कभी-कभी…(कहानी)
भूमिका
प्रस्तुत कहानी स्मृतियों की उस कोमल भूमि पर खड़ी है, जहाँ संबंधों का जन्म शब्दों से नहीं, बल्कि एहसासों की निःशब्द वर्षा से होता है। यहाँ प्रेम का कोई घोषित रूप नहीं, कोई वादा नहीं, फिर भी एक ऐसा आत्मिक जुड़ाव है जो धीरे-धीरे आदत, आवश्यकता और अंततः जीवन का हिस्सा बन जाता है। राजीव और उसकी ‘मैडम’ के बीच पनपा यह अनकहा रिश्ता सामाजिक परिभाषाओं से परे, संवेदनाओं की सूक्ष्म परतों को उजागर करता है—जहाँ दूरी भी निकटता को मिटा नहीं पाती और विदाई भी स्मृति को समाप्त नहीं कर पाती। यह कथा पाठक को यह समझने का अवसर देती है कि जीवन में कुछ रिश्ते साथ रहकर नहीं, बल्कि याद बनकर अधिक गहरे और स्थायी हो जाते हैं; और कभी-कभी, अधूरी कहानियाँ ही मन के सबसे पूर्ण अध्याय बन जाती हैं।
कभी-कभी…(कहानी)
वक्त की बारिश में भीगी-भीगी ज़िंदगी की शाखों से रिसकर जब कुछ पल टपकते हैं, तो कई यादें ख्यालों की ज़मीन पर उग आती हैं। बिना आवाज़, बिना दस्तक, खामोशी से किसी की याद दिल में उतरकर बारिश की तरह बरसने लगती है, और दिल के पास, कमबख़्त, न तो रेनकोट होता है, न ही छतरी।
राजीव चाय की चुस्कियाँ लेते-लेते यादों की बारिश में भीग रहा था। पर वह इसमें अकेला नहीं था; उसके साथ थी उसकी मैडम।
अपने ट्रेनिंग पीरियड के दौरान बेंगलुरु में वह पहली बार वहीं मिला था उनसे। जिस पेइंग-गेस्ट में वह रहता था, वहाँ और भी कई लड़के थे। उन्होंने ही बताया था—
“मैडम से ज़रा संभल कर रहना। टाइम से उठ जाना, टाइम से खाना, टाइम से सोना।”
इन सारी हिदायतों के साथ एक हिदायत और थी—
“उनसे ज़्यादा बात मत करना। बहुत रिज़र्व हैं और अकड़ू भी।”
मैंने पूछा, “रिज़र्व हैं इसलिए अकड़ू हैं या…?”
उन्होंने कहा, “अकड़ू हैं, इसलिए रिज़र्व हैं।”
बात ख़त्म हो गई।
एक दिन सारे दोस्त बाहर गए हुए थे और मैं बीमार हो गया। तेज़ बुखार की वजह से न तो खाना खाया, न ही बाहर निकला। दवा लेने की भी हिम्मत नहीं थी। घर की याद करते-करते एक आँसू आँखों से टपक पड़ा।
इतने में… ठक-ठक…
“क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?”
देखा तो मैडम खड़ी थीं। मैं जैसे ही उठने की कोशिश करने लगा, वे बोल पड़ीं—
“अरे नहीं, लेटे रहो।”
तुरंत भीतर आकर उन्होंने मुझसे पूछा, “कब से बीमार हो?”
मैंने कहा, “आज सुबह से ही।”
“तो बताया क्यों नहीं?”
कहते-कहते वह इधर-उधर देखने लगीं। शायद थर्मामीटर ढूँढ रही थीं, पर वह था नहीं, इसलिए उन्हें दिखा नहीं। उन्होंने माथे पर हाथ रखा; माथा तप रहा था। उनकी आँखों में चिंता उभर आई। उन्होंने एक कॉल किया।
थोड़ी ही देर में एक आदमी थोड़े से फल, चाय-बिस्किट, थर्मामीटर और दवा के साथ हाज़िर था।
“लो, चाय पी लो।”
मैंने कहा, “मन नहीं है।”
तो वह कहने लगीं, “पर ज़रूरत है।”
और मुझे बिस्किट अपने हाथों से खिलाने लगीं। मैं सब कुछ चुपचाप करता जा रहा था, यह सोचते हुए कि कितनी अच्छी ‘अकड़ू’ हैं।
बाद में मुझे दवा देते हुए बोलीं,
“आगे से ऐसा कभी मत करना। मैं फिर आऊँगी।”
और चली गईं।
तो यह थी मेरी पहली मुलाकात मैडम के साथ।
उसके बाद, जब तक मैं ठीक नहीं हुआ, वह लगातार फोन के माध्यम से मेरा हालचाल पूछती रहीं और एक अंजाना-सा रिश्ता हम दोनों के बीच जैसे कायम हो गया। अब रोज़ सुबह-सुबह फोन की घंटी बजती और उधर से मैडम की आवाज़ आती—
“गुड मॉर्निंग, कैसे हो? सब ठीक? नींद आई? और कुछ नया?”
यह उनके फिक्स सवाल थे और मेरा फिक्स जवाब था—
“जी, सब ठीक।”
दिन यूँ ही गुज़रते गए और हमारी नज़दीकियाँ भी बढ़ती गईं। अब हमारी बातचीत का दायरा और बढ़ गया। वह हर बात मुझे अपने नज़रिए से समझाने लगीं, और ताज्जुब की बात यह थी कि उनका नज़रिया मुझे भाने लगा। मैं उनकी नज़रों से दुनिया देखने और समझने लगा।
वह कब मेरी ज़रूरत बन गईं, मुझे पता ही नहीं चला। कभी-कभी सोचता कि क्या वह भी मेरे बारे में कुछ ऐसा ही महसूस करती होंगी? पर नहीं… वे तो मुझसे बड़ी हैं। बस, यहीं आकर सारी सोच रुक जाती थी।
पर बातें तो हमारी दिन-रात, जब भी हम फ्री होते, होती ही रहतीं। हम आपस में अपनी सारी बातें—चाहे खुशी की हों या दुख की—शेयर करने लगे। वह मुझे कभी “गुड बॉय” और कभी “बुद्धू” कहने लगीं। मुझे उनके मुँह से यह सब सुनना बहुत अच्छा लगता था।
वह अपने परिवार से दूर यहाँ बेंगलुरु में पेइंग-गेस्ट चला रही थीं और मैं कब उन्हें अपनी ज़िंदगी में अपनी, बेहद अपनी समझ बैठा, पता ही नहीं चला। हर पल अजीब-सी बेचैनी और दिल में उनका ख़याल लिए जब सोता, तो रात उनके ख़्वाबों में गुज़रती; और सुबह होती उन्हीं की आवाज़ से रूबरू।
वह भीगा पल मुझे आज भी याद है।
मेरे सारे दोस्त दो दिनों के लिए कहीं बाहर छुट्टी मनाने गए थे। बारिश जमकर हो रही थी। मैं कंबल में दुबककर, आलस में बैठे-बैठे चाय की चुस्की ले ही रहा था, तभी दस्तक हुई। मुझे बेहद आलस आ रहा था।
मैंने कहा, “आ जाओ, दरवाज़ा खुला है।”
देखा तो सामने मैडम थीं।
“अरे… इतनी सुबह-सुबह? क्या बात है?”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। कुर्सी खींचकर बैठ गईं और मेरे हाथों से चाय लेकर पीने लगीं। एक पल मुझे लगा जैसे उन्होंने मुझे छू लिया हो। दूसरे ही पल उनके चेहरे पर मेरा ध्यान गया। गौर से देखा तो वहाँ उदासी, दर्द और एक सन्नाटा-सा दिखा। पता नहीं उस सन्नाटे में कितनी ही बातें शोर मचा रही थीं।
मैंने कहा, “क्या बात है? सब ठीक?”
“यह तो मेरा डायलॉग है,” कहकर वो धीरे से मुस्कुरा दीं।
“हाँ… तो फिर?”
“फिर कुछ नहीं। मैं कल बेंगलुरु से जा रही हूँ… हमेशा के लिए। मेरी सगाई पक्की हो गई है।”
एक ही साँस में वे यह सब कह गईं। मैं एकदम खामोश रहा, पर अंदर से जैसे सब कुछ भीगने लगा।
“बहुत-बहुत बधाई। अब तो कुछ मीठा हो जाए,”
कहकर मैं पलट गया—शायद अपने आँसुओं को छुपाने। एक डिब्बे से आँवला कैंडी ले आया।
उन्होंने मुझे देखा और कहा, “वाकई?”
मैं समझ नहीं पाया कि वह कुछ पूछ रही हैं या… मैं मुस्कुराने की कोशिश करने लगा, जिसे वे भाँप गईं।
मेरे पास आकर उन्होंने डिब्बा मेरे हाथों से लिया, एक तरफ रखा, मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बैठाकर खुद मेरे सामने बैठ गईं। फिर कहने लगीं—
“यह सिर्फ हम और तुम जानते हैं कि हम एक-दूसरे के लिए क्या हैं। कभी-कभी दिल बिना कुछ कहे जब किसी से जुड़ जाता है, तो वह बंधन बहुत गहरा और अमिट होता है। हमारी बातों के बीच जब कभी भी मौन पसरा होता था, न, तभी हमने सबसे ज़्यादा बातें की हैं। जहाँ शब्द नहीं होते और सिर्फ एहसास होते हैं, वही पल एकदम सच्चे होते हैं; क्योंकि तब धड़कनें, धड़कनों को सुनती हैं।”
मैं खामोशी से सिर्फ उन्हें देखता जा रहा था। मुझे महसूस हो रहा था जैसे मेरे सारे अंगों ने काम करना बंद कर दिया हो, सिवाय आँखों के।
उन्होंने फिर कहा,
“राजीव, तुम मेरे गुड बॉय हो। यह शादी मैं घर वालों के लिए कर रही हूँ। मेरे घर की हालत और परिस्थितियों से तुम अच्छी तरह वाकिफ हो।”
इतना कहते हुए उन्होंने मेरी आँखों में झाँका। मैंने नज़रें झुका लीं। उन्होंने धीरे से मेरी ठुड्डी पकड़कर मेरा सिर उठाया और फिर कहने लगीं—
“राजीव, आज का दिन फिर कभी नहीं आने वाला। शायद ही फिर कभी हम मिल पाएँ। पर आज मैं तुमसे एक वादा चाहती हूँ।”
“क्या?”
अपनी ही आवाज़ मुझे दूर से आती हुई महसूस हुई।
“बस, यही कि तुम अपनी ज़िंदगी में वह सब हासिल करोगे, जो तुम मुझे गर्व से बताया करते थे। मैं जानती हूँ, तुम भी अब चले जाओगे। लेकिन मुझे एक इजाज़त दे दो कि आज के बाद मैं तुम्हें फोन न करूँ।”
इतना सुनते ही मैं अपने आँसुओं को रोक नहीं पाया। उन्होंने आगे बढ़कर मेरे आँसू पोंछ दिए और सिसकते हुए कहने लगीं—
“तुम बहुत प्यारे और मासूम हो। हमेशा इस मासूमियत और सच्चाई को बरकरार रखना। आज तक हमने हमेशा हँसकर ही बातें की हैं, पर आज शायद पहली और आख़िरी बार हम साथ-साथ रो रहे हैं।”
कहते-कहते वे फूट-फूटकर रोने लगीं। मैं खुद बहुत बिखरा हुआ था, पर न जाने कैसे मुझमें इतनी हिम्मत आ गई। मैंने कहा—
“मैडम, यह क्या? हमारे इतने अच्छे पलों को यूँ ही आँसुओं में मत बहने दीजिए।”
फिर तुरंत ही अपना मोबाइल उठाया और बोला—
“आख़िरी बार इसमें अपनी आवाज़ में बोल दीजिए—‘गुड मॉर्निंग, कैसे हो? सब ठीक? नींद आई? कुछ नया?’ और अपने गुड बॉय को गुड-बाय कर दीजिए।”
सुनते ही उनकी सिसकियाँ तेज़ हो गईं। उन्होंने आगे बढ़कर मेरे माथे पर एक प्यार भरा चुंबन दिया और कहने लगीं—
“पता है, पानी से जुदा होकर मछलियाँ क्यों मर जाती हैं? क्योंकि किसी का साथ पहले आदत, फिर ज़रूरत और बाद में ज़िंदगी बन जाता है। अपना ख़याल रखना।”
और वे चली गईं।
सच ही कहा था उन्होंने—किसी का साथ पहले आदत, फिर ज़रूरत और फिर ज़िंदगी बन जाता है। किंतु ज़रूरी तो नहीं कि जो लोग ज़िंदगी में नहीं रह सके, वे दिल में भी नहीं रह सकते।
हमेशा रोशन रखेंगे तेरी चाहत के दिए हम,
क्या पता किस मोड़ पर, किस पल तेरा आना हो जाए।
रचनाकार
विजया डालमिया
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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