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Showing posts from May, 2026

स्क्रीन के उस पार (लघुकथा)

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स्क्रीन के उस पार माया देवी कई महीनों से कैंसर से लड़ रही थीं। दर्द बढ़ता जा रहा था, लेकिन आँखों में एक ही इंतज़ार था—अपनी बेटी नंदिता का। नंदिता अमेरिका में बस चुकी थी। जब उसे माँ की बीमारी का पता चला, उसने हर बार एक ही बात कही, “माँ, मैं आ रही हूँ... बस कुछ काम निपटा लूँ।” दिन बीतते गए। काम खत्म नहीं हुए, बहाने खत्म नहीं हुए। माया देवी अस्पताल के बिस्तर पर लेटी रहतीं और दरवाज़े की ओर देखती रहतीं। हर आहट पर लगता, शायद बेटी आ गई। लेकिन दरवाज़ा कभी नहीं खुला। एक दिन डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। परिवार ने नंदिता को फोन किया। उधर से आवाज़ आई, “मैं अभी नहीं आ सकती। अगर... अगर कुछ हो जाए तो वीडियो कॉल पर दिखा देना।” कुछ घंटों बाद माया देवी की साँसें थम गईं। अंतिम संस्कार के समय मोबाइल एक तरफ रखा था। स्क्रीन पर नंदिता थी। उसने कुछ पल देखा, आँसू पोंछे और कॉल कट गई। समय आगे बढ़ गया।  भारत कब आओगी?” नंदिता ने सहज स्वर में कहा, “अब आकर क्या करूँगी? मम्मी तो हैं नहीं।” यह वाक्य हवा में नहीं खोया। कहा जाता है, आत्माएँ शब्द नहीं भूलतीं। उस रात जैसे माया देवी की आत्मा अपनी पुरानी चौखट पर बैठी थी। व...

पाप और पुण्य - सुलोचना धनावत

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पाप और पुण्य भूमिका मनुष्य जीवन कर्मों की भूमि है। हम जो भी करते हैं—चाहे अच्छा हो या बुरा—उसका प्रभाव कहीं न कहीं हमारे जीवन पर अवश्य पड़ता है। कई बार व्यक्ति उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुँचकर अपने किए गए कर्मों का हिसाब लगाने लगता है और यह सोचता है कि अब कुछ अच्छे कार्य कर लिए जाएँ ताकि जीवन के पापों का बोझ हल्का हो सके। परंतु क्या केवल तीर्थयात्रा कर लेने से मनुष्य के पाप धुल जाते हैं? क्या बाहरी आडंबर ही पुण्य का मार्ग है, या फिर सच्चा पुण्य हमारे व्यवहार, दया, न्याय और संवेदनशीलता में छिपा होता है? इन्हीं प्रश्नों को सोचने पर विवश करती है यह प्रेरक और विचारोत्तेजक कहानी, जो बताती है कि ईश्वर की दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं होता। मनुष्य भले ही स्वयं को धर्मात्मा सिद्ध करने का प्रयास करे, लेकिन कर्मों का वास्तविक लेखा-जोखा ऊपर वाला ही रखता है। कहानी मनीराम बूढ़ा हो चला था। मन ही मन वह अपने किए गए पाप-कर्मों से डरकर कुछ पुण्य कमाने की योजना बनाने लगा। एक दिन उसने तीर्थयात्रा पर जाने का मन बनाया। उसके जाने की बात सुनकर पड़ोस के तीन और लोगों ने भी साथ चलने की सोच बना ली। वे भी स्वभाव और कर...

एक घटना, दो पहलू

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एक घटना, दो पहलू  यह कहानी है दो जुड़वां बहनों सीता और गीता की। दोनों में मात्र दस मिनट का अंतर था। एक किसान दंपति के घर दोनों का जन्म हुआ। गांव के माहौल में पली बढ़ी सीता और गीता वहीं के सरकारी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने लगीं। उच्च प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनकी शिक्षा की गति रुक गई क्योंकि आगे की पढ़ाई के लिए बाहर भेजना उनके घर वालों के वश में नहीं था।  दोनों ही पढ़ाई में बहुत होशियार थीं लेकिन परिस्थितियों अनुकूल नहीं थीं। समय पंख लगा कर उड़ने लगा। कुछ समय पश्चात सीता और गीता की शादी की चर्चा होने लगी। दोनों हम उम्र होने के कारण उनके माता-पिता ने दोनों की शादी भी एक साथ करने का निर्णय लिया। दोनों का रिश्ता अलग-अलग घर में तय हुआ। सीता की बारात साजनपुर से तथा गीता की बारात माखनपुर से आने वाली थी। आज दोनों की विदाई की वेला भी आ गई। किसान दंपति ने अपनी क्षमता के अनुसार दोनों बेटियों की शादी की व्यवस्था की। दोनों बहनें अपने-अपने ससुराल में शादीशुदा जीवन जीने लगीं। सीता का पति रमेश एक समझदार, पढ़ा लिखा व्यक्ति था। शिक्षा उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। उसने सीता से अ...

अति लघु कथा

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भूख बता ..."जल्दी बता... क्या लिखकर भेज रहा था? जासूसी करता है। मुंह खोलता है या नहीं.... यह कहते हुए इंस्पेक्टर ने उस बूढ़े और कमजोर इंसान की पीठ पर इतनी जोर से डंडा मारा कि वह वहीं ढेर हो गया।  उसके हाथ में कागज की एक पर्ची थी जिस पर लिखा था.... बहुत भूख लगी है.... रचनाकार विजया डालमिया  संपादक मेरी निहारिका और राष्ट्रीय संयोजिका  उलझन सुलझन (महिला लेखिका प्रकोष्ठ) हैदराबाद प्रस्तुति

संघर्ष - सुलोचना धनावत

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  संघर्ष भूमिका जीवन में सफलता, धैर्य और उपयोगिता किसी को सहज रूप से प्राप्त नहीं होती। हर मजबूत व्यक्तित्व के पीछे संघर्ष, अनुशासन और कठिन परिस्थितियों को सहने की कहानी छिपी होती है। जिस प्रकार सोना अग्नि में तपकर कुंदन बनता है, उसी प्रकार मनुष्य भी जीवन की कठिनाइयों से गुजरकर परिपक्व और सक्षम बनता है। प्रस्तुत लघुकथा इसी सत्य को सरल और प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करती है। लघुकथा   संघर्ष मिट्टी ने घड़े से पूछा, “मैं भी मिट्टी हूँ और तू भी मिट्टी। फिर पानी मुझे बहा ले जाता है, जबकि तू पानी को अपने भीतर संभालकर रख लेता है। कई दिनों तक पानी भरा रहने पर भी वह तुझे गला नहीं पाता, ऐसा क्यों?” घड़ा मुस्कुराकर बोला, “यह सच है कि मैं भी मिट्टी हूँ और तू भी मिट्टी। परंतु मुझे पहले पानी में भिगोकर रखा गया, फिर पैरों से गूँधा गया। उसके बाद मुझे चाक पर घुमाया गया। इतना ही नहीं, मैंने थापी की चोटें भी सही हैं और अंत में आग में तपाया गया। इन सब कठिन यातनाओं और संघर्षों को सहने के बाद ही मुझमें यह क्षमता आई कि मैं पानी को अपने भीतर संभाल सकूँ। आज मैं गर्मी के दिनों में सबकी प्यास बुझाकर उन्हें...

सुमन की सुगंध - विजया डालमिया

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  सुमन की सुगंध लेखिका : विजया डालमिया  (संपादक, मेरी निहारिका और राष्ट्रीय संयोजिका, उलझन सुलझन महिला लेखिका प्रकोष्ठ, हैदराबाद)। भाग 1 “दी… कहाँ हो आप?” कहते हुए प्राची उसके सामने आ खड़ी हुई। आज प्राची की आँखों में खुशी की एक अलग ही चमक थी। वह शायद भागती हुई आई थी, इसलिए हाँफ रही थी। मैंने उससे कहा, “अरे… रे… क्या हुआ? क्यों एरोप्लेन बनी हुई है?” वह उत्साह से बोली, “सच दी, आज तो मैं वाकई एरोप्लेन बनकर आसमान में उड़ जाना चाहती हूँ।” “क्यों?” मैंने मुस्कुराते हुए पूछा। “सोचो… सोचो…” उसने आँखें मटकाते हुए कहा। मैंने हल्की शरारत से कहा, “तेरे देव भैया का लेटर आया है?” “अरे हाँ! पर आपको पता है, देव भैया आ रहे हैं!” “अच्छा?” मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा। फिर उसे पानी का गिलास पकड़ाते हुए अपनी बढ़ी हुई धड़कनों पर काबू करते हुए पूछा, “कब?” “कल! दी, मुझे बहुत तैयारी करनी है,” कहकर प्राची फुर्र से चली गई, पर मेरे दिल में एक अनजानी बेचैनी जगा गई। देव… जिसे मैं प्राची की नजरों से इतना जान चुकी थी कि वह मेरे लिए अजनबी रह ही नहीं गया था। साल भर पहले ही मैंने प्राची के घर में किराएदार के रू...

शिक्षा की ललक

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शिक्षा की ललक यह कहानी 12 वर्षीय बालिका सोना की है। उसका जन्म एक छोटे से गाँव अमीरपुर में हुआ था। उसके माता-पिता साधारण किसान थे। उस गाँव में शिक्षा का माहौल अधिक नहीं था, विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा को लेकर। अधिकांश बालिकाएँ घर पर रहकर घरेलू कार्यों में अपनी माँ का हाथ बँटातीं, फिर खेतों पर चली जातीं या जानवर चराने निकल जातीं। सोना की दिनचर्या भी कुछ ऐसी ही थी। वह अपनी माँ के साथ प्रतिदिन खेतों पर जाती या घर पर रहकर घरेलू कार्यों में सहयोग करती। हालाँकि, सोना में एक बात अन्य लड़कियों से बिल्कुल अलग थी—उसे पढ़ाई में बहुत रुचि थी। कुछ समय बाद सरकार द्वारा साक्षरता अभियान चलाया गया। रिश्ते में उसके चचेरे भाई के पास इसकी योग्यता थी, इसलिए उसे साक्षरता कार्यक्रम के संचालन का कार्य सौंप दिया गया। वह प्रतिदिन शाम को प्रौढ़ महिला-पुरुषों को अक्षर ज्ञान देता था। जैसे ही सोना को इस बात का पता चला, वह भी शाम को अपने सभी कार्यों से निवृत्त होकर वहाँ पढ़ने जाने लगी। कुछ ही समय में उसने हिंदी, अंग्रेज़ी और गणित विषयों का बुनियादी ज्ञान प्राप्त कर लिया। सोना के चचेरे भाई ने उसकी पढ़ाई के प्रत...

दीवार के उस पार

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  कहानी "दीवार के उस पार" गाँव के अंतिम छोर पर एक पुराना अखाड़ा था, जहाँ वर्षों से पहलवानों की पीढ़ियाँ कुश्ती सीखती रही थीं। उस अखाड़े में एक साधारण लेकिन ज़िद्दी लड़का रोज़ आता — नाम था वीर। वीर न तो बहुत बलवान था, न ही चालाक। लेकिन उसके भीतर एक आग थी — खुद को साबित करने की। हर बार अखाड़े में उतरता और हर बार हार जाता और लोग हँसते।  साथी पहलवान ताने कसते- "तेरे बस की बात नहीं वीर!" "छोड़ दे अखाड़ा, दूसरों की ताकत देख!" कभी-कभी तो उसे ये भी सुनना पड़ता - "तू तो बस सामने वाले की थकावट का इंतज़ार करता है-  खुद से कुछ नहीं करता!" एक दिन...एक संन्यासी आचार्य निखिल जी महाराज अखाड़े के बाहर बैठे थे। वो गाँव में प्रवचन के लिए आए थे। वीर ने झिझकते हुए प्रणाम किया और पूछा- "गुरुदेव, क्या जीत का रास्ता दूसरों की गलती से भी बनता है?" आचार्य जी मुस्कराए। आँखें जैसे वीर के मन की तहों में उतर गईं। "अपनी ताकत से लड़ना सीखिए, न कि दूसरों की कमजोरी से,क्योंकि सफलता अपने प्रयास से मिलती है —दूसरों की विफलता से नहीं।" यह कहकर वे उठे और अखाड़े की...