इन्तज़ार (कहानी)
इन्तज़ार
शारदा देवी एक गंभीर स्वभाव की महिला है। सिलाई मशीन से थोड़ा-बहुत खर्च निकाल लेती है। बेटी, जिसकी शादी के बाद वह पहली बार मायके आई है, माँ के पास आकर चुपचाप खड़ी हो जाती है और धीरे से पूछती है—
“माँ, आपको पिताजी पर गुस्सा नहीं आता क्या?”
शारदा देवी उसके चेहरे पर प्यार से हाथ फेरते हुए शांत स्वर में कहती हैं—
“मेरे गुस्सा होने से क्या होगा? क्या तुम्हारा बचपन फिर से लौट आएगा? या मेरा बीता हुआ वक्त वापस आ जाएगा? और फिर, उनमें और मुझमें फर्क ही क्या रह जाएगा? जब मुझे उनकी ज़रूरत थी, उन्होंने मेरा साथ नहीं दिया। अब उन्हें हमारी ज़रूरत है, तो क्या हम उन्हें घर से निकाल देंगे?”
बेटी को समझाकर वह उसे शांत करती हैं और फिर अपने काम में व्यस्त हो जाती हैं। पर बेटी की बात ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था।
आज से तीस साल पहले, जब वह ब्याह कर इस घर में आई थीं, तब घर में सास-ससुर, एक देवर और एक ननद थे—छोटा-सा, सादा परिवार। कुछ दिन तो सब ठीक-ठाक चलता रहा। फिर देवर की दूसरे शहर में नौकरी लग गई; वह अपनी पत्नी को लेकर शहर चला गया। ननद भी अपने घर में सुखी थी।
लेकिन उनके पति को बिना किसी को बताए बार-बार घर से चले जाने की आदत थी। पहले-पहल शारदा को बहुत चिंता होती थी। कभी-कभी तो वह एक-एक साल तक नहीं लौटते थे। कहाँ हैं, यह भी किसी को नहीं पता होता। न कोई खत, न कोई संदेश।
शारदा बहुत परेशान रहती। सास कहतीं—
“इसे तो बचपन से ही ऐसी आदत है। तुम ही इसे थोड़ा समझाओ।”
इसी बीच उन्हें दो बच्चे भी हो गए। सास ने एक दिन समझाते हुए कहा—
“अब तो एक जगह टिककर रहो। इतने प्यारे बच्चे हैं, अब तो अपनी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी।”
पर उनके पति को कभी भी जिम्मेदारी का एहसास नहीं हुआ।
एक दिन सास और ससुर ने विचार किया कि बहू और बच्चों को उसके साथ भेज दिया जाए। उन्होंने बेटे से कहा—
“हम अब बूढ़े हो गए हैं। इतने दिनों से हम तुम्हारा परिवार संभाल रहे हैं। अब तुम इन्हें अपने साथ ले जाओ। हम छोटे बेटे के पास जाकर रहेंगे।”
उसने भी सहजता से कहा—
“हाँ, ठीक है। मैं अपने साथ ले जाऊँगा।”
यह सुनकर शारदा का मन उमंग से भर गया। वह अपना छोटा-सा घर बसाने के सपने देखने लगी। उसने सास के साथ मिलकर जाने की तैयारी शुरू कर दी। दोनों बच्चों को लेकर वह खुशी-खुशी विदा हुई।
वे मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव में उतरे। शारदा ने पूछा तो वह बोला—
“मेरे एक दोस्त से पैसे आने हैं। वही ले लेते हैं। अभी हमें नया घर भी लेना है। बच्चे भी साथ हैं। बस, कल ही हम इंदौर के लिए निकलेंगे।”
वह उन्हें एक धर्मशाला में ले आया। पहले धर्मशालाओं में ठहरने का पैसा नहीं लगता था। उन्हें एक कमरे में बैठाकर वह यह कहकर निकल गया कि दोस्त के घर जा रहा है।
शारदा ने थैले से बिस्किट निकालकर चार साल के बबलू को दे दिए। वह खाने लगा, पर दस महीने की गुड्डी को दूध चाहिए था और वह रोने लगी। शारदा उसे गोद में लेकर चुप कराने लगी। बार-बार उसकी नज़र दरवाज़े पर टिक जाती।
दो-तीन घंटे बीत गए, पर उसका कोई पता नहीं था। अब शारदा की चिंता बढ़ने लगी—
“दोनों बच्चों को लेकर मैं कहाँ जाऊँ?”
इतने में धर्मशाला का मैनेजर आया और बोला—
“क्या बात है, बहन जी? बच्ची क्यों रो रही है?”
शारदा ने झिझकते हुए कहा—
“इसका दूध पीने का समय हो गया है… अभी इसके पिताजी आ जाएँगे तो दूध ले आएँगे।”
वह फिर से बच्ची को घुमाने लगी। समय बीतता गया और उसकी घबराहट बढ़ती गई। रात के दस बज गए। मैनेजर खुद दूध लाकर दे गया।
बाहर तेज बारिश शुरू हो चुकी थी। उसने दोनों बच्चों को चादर बिछाकर सुला दिया और मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगी। किसी तरह रात कट गई, पर बारिश अब भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
सुबह मैनेजर ने आकर पूछा—
“कैसे हैं बच्चे? आपके पति आ गए न?”
शारदा ने चुपचाप ‘ना’ में सिर हिला दिया।
मैनेजर ने ढाढ़स बंधाते हुए कहा—
“रात भर बारिश हुई है, शायद कहीं रुक गए होंगे। आप चिंता मत कीजिए, थोड़ी बारिश कम होगी तो आ जाएँगे।”
उसने नौकर के हाथ चाय-बिस्किट और बच्चों के लिए दूध भिजवा दिया। तभी गुड्डी को अचानक उल्टियाँ और दस्त शुरू हो गए। शारदा घबरा गई—
“इसे डॉक्टर के पास कैसे ले जाऊँगी?”
वह मैनेजर से बोली—
“आस-पास कोई दवाखाना है क्या? मेरी बेटी की तबीयत बिगड़ गई है।”
मैनेजर ने कहा—
“हमारी धर्मशाला में ही एक वैद्य जी हैं, बहुत जानकार हैं।”
वह वैद्य को साथ लेकर कमरे में आया। वैद्य ने बच्ची को देखकर दवा की पुड़िया बना दी। दो-तीन पुड़ियों में ही गुड्डी की हालत सुधरने लगी।
शारदा ने हाथ जोड़कर कहा—
“आप मेरे बड़े भाई की तरह मेरी मदद कर रहे हैं। मैं आपका यह उपकार कैसे चुकाऊँगी?”
मैनेजर मुस्कुराकर बोला—
“भाई भी कहती हो और उपकार की बात करती हो? तुम बिल्कुल चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।”
इतना अपनापन देखकर शारदा का मन भर आया। उसने अपने पति के स्वभाव के बारे में सारी बात बता दी—
“उन्हें सिर्फ खुद से प्यार है। न बच्चों से, न माँ-बाप से, न पत्नी से। जब आते हैं तो सबके लिए तोहफे ज़रूर लाते हैं, ताकि सब खुश रहें। पर इस बार तो उन्होंने मुझे ऐसा धोखा दिया है… वो छोटे बच्चे थोड़ी हैं जो खो जाएँगे! हमारी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी, इसलिए चले गए। अब मैं दो बच्चों को लेकर क्या करूँ?”
मैनेजर ने पूछा—
“अब तुम क्या करोगी, बहन?”
शारदा ने धीमे स्वर में कहा—
“मैं सास के पास वापस चली जाऊँगी।”
उसने एक पोस्टकार्ड लिखकर सास को भेजा। सास ने तुरंत ननद के बेटे को उन्हें लेने भेज दिया। जब शारदा घर लौटी, तो सास से लिपटकर बहुत रोई।
सास ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“आज से तुम मेरी बहू नहीं, बेटी हो। जब तक हम ज़िंदा हैं, तुम हमारी जिम्मेदारी हो।”
इसके बाद शारदा ने एक सिलाई मशीन खरीदी और धीरे-धीरे उसका काम चल पड़ा।
छह साल बाद उसका पति फिर लौटा। माँ-बाप ने उसे धिक्कारा, पर वह अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से सबको बहला लेता। बच्चों को भी उसके पास जाना अच्छा नहीं लगता था; उन्हें दादा-दादी और माँ से ही प्यार था।
समय बीतता गया। बच्चे बड़े हो गए। बेटे की शादी हो गई, फिर बेटी की शादी का समय भी आ गया। वह कभी अपना पता नहीं बताता, पर घर की सारी खबर रखता था। बेटे-बेटी की शादी में भी समय पर आ गया।
माँ-बाप समझते—“भगवान ने इसे प्रेरणा दी है।”
पर शारदा समझ चुकी थी—उसे समाज में अच्छा दिखना है।
अब न उसके आने की खुशी होती, न जाने का दुख। वह जितने दिन घर में रहता, शारदा उससे बस काम भर की बात करती। बेटी की शादी के बाद वह फिर चला गया।
अब वह कई बीमारियों से घिर चुका था। देखभाल करने वाला कोई नहीं था। इस बार जब वह लौटा, तो आते ही शारदा के सामने हाथ जोड़कर रो पड़ा—
“मैंने तुम्हें कभी कोई सुख नहीं दिया। तुम बहुत महान हो। तुमने मेरे माँ-बाप की भी सेवा की… बस एक बार अपने मुँह से कुछ कह दो। मुझसे लड़ो, झगड़ो, शिकायत करो। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ।”
शारदा क्या कहती?
वह अपनी वीरान आँखों से उसे देखती रही।
बेटा और बेटी यह सब देखकर बहुत क्रोधित हो जाते हैं। इसी कारण बेटी ने माँ से पूछा था—
“माँ, आपको पिताजी पर गुस्सा नहीं आता क्या?”
शारदा के मन में वर्षों का दर्द था, पर चेहरे पर सिर्फ धैर्य और मौन—एक लंबा, अटूट…
इन्तज़ार।
कहानीकार






Comments
Post a Comment