निर्णय का निर्वाण (लघुकथा)
लघुकथा
निर्णय का निर्वाण
सोमेश बरामदे में बैठा दूर तक जाती धुंध को देख रहा था।
सर्द हवा में कोई ठंड नहीं थी,
बस भीतर की उलझनें बाहर ठहर गई थीं।
दो प्रस्ताव उसके सामने थे—
एक चमकदार नौकरी विदेश में, दूसरा गाँव लौटकर अपने पिता की पुराने पुस्तकालय को फिर से जीवित करना।
बुद्धि कहती—
“विदेश जाओ, अवसर पाओ।”
हृदय कहता—
“यहाँ रहो, जहाँ जड़ें हैं।”
और मन?
वह दोनों को एक साथ पकड़कर खड़ा था—उलझा हुआ, थका हुआ।
उसी क्षण सोमेश के गुरु, आचार्य विवेकानंद, चुपचाप उसके पास आकर बैठ गए।
कुछ देर मौन रहा—एक ऐसा मौन जिसमें समाधान का बीज छिपा था।
गुरु मुस्कुराए बोले—
“भ्रम कभी विकल्पों से नहीं उपजता,यह उस क्षण पैदा होता है जब मन अपनी ही परछाई को सत्य मान बैठता है। तुमने अपने हर विचार को बराबर का वजन दे दिया है,
इसीलिए मन डगमगा रहा है।”
“तो क्या करूँ?” सोमेश ने धीमे स्वर में पूछा।
आचार्य ने दूर क्षितिज की ओर इशारा किया।
“देखो, धुंध फैली है।”
“हाँ, पर सड़क तो फिर भी वहीं है,” सोमेश ने उत्तर दिया।
“बस यही समझ लो,” गुरु बोले,“धुंध आए या जाए,
राह अपनी जगह से हिलती नहीं। भ्रम मन का मौसम है,
निर्णय जीवन की दिशा।
यदि दिशा स्पष्ट हो तो मौसम मायने नहीं रखता।”
सोमेश ने गहरी सांस ली। उसे लगा मानो मन का कोहरा पिघलकर दिशा स्वयं उसके सामने आ खड़ी हुई हो।
रचनाकार
डाॅ. छाया शर्मा, अजमेर, राजस्थान


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