वह दास्तान - विजया डालमिया
वह दास्तान भूमिका कुछ रिश्ते नाम नहीं मांगते, कुछ मुलाकातें पहचान नहीं चाहतीं, और कुछ आवाज़ें बिना चेहरे के भी दिल में घर कर जाती हैं। जीवन में कभी-कभी एक साधारण-सी शुरुआत अनकहे एहसासों की ऐसी कहानी बन जाती है, जिसका अंत हमारी कल्पना से बिल्कुल अलग होता है। प्रस्तुत कहानी केवल एक फोन कॉल की कथा नहीं, बल्कि भावनाओं, अपनत्व, बिछड़न और जीवन की अनिश्चितता का ऐसा मार्मिक दस्तावेज़ है, जो पाठक को आरंभ से अंत तक बाँधे रखता है और अंत में मन को गहरे चिंतन के लिए विवश कर देता है। वह दास्तान "...हैलो... कैसी हैं आप?" "अच्छी हूँ। कहिए, क्या काम है?" "काम तो कुछ नहीं। बस ऐसे ही... किसी ने आपका नंबर दिया, तो मैंने मिला लिया।" "अच्छा! ठीक है।" दो दिन बाद फिर वही आवाज़ आई— "हैलो... कैसी हैं आप?" "मैं बढ़िया हूँ। आप बताइए, कैसे याद किया?" "बस यूँ ही... दिल ने चाहा कि आपकी आवाज़ सुन ली जाए।" "अच्छा, तो सुन ली न..." उसने खिलखिलाते हुए कहा, "अब रखिए फोन।" इतना सुनते ही फोन कट गया। अब तो यह अक्सर होने लगा। किसी भी व...