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Showing posts from July, 2026

वह दास्तान - विजया डालमिया

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वह दास्तान   भूमिका कुछ रिश्ते नाम नहीं मांगते, कुछ मुलाकातें पहचान नहीं चाहतीं, और कुछ आवाज़ें बिना चेहरे के भी दिल में घर कर जाती हैं। जीवन में कभी-कभी एक साधारण-सी शुरुआत अनकहे एहसासों की ऐसी कहानी बन जाती है, जिसका अंत हमारी कल्पना से बिल्कुल अलग होता है। प्रस्तुत कहानी केवल एक फोन कॉल की कथा नहीं, बल्कि भावनाओं, अपनत्व, बिछड़न और जीवन की अनिश्चितता का ऐसा मार्मिक दस्तावेज़ है, जो पाठक को आरंभ से अंत तक बाँधे रखता है और अंत में मन को गहरे चिंतन के लिए विवश कर देता है। वह दास्तान "...हैलो... कैसी हैं आप?" "अच्छी हूँ। कहिए, क्या काम है?" "काम तो कुछ नहीं। बस ऐसे ही... किसी ने आपका नंबर दिया, तो मैंने मिला लिया।" "अच्छा! ठीक है।" दो दिन बाद फिर वही आवाज़ आई— "हैलो... कैसी हैं आप?" "मैं बढ़िया हूँ। आप बताइए, कैसे याद किया?" "बस यूँ ही... दिल ने चाहा कि आपकी आवाज़ सुन ली जाए।" "अच्छा, तो सुन ली न..." उसने खिलखिलाते हुए कहा, "अब रखिए फोन।" इतना सुनते ही फोन कट गया। अब तो यह अक्सर होने लगा। किसी भी व...

साथ-साथ - विजया डालमिया

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साथ-साथ भूमिका कुछ रिश्ते कभी कहे नहीं जाते, फिर भी जीवन भर साथ चलते रहते हैं। कुछ प्रेम-पत्र कभी भेजे नहीं जाते, फिर भी वे दो धड़कनों के बीच मौन संवाद बनकर जीवित रहते हैं। क्या प्रेम केवल शब्दों का मोहताज है, या खामोशियाँ भी अपने भीतर पूरे जीवन का संगीत समेटे रहती हैं? "साथ-साथ" ऐसी ही दो आत्माओं की कथा है, जो एक-दूसरे के अत्यंत निकट होकर भी अपने मन की बात कहने का साहस नहीं जुटा पातीं। यह कहानी पाठक को उस प्रश्न के सामने खड़ा करती है—यदि प्रेम दोनों ओर था, तो फिर दूरी किस बात की थी? क्या नियति ने उन्हें अलग रखा, या उनकी अपनी चुप्पियों ने? हर पंक्ति के साथ यह जिज्ञासा गहराती जाती है कि क्या दो अनकहे प्रेम अंततः एक-दूसरे तक पहुँच पाएँगे, या उनके बीच केवल अधूरे एहसास ही रह जाएँगे? उत्तर जानने के लिए आइए, प्रवेश करें एक ऐसी भावनात्मक यात्रा में, जहाँ शब्द कम हैं, पर संवेदनाएँ अथाह हैं। कहानी जान से प्यारे, सबसे प्यारे... प्यार ही प्यार...** आज बड़ा ही अजीब लग रहा है, यूँ तुमसे मुखातिब होते हुए। यूँ तो खयालों में तुम्हें लाकर हमेशा ही तुमसे बातें करती रही हूँ, पर आज ख़त को माध्यम...

नन्ही रोशनी - विजया डालमिया

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  नन्ही रोशनी भूमिका जीवन में कुछ मुलाकातें संयोग नहीं, ईश्वर का स्नेहिल उपहार होती हैं। वे बिना किसी पूर्व परिचय के हमारे जीवन में आती हैं और धीरे-धीरे हमारे भीतर जमी उदासी, अकेलेपन और निराशा को प्रेम, अपनत्व और विश्वास के रंगों से भर देती हैं। 'नन्ही रोशनी' ऐसी ही एक हृदयस्पर्शी कहानी है, जिसमें एक मासूम बच्ची की सहज निश्छलता एक अकेले व्यक्ति के सूने जीवन को नई दिशा देती है। यह केवल दो व्यक्तियों के मिलने की कथा नहीं, बल्कि उन रिश्तों की कहानी है जो रक्त से नहीं, संवेदना, करुणा और आत्मीयता से जन्म लेते हैं। कहानी का प्रत्येक प्रसंग पाठक को भावनाओं की उस यात्रा पर ले जाता है, जहाँ मानवता सबसे बड़ा धर्म बनकर सामने आती है। अंत तक पहुँचते-पहुँचते यह कथा आँखों को नम कर देती है और हृदय में यह विश्वास जगा देती है कि ईश्वर जब किसी का एक सहारा छीनता है, तो कहीं न कहीं किसी दूसरे के रूप में नई रोशनी भी अवश्य भेजता है। कहानी नन्ही रोशनी यूँ तो सुबह रोज़ होती है, पर वह सुबह मेरी ज़िंदगी की सबसे प्यारी और अनमोल सुबह बन गई। मैं बालकनी में बैठा चाय के साथ अख़बार पढ़ने का आनंद ले रहा था। तभ...

भीगे पल

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  भीगे पल भूमिका कुछ मुलाकातें समय की धारा में बहकर भी स्मृतियों के तट पर सदैव जीवित रहती हैं। वे किसी रिश्ते का नाम नहीं माँगतीं, फिर भी जीवन का सबसे गहरा अहसास बन जाती हैं। प्रेम कभी-कभी मिलन से नहीं, त्याग से अपनी ऊँचाई पाता है। प्रस्तुत कहानी 'भीगे पल' ऐसे ही दो संवेदनशील हृदयों की कथा है, जहाँ बरसात केवल धरती को नहीं, मन के उन कोनों को भी भिगो देती है जिन्हें जिम्मेदारियों ने वर्षों से सूखा रखा था। आइए, पढ़ते हैं एक ऐसी कहानी, जो समाप्त होकर भी लंबे समय तक भीतर गूँजती रहती है। कहानी : भीगे पल बरसते, भीगते मौसम के साथ शिल्पा का मन भी आज न जाने क्यों भीगता चला जा रहा था। यूँ तो उसने कभी मौसम के बदलाव का अपने भीतर कोई विशेष प्रभाव महसूस नहीं किया था। जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते-निभाते न जाने कितने मौसम यूँ ही गुजर गए और उसे पता भी नहीं चला। उसकी जिंदगी एक सीधी, सरल रफ्तार से चल रही थी। पर प्रकृति का प्रत्येक क्रियाकलाप एक निश्चित विधान के अनुसार चलता है। हम उससे और वह हमसे कब जुड़ जाती है, इसका आभास भी नहीं होता। इसी बरसात के मौसम में एक दिन, जब वह कैब के इंतजार में खड़ी थ...

कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता..- विजया डालमिया

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कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता.. भूमिका जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें न समाज कोई नाम देता है, न किसी बंधन की आवश्यकता होती है। वे न रक्त से जुड़े होते हैं, न किसी औपचारिक परिचय से, फिर भी हृदय के सबसे निकट बस जाते हैं। कभी किसी मुस्कान से, कभी किसी मौन प्रतीक्षा से और कभी किसी नन्हे से स्पर्श से जन्म लेने वाले ये संबंध हमें यह एहसास कराते हैं कि प्रेम का सबसे सुंदर रूप वही है, जो बिना किसी अपेक्षा के केवल अपनापन बाँटता है। आख़िर ऐसा क्या होता है कि एक अनजाना साथ भी जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है? और जब वह साथ अचानक छूट जाए, तो क्यों प्रकृति का सारा सौंदर्य भी फीका लगने लगता है? आइए, पढ़ते हैं एक ऐसी ही भावपूर्ण कहानी, जो यह सिखाती है कि सच्चे रिश्तों की पहचान उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके एहसास से होती है। कहानी कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता... रंग-बिरंगी फूलों की झालर भी आज नेहा के दिल को नहीं लुभा रही थी। कितने दिनों से उसने उसे नहीं देखा था। पिछले कुछ दिनों से जब भी वह अपनी बालकनी में आती, सामने फैली हरियाली को देखकर उसका मन भी हरा-भरा हो उठता। अभी कुछ ही दिन पहले वह इस नए...

"काहे को ब्याही विदेश..."

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"काहे को ब्याही विदेश..." भूमिका " काहे को ब्याही विदेश..." केवल एक कहानी नहीं, बल्कि हर उस बेटी के मन की अनकही पीड़ा है, जिसके लिए पिता संसार का सबसे सुरक्षित आश्रय होते हैं। यह कथा बचपन की मधुर स्मृतियों, पिता-पुत्री के अनुपम स्नेह, समय की निर्ममता और दूरियों की विवशता को इतनी सहजता से उकेरती है कि पाठक स्वयं को इसके पात्रों के बीच खड़ा महसूस करने लगता है। कहानी का प्रत्येक प्रसंग अंततः एक ऐसे प्रश्न पर आकर ठहरता है, जिसका उत्तर आज भी असंख्य बेटियाँ अपने आँसुओं में खोजती हैं—"ओ बाबुल मेरे... काहे को ब्याही विदेश..." कहानी "काहे को ब्याही विदेश..." "काहे को ब्याही विदेश..." गीत सुनते-सुनते मिनी फूट-फूटकर रो पड़ी। "क्यों... पापा, क्यों...?" उसे आजकल पापा की बहुत याद आ रही थी। आज पूरे तीन दिन हो चुके थे। उसकी पापा से बात नहीं हो पाई थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। रोते-रोते वह यादों की उस अमराई में पहुँच गई, जहाँ पापा मुस्कुराते हुए कहते थे, "बोल मेरी गुड़िया! क्या चाहिए तुझे? तू बोल तो सही।" और वह झट से अपनी फरमाइश उनक...

उफ़! ये कैसी विडम्बना

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उफ़! ये कैसी विडम्बना भूमिका अक्सर हम सुनते हैं कि मोबाइल से दूर रहो, यह समय नष्ट करता है और रिश्तों में दूरी लाता है। यह बात कई परिस्थितियों में सही भी हो सकती है। लेकिन जीवन के हर सत्य का एक दूसरा पक्ष भी होता है। किसी के लिए जो वस्तु केवल मनोरंजन का साधन है, वही किसी दूसरे के लिए जीवन का संबल, अपनों से जुड़े रहने का माध्यम और अकेलेपन का सबसे विश्वसनीय साथी बन जाती है। प्रस्तुत कहानी इसी विडम्बना को अत्यंत संवेदनशील ढंग से उजागर करती है। उफ़! ये कैसी विडम्बना "जिस वस्तु से सब कहते हैं—'दूर रहो', वही आज सुमन के जीने का सबसे बड़ा सहारा है।" मोबाइल आज के समय की सबसे आवश्यक वस्तुओं में से एक बन चुका है। उसने न जाने कितनी चीज़ों का स्थान ले लिया है—पर्स, घड़ी, टॉर्च, डायरी, कैमरा, डाकिया और अपनों से मिलने का सबसे सरल माध्यम। किसी-किसी के लिए तो यह जीवन जीने का सहारा भी बन जाता है। इसी विषय पर यह छोटी-सी कहानी... मुझे बहुत खुशी हुई जब पता चला कि मेरी बचपन की सहेली सुमन भी इसी कॉलोनी में रहने आ गई है। मैंने तुरंत एक परिचित से उसका पता लिया और बिना बताए उसे सरप्राइज़ देने प...