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दिन है या रात...?

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दिन है या रात “अभी दिन है या रात...?” जैसे ही प्रांजल ने यह पूछा, मुकेश की आँखों में आँसू आ गए। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस खिड़की खोलकर आसमान में ढलते सूरज को देखने लगा। ढलती साँझ पर ही तो प्रांजल मिली थी उसे। जब उसकी जिंदगी में कोई उम्मीद नहीं बची थी, तब जुगनू की तरह उसके दिल में चमक उठी थी प्रांजल की हँसी। उस शाम वह अकेला गार्डन में बैठा था। तभी किसी की खिलखिलाती हँसी ने उसका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उसने पलटकर देखा—छोटे-छोटे बच्चों के साथ वह बच्ची बनकर खिलखिला रही थी। उस दिन उसकी हँसी में उसने कितने ही फूलों को झरते देखा था। लगा, जैसे मंदिर में एक साथ कई घंटियाँ बज उठी हों। उदासी के अँधेरों से घिरा उसका दिल अब हँसी के जुगनुओं से टिमटिमाने लगा था। कितनी ही खूबसूरत लड़कियों से उसका वास्ता पड़ा था, पर यह लड़की सबसे अलग थी। कुछ तो खास था उस मासूम चेहरे में, जो उसे अपनी ओर खींच रहा था। इसे उम्र का तकाजा भी नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि अब उसकी वह उम्र नहीं रही थी जब किसी को देखकर दिल धड़क उठे। मगर आज... इतने समय बाद उसका दिल फिर से धड़क रहा था। तभी अचानक बादल घिर आए और बेमौसम बारिश होने ...

सादगी की ताक़त - प्रमिला त्रिवेदी

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सादगी की ताक़त शहर के बीचों-बीच एक बड़ा-सा मकान था। ऊँची दीवारें, चमकदार गाड़ियाँ और हर कमरे में महँगी सजावट। उस घर में रहने वाली नंदिनी भी हमेशा सलीके से रहती थी, लेकिन उसे दिखावे का कोई शौक नहीं था। वह कहती थी, “इंसान की पहचान उसके कपड़ों और सामान से नहीं, उसके व्यवहार से होती है।” नंदिनी की सहेली रिया को उसकी यही सादगी कभी-कभी खटकती थी। रिया हर बात में फैशन, ब्रांड और लोगों की नजरों को महत्व देती थी। एक दिन शहर में एक बड़ा सामाजिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। वहाँ शहर के प्रतिष्ठित लोग आने वाले थे। रिया ने नंदिनी से कहा, “तुम भी कुछ महँगा पहन लेना। आखिर बड़े लोगों के बीच जाना है।” नंदिनी मुस्कुराई, “मैं वही पहनूँगी जिसमें मैं सहज रहूँ। किसी को प्रभावित करने के लिए खुद को बदलना मुझे नहीं आता।” कार्यक्रम शुरू हुआ। चारों ओर चमक-दमक थी। लोग एक-दूसरे से मिलने के बजाय एक-दूसरे के कपड़े और हैसियत देख रहे थे। उसी समय कार्यक्रम के बाहर एक बुज़ुर्ग महिला घबराई हुई खड़ी दिखाई दी। उनके हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में चिंता। नंदिनी तुरंत उनके पास पहुँची। “माँजी, आप परेशान लग रही हैं। क्या हुआ?” बुज़ु...

दो बगुले और कछुआ✓

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दो बगुले और कछुआ✓ एक तालाब में दो बगुले और एक कछुआ रहते थे। तीनों में बड़ी अच्छी दोस्ती हो गई थी। कुछ दिनों बाद कम वर्षा होने के कारण वह तालाब सूख गया। बगुले उड़कर दूर जा सकते थे, लेकिन कछुआ कैसे जाए? इस पर बगुले एक लकड़ी की डंडी ले आए और कछुए से बोले, “तुम इस डंडी को बीच में मुँह से पकड़ लो और ध्यान रखना कि जब तक हम तुमको लेकर दूसरी जगह न उतारें, तब तक बोलना नहीं।” बगुले डंडी को दोनों किनारों से मुँह में दबाकर उड़ लिए। कछुआ भी डंडी को मुँह से दबाए हुए उनके साथ उड़ लिया। जैसे ही वे एक गाँव के ऊपर से गुजरे, लोग कछुए को चिढ़ाने लगे और बोले, “देखो, कछुआ उड़ रहा है!”  फिर एक गाँव और रास्ते में आया। वहाँ भी ऐसा ही हुआ। कछुआ अपने ऊपर किए जा रहे मज़ाक से तंग आ गया और उसने जवाब देने के लिए मुँह खोल दिया। वह भूल गया कि लकड़ी तो उसके मुँह की पकड़ से ही उसे बगुलों के साथ उड़ा रही थी।  मुँह खुलते ही वह आसमान से जमीन पर गिर गया और मर गया।   शिक्षा  यह कहानी हमें यही शिक्षा देती है कि दूसरों के उकसावे में मत आइए। वरना वे आपका पतन आपके ही हाथों करा देंगे। प्रस्तुति  

गजरे में काँटे

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  गजरे में काँटे रशीद के हाथों में गजरा देखते ही रुखसार के चेहरे के भाव बदल गए। उसकी आँखों में पीड़ा उभर आई। वह किचन में जाकर कहने लगी..." आपा  ...रशीद आज गजरा लाए हैं"।..."हाँ तो अच्छा है ना। तुझ पर गजरा खूब फ़बता है"... कहकर आपा ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा। रुखसार धीरे से बोली... "फ़बता नहीं, चुभता है"।... "अरे मोगरे में भी कभी कांटे होते हैं भला"? रुखसार ने धीरे से कहा.... "हाँ ..होते हैं"। ...."क्या कहा"?... "कुछ नहीं" कहकर रुखसार कांपते कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ चली रात भर काँटों की चुभन बर्दाश्त करने के लिए। विजया डालमिया

वो आँसू जो बह नहीं पाए

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वो आँसू जो बह नहीं पाए “वो बातें जो कह नहीं पाए, वो आँसू जो बह नहीं पाए…” आँखों में नमी लिए शैलेश यह गाना सुन रहा था। पुराने गाने सुनना उसका बहुत पुराना शौक था और यह गीत तो उसके दिल के बेहद करीब था। जब भी यह गीत बजता, वह अक्सर उसका वॉल्यूम बढ़ा देता और आँखों की बरसात के साथ यादों की उस सड़क पर निकल पड़ता, जहाँ हर मोड़ पर अतीत उसका इंतज़ार करता था। यादों को बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलता और दुख शब्द बन जाने का रास्ता नहीं जानते। जिंदगी के खूबसूरत लम्हों को हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं, लेकिन उन्हें महसूस करने के लिए भी कभी-कभी यादों में कैद होना पड़ता है। शायद इसलिए कि यादें हमेशा वहीं ठहर जाती हैं, जहाँ हमसे कोई बिछड़ा था। आज भी भीगते-भीगते शैलेश अपनी जिंदगी के उसी मोड़ पर जा पहुँचा था, जहाँ से कोई आगे बढ़ गया था और कोई पीछे रह गया था। रेडियो पर पुराने गाने सुनना उसका पसंदीदा शौक था। जब भी यह गाना आता, वह वॉल्यूम बढ़ा देता और मिनी आकर कहती— “क्या भैया! जब देखो तब यही गाना…” वह उसे मज़ाकिया अंदाज़ में घूरकर देखता और मिनी हँसती हुई चली जाती। मिनी उससे छह साल छोटी थी। दसवीं में पढ़ती ...

लघु कहानी

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किराएदार कौन? एक लघु कहानी, जो जीवन का बड़ा सत्य कह जाती है।  भूमिका मनुष्य जीवन भर अपने लिए घर बनाता है, संपत्ति जोड़ता है और उसे अपना कहकर गर्व करता है। लेकिन क्या वास्तव में इस संसार में कुछ भी स्थायी रूप से हमारा है? यह कहानी तीन मित्रों की है—हीरा, सोहन और मोहन। तीनों की जीवन-यात्रा हमें धीरे-धीरे यह समझाती है कि घर बदलते रहते हैं, मालिक बदलते रहते हैं, लेकिन अंततः हम सभी इस संसार में किराएदार ही तो हैं। किराएदार कौन? प्रत्येक शहर में मकान बनाना संभव नहीं होता। इसलिए मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के अनुसार किराए के मकान में रहने लगता है। कोई छोटा कमरा किराए पर लेता है, तो कोई बड़ा मकान। कोई कुछ दिनों के लिए रहता है, तो कोई वर्षों तक। दुनिया में सभी किराएदार हैं। फर्क केवल इतना है कि किसी का कमरा छोटा है और किसी का बड़ा। गाँव से शहर पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के जीवन में यह बात और भी स्पष्ट दिखाई देती है। छोटे-छोटे कमरों में किराएदार बनकर रहने वाले यही विद्यार्थी आगे चलकर बड़े सपने देखते हैं और कभी-कभी उन्हीं सपनों को साकार भी कर लेते हैं। ऐसी ही कहानी है सोहन, मोहन और हीरा की। जयपु...

जब कान्हा आए - प्रमिला

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जब कान्हा आए भूमिका कभी-कभी इतिहास में कोई घटना केवल घटना नहीं रहती, वह युगों की चेतना बन जाती है। श्रीकृष्ण का जन्म भी ऐसी ही एक घटना है—जिसमें एक ओर अत्याचार से घिरी अंधेरी रात है, तो दूसरी ओर उसी अंधकार को चीरता हुआ दिव्य प्रकाश। मथुरा के कारागार में जन्मे कृष्ण ने केवल देवकी और वसुदेव के जीवन को नहीं बदला; उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को प्रेम, करुणा, साहस, कर्म और धर्म का एक ऐसा मार्ग दिया, जो आज भी मनुष्य के भीतर आशा जगाता है। कृष्ण की कथा का सौंदर्य इस बात में है कि उसमें ईश्वर का विराट स्वरूप भी है और एक नन्हे बालक की निश्छल मुस्कान भी। वे देवकी के लिए दिव्य अवतार हैं, यशोदा के लिए लाल हैं, ग्वाल-बालों के लिए सखा हैं, गोपियों के लिए प्रेम की अनुभूति हैं और अर्जुन के लिए जीवन के गहनतम सत्य का उद्घोष करने वाले सारथी। शायद इसी कारण कृष्ण किसी एक रूप, एक संबंध या एक युग में सीमित नहीं होते। ‘जब कान्हा आए’ उसी अनुभूति की कहानी है—उस रात की, जब अंधकार के बीच प्रकाश ने जन्म लिया; उस क्षण की, जब भय के बीच विश्वास ने जन्म लिया; और उस यात्रा की, जिसमें एक नन्हा बालक मथुरा से गोकुल पहुँचा औ...