तूफ़ान चलता रहता है। ऐसी ही मनःस्थिति कभी-कभी युवाओं को हतोत्साह, भ्रम और अकेलेपन की ओर धकेल देती है। अतः आत्मविश्वास को कभी भी डिगने ना दें। और! स्वयं पर भरोसा रखें कि हम होंगे कामयाब।  कहानी कलकत्ता शहर का एक सेठ का बेटा राहुल गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने आया। गुरुजी ने उसे कुछ दिन वहाँ के तौर-तरीके नियम सीखने को कहा और नन्दू नाम के लडके को उसके साथ दे दिया।                                  सांकेतिक चित्र गूगल से साभार राहुल उसके साथ बातें करते हुए घूमने लगा। उसने नन्दू से उसके शहर का ठिकाना पूछा। नन्दू ने कहा कि उसके पिता यहाँ काम करते हैं और मैं उनके कार्य में हाथ बंटाते हुए यहीं...

नफरत का दहन (लघु कथा)

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नफरत का दहन   सुनीता व निर्मला दोनों सहपाठी थीं। दोनों कक्षा में एक साथ बैठतीं, एक साथ खाना खातीं, दोनों पक्की सहेलियाँ थीं। अपना हर सुख दुःख एक-दूसरे से साझा करती थीं। एक दिन कुछ अजीब हुआ। उनकी कक्षा की छात्रा संजना ने कुछ ऐसी बात कही कि सुनीता व निर्मला की दोस्ती में दरार आ गई। जो सहेलियाँ कभी एक दूसरे के बिना अधूरी थीं अब एक दूसरे की दुश्मन बन गईं। आमने-सामने आना भी उनको गवारा न था। सुनीता बहुत ही ज्यादा संवेदनशील लड़की थी। वह दोनों के रिश्ते के टूटने की कारण बहुत दु:खी तथा उदास रहने लगी। वह अब आगे से निर्मला से बात करने का प्रयास करती, उस बात को जानने की कोशिश करती जिसकी वजह से उनकी दोस्ती दुश्मनी में बदल गई थी। निर्मला जिद्दी थी। उसने सुनीता की भावनाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया दिन गुजरते गए और होली का त्यौहार नजदीक आ गया। संजना को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने निर्मला को सब कुछ सच बता दिया कि सिर्फ उन दोनों की दोस्ती से चिढ़कर ही उसने ऐसा किया था। निर्मला को बहुत पछतावा हुआ कि सिर्फ कानों सुनी बातों पर विश्वास करके उसने विश्वासपात्र दोस्त को खो दिया। होली की शाम थी। सभी होलिक...

ऑफिस या घर - काम का सही माहौल

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ऑफिस या घर  काम का सही माहौल भूमिका   तेजी से बदलते कार्य-संस्कृति के इस दौर में *वर्क फ्रॉम होम* और ऑफिस वर्क के बीच एक नई बहस जन्म ले चुकी है। तकनीक ने घर बैठे काम करना संभव तो बना दिया है, लेकिन क्या घर का वातावरण वास्तव में कार्य की गंभीरता, अनुशासन और रचनात्मकता को उतना ही प्रोत्साहित कर पाता है जितना कार्यालय? प्रस्तुत लघु वार्तालाप एक माँ और बेटे के सहज संवाद के माध्यम से इसी प्रश्न को सरल, व्यावहारिक और विचारोत्तेजक रूप में सामने लाता है। यह संवाद केवल कार्य-स्थल की चर्चा नहीं, बल्कि कार्य-निष्ठा, अनुशासन और सामूहिक वातावरण के महत्व को भी रेखांकित करता है। वार्तालाप   “मम्मी, मैं ऑफिस जा रहा हूँ!” — “लेकिन बेटा, मोदी जी तो कह रहे हैं कि *वर्क फ्रॉम होम* होना चाहिए!” — “हाँ मम्मी, पर अभी ऑफिस वालों ने नहीं कहा।” — “अच्छा बेटा, यह बता कि *वर्क फ्रॉम होम* के बारे में तेरा क्या विचार है? तुम लोगों के लिए यह अच्छा है या ऑफिस ही बेहतर है?” — “मम्मी, कभी भी ऑफिस ही ठीक होता है। वहाँ जब हम सब साथ होते हैं, तो काम गंभीरता से और बेहतर ढंग से होता है। इसके अलावा, वहाँ चर्चा ...