छाती पर लगी गोली

छाती पर लगी गोली (एकांकी)

अवधि: 20-25 मिनिट्स

पात्र

रामवीर – 17-18 वर्षीय युवक, मासूम और भावुक

माँ – सरल, आस्था और बेटे के सपनों से जुड़ी

पिता – मेहनती किसान, सपनों में बेटा ही केंद्र

पत्नी (बच्ची) – नई-नई ससुराल आई, भोली

पड़ोसी चाचा (सत्यनारायण) – बुजुर्ग, आंदोलन में भागीदार

पुलिस का सिपाही (वॉयसओवर या ऑफ-स्टेज)

सामूहिक स्वर (नैरेटर) – जनता का प्रतिनिधि, भावों को जोड़ता है

स्थान:

एक साधारण गांव का आंगन – एक तरफ तुलसी चौरा, दूसरी तरफ रामवीर की तस्वीर पर माला टंगी हुई।

प्रस्तावना :

(धीमी रोशनी, पृष्ठभूमि में करुण संगीत)

सामूहिक स्वर:

“जब वादे छल जाएं, जब गोलियां सवाल बन जाएं…

तब कोई रामवीर मरता नहीं… अमर हो जाता है।

यह कहानी है एक ऐसे बेटे की…

जिसकी छाती पर सिर्फ गोली नहीं लगी…

लगा था एक पूरे समाज का दर्द।”

दृश्य 1: घर का आंगन – सुबह

(माँ तुलसी पर जल चढ़ा रही है, पिता बैल जोतने की बात कर रहे हैं। रामवीर हँसता हुआ लौटता है, पत्नी चुपचाप चौखट पर बैठी है।)

माँ (खुश होकर):

आ गया मेरा लाल? आज फिर देर कर दी सैर में?

रामवीर:

माँ, गांव में लोग कह रहे हैं, आंदोलन तेज हो गया है। आज जयपुर से कुछ लोग आए थे, सभा करेंगे।

पिता:

बोलने का हक तो सबका है। लेकिन बेटा, तुझे ध्यान रखना… तू हमारा सब कुछ है।

रामवीर:

बाबूजी… अगर आज हम आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो कब?

(पत्नी रामवीर को देखती है, कुछ कहना चाहती है लेकिन मौन)

दृश्य 2: आंदोलन – गोली चलने की आवाज

(लाइट्स डिम होती हैं। पीछे से नारे सुनाई देते हैं – "गुर्जरों को आरक्षण दो!", "हमारा हक दो!" अचानक गोली चलने की आवाज, चीख और फिर सन्नाटा)

(सिपाही की आवाज़ – "भागो! सब हटो!" फिर सिर्फ धड़कनें और धीमी सिसकियाँ)

दृश्य 3: घर – शव के साथ वापसी

(पिता के कंधे पर रामवीर का शव, माँ जमीन पर गिर पड़ी, पत्नी गूंगी सी हो गई है। चाचा सत्यनारायण पास आकर खड़े होते हैं)

चाचा (रुआँसे):

वो सिर्फ आंदोलन में नहीं गया था, भरोसे में गया था।

लेकिन यह भरोसा आज फिर मार दिया गया… वादे ने धोखा दिया।

माँ (चीखकर):

मेरा लाल! मेरा चिराग बुझ गया!

हे भगवान! हम दोनों ने एक ही पौधा सींचा था… अब किसके लिए जिएंगे?

पत्नी (धीरे से):

अभी तो मुझे 'पति' कहने की आदत भी नहीं हुई थी… और आपने छीन लिया…

दृश्य 4: अंतिम संवाद – नैरेटर द्वारा

(रामवीर की तस्वीर के सामने सब खड़े, रोशनी सिर्फ उस पर)

सामूहिक स्वर:

“उसकी छाती पर लगी गोली सिर्फ एक जीवन नहीं ले गई…

वह एक परिवार की आखिरी शाखा थी…

एक वादा जो अधूरा रहा…

एक वंश जो अब सिर्फ तस्वीरों में जीवित रहेगा…”

(धीरे-धीरे सभी मिलकर एक स्वर में बोलते हैं)

सब:

“रामवीर मरा नहीं है… वह अब हर घर में जिंदा है…

हर उस वादे में… जो टूट गया…

हर उस माँ की आँखों में… जो अपने बेटे का इंतजार करती है…”

(प्रकाश मंद होता है – मंच अंधेरे में डूबता है)

अंतिम टेक्स्ट स्लाइड:

"शहीद सिर्फ शारीरिक नहीं मरते — वो तब मरते हैं, जब समाज चुप हो जाए…"

"क्या हम भी खामोश रहेंगे?"

आइडिया

श्री भगवानदास 'मंजीत' 

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