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Showing posts from October, 2026

दिन है या रात...?

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दिन है या रात “अभी दिन है या रात...?” जैसे ही प्रांजल ने यह पूछा, मुकेश की आँखों में आँसू आ गए। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस खिड़की खोलकर आसमान में ढलते सूरज को देखने लगा। ढलती साँझ पर ही तो प्रांजल मिली थी उसे। जब उसकी जिंदगी में कोई उम्मीद नहीं बची थी, तब जुगनू की तरह उसके दिल में चमक उठी थी प्रांजल की हँसी। उस शाम वह अकेला गार्डन में बैठा था। तभी किसी की खिलखिलाती हँसी ने उसका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उसने पलटकर देखा—छोटे-छोटे बच्चों के साथ वह बच्ची बनकर खिलखिला रही थी। उस दिन उसकी हँसी में उसने कितने ही फूलों को झरते देखा था। लगा, जैसे मंदिर में एक साथ कई घंटियाँ बज उठी हों। उदासी के अँधेरों से घिरा उसका दिल अब हँसी के जुगनुओं से टिमटिमाने लगा था। कितनी ही खूबसूरत लड़कियों से उसका वास्ता पड़ा था, पर यह लड़की सबसे अलग थी। कुछ तो खास था उस मासूम चेहरे में, जो उसे अपनी ओर खींच रहा था। इसे उम्र का तकाजा भी नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि अब उसकी वह उम्र नहीं रही थी जब किसी को देखकर दिल धड़क उठे। मगर आज... इतने समय बाद उसका दिल फिर से धड़क रहा था। तभी अचानक बादल घिर आए और बेमौसम बारिश होने ...

सादगी की ताक़त - प्रमिला त्रिवेदी

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सादगी की ताक़त शहर के बीचों-बीच एक बड़ा-सा मकान था। ऊँची दीवारें, चमकदार गाड़ियाँ और हर कमरे में महँगी सजावट। उस घर में रहने वाली नंदिनी भी हमेशा सलीके से रहती थी, लेकिन उसे दिखावे का कोई शौक नहीं था। वह कहती थी, “इंसान की पहचान उसके कपड़ों और सामान से नहीं, उसके व्यवहार से होती है।” नंदिनी की सहेली रिया को उसकी यही सादगी कभी-कभी खटकती थी। रिया हर बात में फैशन, ब्रांड और लोगों की नजरों को महत्व देती थी। एक दिन शहर में एक बड़ा सामाजिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। वहाँ शहर के प्रतिष्ठित लोग आने वाले थे। रिया ने नंदिनी से कहा, “तुम भी कुछ महँगा पहन लेना। आखिर बड़े लोगों के बीच जाना है।” नंदिनी मुस्कुराई, “मैं वही पहनूँगी जिसमें मैं सहज रहूँ। किसी को प्रभावित करने के लिए खुद को बदलना मुझे नहीं आता।” कार्यक्रम शुरू हुआ। चारों ओर चमक-दमक थी। लोग एक-दूसरे से मिलने के बजाय एक-दूसरे के कपड़े और हैसियत देख रहे थे। उसी समय कार्यक्रम के बाहर एक बुज़ुर्ग महिला घबराई हुई खड़ी दिखाई दी। उनके हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में चिंता। नंदिनी तुरंत उनके पास पहुँची। “माँजी, आप परेशान लग रही हैं। क्या हुआ?” बुज़ु...

दो बगुले और कछुआ✓

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दो बगुले और कछुआ✓ एक तालाब में दो बगुले और एक कछुआ रहते थे। तीनों में बड़ी अच्छी दोस्ती हो गई थी। कुछ दिनों बाद कम वर्षा होने के कारण वह तालाब सूख गया। बगुले उड़कर दूर जा सकते थे, लेकिन कछुआ कैसे जाए? इस पर बगुले एक लकड़ी की डंडी ले आए और कछुए से बोले, “तुम इस डंडी को बीच में मुँह से पकड़ लो और ध्यान रखना कि जब तक हम तुमको लेकर दूसरी जगह न उतारें, तब तक बोलना नहीं।” बगुले डंडी को दोनों किनारों से मुँह में दबाकर उड़ लिए। कछुआ भी डंडी को मुँह से दबाए हुए उनके साथ उड़ लिया। जैसे ही वे एक गाँव के ऊपर से गुजरे, लोग कछुए को चिढ़ाने लगे और बोले, “देखो, कछुआ उड़ रहा है!”  फिर एक गाँव और रास्ते में आया। वहाँ भी ऐसा ही हुआ। कछुआ अपने ऊपर किए जा रहे मज़ाक से तंग आ गया और उसने जवाब देने के लिए मुँह खोल दिया। वह भूल गया कि लकड़ी तो उसके मुँह की पकड़ से ही उसे बगुलों के साथ उड़ा रही थी।  मुँह खुलते ही वह आसमान से जमीन पर गिर गया और मर गया।   शिक्षा  यह कहानी हमें यही शिक्षा देती है कि दूसरों के उकसावे में मत आइए। वरना वे आपका पतन आपके ही हाथों करा देंगे। प्रस्तुति  

गजरे में काँटे

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  गजरे में काँटे रशीद के हाथों में गजरा देखते ही रुखसार के चेहरे के भाव बदल गए। उसकी आँखों में पीड़ा उभर आई। वह किचन में जाकर कहने लगी..." आपा  ...रशीद आज गजरा लाए हैं"।..."हाँ तो अच्छा है ना। तुझ पर गजरा खूब फ़बता है"... कहकर आपा ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा। रुखसार धीरे से बोली... "फ़बता नहीं, चुभता है"।... "अरे मोगरे में भी कभी कांटे होते हैं भला"? रुखसार ने धीरे से कहा.... "हाँ ..होते हैं"। ...."क्या कहा"?... "कुछ नहीं" कहकर रुखसार कांपते कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ चली रात भर काँटों की चुभन बर्दाश्त करने के लिए। विजया डालमिया