दिन है या रात...?
दिन है या रात “अभी दिन है या रात...?” जैसे ही प्रांजल ने यह पूछा, मुकेश की आँखों में आँसू आ गए। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस खिड़की खोलकर आसमान में ढलते सूरज को देखने लगा। ढलती साँझ पर ही तो प्रांजल मिली थी उसे। जब उसकी जिंदगी में कोई उम्मीद नहीं बची थी, तब जुगनू की तरह उसके दिल में चमक उठी थी प्रांजल की हँसी। उस शाम वह अकेला गार्डन में बैठा था। तभी किसी की खिलखिलाती हँसी ने उसका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उसने पलटकर देखा—छोटे-छोटे बच्चों के साथ वह बच्ची बनकर खिलखिला रही थी। उस दिन उसकी हँसी में उसने कितने ही फूलों को झरते देखा था। लगा, जैसे मंदिर में एक साथ कई घंटियाँ बज उठी हों। उदासी के अँधेरों से घिरा उसका दिल अब हँसी के जुगनुओं से टिमटिमाने लगा था। कितनी ही खूबसूरत लड़कियों से उसका वास्ता पड़ा था, पर यह लड़की सबसे अलग थी। कुछ तो खास था उस मासूम चेहरे में, जो उसे अपनी ओर खींच रहा था। इसे उम्र का तकाजा भी नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि अब उसकी वह उम्र नहीं रही थी जब किसी को देखकर दिल धड़क उठे। मगर आज... इतने समय बाद उसका दिल फिर से धड़क रहा था। तभी अचानक बादल घिर आए और बेमौसम बारिश होने ...