गुनता हुआ जीवन (कहानी)
गुनता हुआ जीवन नगर के बीचोंबीच स्थित एक पुराने प्रकाशन संस्थान में नील नाम का एक युवक कार्य करता था। वह तेज बुद्धि का था, पर उससे भी अधिक वह जीवन को “गुनने” में विश्वास रखता था। उसके लिए हर अनुभव एक पाठ था, हर संवाद एक चिंतन और हर कार्य एक साधना। संस्थान में नई तकनीकों का प्रवेश हो चुका था। हर कार्य शीघ्रता से करने के लिए कृत्रिम साधनों का उपयोग बढ़ता जा रहा था। सहकर्मी कहते— “नील, अब इतना सोचने की क्या आवश्यकता? सॉफ्टवेयर है, वह सब कर देगा।” नील मुस्कुराता और शांत स्वर में कहता— “सुविधा का उपयोग ठीक है, पर विचार का स्थान कोई साधन नहीं ले सकता।” एक दिन संस्थान के प्रधान संपादक ने उसे एक नई पुस्तक की योजना तैयार करने का दायित्व दिया। विषय था—समकालीन समाज और बुद्धिमत्ता। नील ने कई दिनों तक पुस्तकों का अध्ययन किया, लोककथाएँ पढ़ीं, पुराने चरित्रों की कथाएँ याद कीं, जीवन के अनुभवों को मन ही मन गुनता रहा। उसने शीघ्रता नहीं, बल्कि गहराई को चुना। जब योजना तैयार हुई तो वह अत्यंत मौलिक, संतुलित और चिंतनशील थी। परंतु प्रबंधन ने उस पर तत्काल विश्वास नहीं किया। उन्होंने कहा— “इसे बाजार में सर्वाधिक...