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Showing posts from February, 2026

गुनता हुआ जीवन (कहानी)

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गुनता हुआ जीवन नगर के बीचोंबीच स्थित एक पुराने प्रकाशन संस्थान में नील नाम का एक युवक कार्य करता था। वह तेज बुद्धि का था, पर उससे भी अधिक वह जीवन को “गुनने” में विश्वास रखता था। उसके लिए हर अनुभव एक पाठ था, हर संवाद एक चिंतन और हर कार्य एक साधना। संस्थान में नई तकनीकों का प्रवेश हो चुका था। हर कार्य शीघ्रता से करने के लिए कृत्रिम साधनों का उपयोग बढ़ता जा रहा था। सहकर्मी कहते— “नील, अब इतना सोचने की क्या आवश्यकता? सॉफ्टवेयर है, वह सब कर देगा।” नील मुस्कुराता और शांत स्वर में कहता— “सुविधा का उपयोग ठीक है, पर विचार का स्थान कोई साधन नहीं ले सकता।” एक दिन संस्थान के प्रधान संपादक ने उसे एक नई पुस्तक की योजना तैयार करने का दायित्व दिया। विषय था—समकालीन समाज और बुद्धिमत्ता। नील ने कई दिनों तक पुस्तकों का अध्ययन किया, लोककथाएँ पढ़ीं, पुराने चरित्रों की कथाएँ याद कीं, जीवन के अनुभवों को मन ही मन गुनता रहा। उसने शीघ्रता नहीं, बल्कि गहराई को चुना। जब योजना तैयार हुई तो वह अत्यंत मौलिक, संतुलित और चिंतनशील थी। परंतु प्रबंधन ने उस पर तत्काल विश्वास नहीं किया। उन्होंने कहा— “इसे बाजार में सर्वाधिक...

हरनंदी का अद्भुत त्याग

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कहानी के लिए भूमिका प्रस्तुत घटनाक्रम वास्तविकता है जिसका कथा रूपांतर उलझन सुलझन की अजमेर महिला विंग की स्थानीय सम्पादिका श्रीमती छाया शर्मा के द्वारा किया गया है जो मानवीय भावों को समग्र रूप में समझने वाली एक मानव संपदा हैं। कहानी को पढ़िए और महसूस कीजिए भावों के इस अद्भुत संसार को। हरनंदी का अद्भुत त्याग हरनंदी साधारण परिवार की मेहनतकश महिला थीं, जो घर-घर जाकर सहायिका के रूप में सेवा देती थीं। उनकी आय सीमित थी, जिम्मेदारियाँ बड़ी थीं और जीवन हर दिन एक चुनौती जैसा था। एक दिन, उनके जीवन की स्थिर धारा अचानक थम सी गई। उनके बेटे की तबियत अचानक बिगड़ी। डॉक्टर ने गंभीर चेहरे के साथ कहा, “आपके बेटे की किडनी अब सही ढंग से काम नहीं कर रही है। किडनी प्रत्यारोपण ही एकमात्र उपाय है। जल्दी निर्णय लेना होगा।” हरनंदी के हाथ पाँव फूल गए। उनके पति ने धीरे से कहा, “हम… हम इसे कैसे सम्भालेंगे? खर्च बहुत बड़ा है।” हरनंदी ने अपने बेटे को देखते हुए निश्चय भरे स्वर में बिना एक पल गंवाए निर्णय लिया— “हम जो कुछ भी हैं, सब पीछे छूट जाएगा। लेकिन बेटा जी उठेगा, यही मेरी जिम्मेदारी है। मैं अपनी किडनी दूँगी।” यह स...

नशा - डॉ परवीन नाज़

नशा   दिसंबर की वो मनहूस रात अपने साथ अज़ीब-सी खामोशी लिए हुए थी। महिबा का मन बेचैन था, किसी अनहोनी की दस्तक से!! उसके कमरे में अचानक बाहर से एक चमगादड़ घुस आया था। उसने सुना था, चमगादड़ का यूं घर में आना अशुभ होता है। महिबा के दिल और दिमाग में द्वंद्व का तूफान-सा मच गया। वो न चाहते हुए भी अपने आपको इस अंधविश्वास पर विश्वास करने से रोक नहीं पा रही थी कि कुछ अशुभ होने वाला है। जैसे-तैसे उस चमगादड़ को बाहर निकालने के बाद स्वयं को दिलासा दे पाई लेकिन पूरी रात बेचैनी में गुजरी। सुबह-सुबह उसके फोन की घंटी बजी। उसने फोन उठाया तो फोन घर से था! फोन में अना जोर-जोर से रो रही थी। “चाची सब खत्म हो गया…!”  "क्या बेटा? क्या हुआ?" महिबा ने हैरत से पूछा! "चाची वो….. वो… अजहर चला गया…..", अना ने कहा! "ओह्ह!! कब? कैसे?" महिबा बोली! महिबा जान चुकी थी कि अजहर, जो पिछले कई महीनों से बीमार था, अब नहीं रहा..!! महिबा ने कहा- “हम अभी आते हैं अना, तुम रोना नहीं।” महिबा पास के दूसरे मोहल्ले में अपने नये घर में हाल ही में शिफ्ट हुई थी। अभी लगभग पंद्रह वर्ष पहले की ही तो बात है जब अज...

इन्तज़ार (कहानी)

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  इन्तज़ार शारदा देवी एक गंभीर स्वभाव की महिला है। सिलाई मशीन से थोड़ा-बहुत खर्च निकाल लेती है। बेटी, जिसकी शादी के बाद वह पहली बार मायके आई है, माँ के पास आकर चुपचाप खड़ी हो जाती है और धीरे से पूछती है— “माँ, आपको पिताजी पर गुस्सा नहीं आता क्या?” शारदा देवी उसके चेहरे पर प्यार से हाथ फेरते हुए शांत स्वर में कहती हैं— “मेरे गुस्सा होने से क्या होगा? क्या तुम्हारा बचपन फिर से लौट आएगा? या मेरा बीता हुआ वक्त वापस आ जाएगा? और फिर, उनमें और मुझमें फर्क ही क्या रह जाएगा? जब मुझे उनकी ज़रूरत थी, उन्होंने मेरा साथ नहीं दिया। अब उन्हें हमारी ज़रूरत है, तो क्या हम उन्हें घर से निकाल देंगे?” बेटी को समझाकर वह उसे शांत करती हैं और फिर अपने काम में व्यस्त हो जाती हैं। पर बेटी की बात ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था। आज से तीस साल पहले, जब वह ब्याह कर इस घर में आई थीं, तब घर में सास-ससुर, एक देवर और एक ननद थे—छोटा-सा, सादा परिवार। कुछ दिन तो सब ठीक-ठाक चलता रहा। फिर देवर की दूसरे शहर में नौकरी लग गई; वह अपनी पत्नी को लेकर शहर चला गया। ननद भी अपने घर में सुखी थी। लेकिन उनके पति को बिना किसी को बत...

कभी-कभी…(कहानी)

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 भूमिका प्रस्तुत कहानी स्मृतियों की उस कोमल भूमि पर खड़ी है, जहाँ संबंधों का जन्म शब्दों से नहीं, बल्कि एहसासों की निःशब्द वर्षा से होता है। यहाँ प्रेम का कोई घोषित रूप नहीं, कोई वादा नहीं, फिर भी एक ऐसा आत्मिक जुड़ाव है जो धीरे-धीरे आदत, आवश्यकता और अंततः जीवन का हिस्सा बन जाता है। राजीव और उसकी ‘मैडम’ के बीच पनपा यह अनकहा रिश्ता सामाजिक परिभाषाओं से परे, संवेदनाओं की सूक्ष्म परतों को उजागर करता है—जहाँ दूरी भी निकटता को मिटा नहीं पाती और विदाई भी स्मृति को समाप्त नहीं कर पाती। यह कथा पाठक को यह समझने का अवसर देती है कि जीवन में कुछ रिश्ते साथ रहकर नहीं, बल्कि याद बनकर अधिक गहरे और स्थायी हो जाते हैं; और कभी-कभी, अधूरी कहानियाँ ही मन के सबसे पूर्ण अध्याय बन जाती हैं। कभी-कभी…(कहानी) वक्त की बारिश में भीगी-भीगी ज़िंदगी की शाखों से रिसकर जब कुछ पल टपकते हैं, तो कई यादें ख्यालों की ज़मीन पर उग आती हैं। बिना आवाज़, बिना दस्तक, खामोशी से किसी की याद दिल में उतरकर बारिश की तरह बरसने लगती है, और दिल के पास, कमबख़्त, न तो रेनकोट होता है, न ही छतरी। राजीव चाय की चुस्कियाँ लेते-लेते यादों ...