"हिमालय का हीरो: एडमंड हिलेरी की कहानी"
एक सच्ची कहानी, बच्चों की ज़ुबानी
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटा सा देश है – न्यूजीलैंड। वहां एक प्यारा बच्चा रहता था – एडमंड हिलेरी। वह कोई राजकुमार नहीं था, न ही जादुई दुनिया से आया था। वह तो एक साधारण किसान के घर में पैदा हुआ था, और उसका मन मधुमक्खियों से खेलना और शहद इकट्ठा करना बहुत पसंद था।
पर, एडमंड के दिल में एक और खास चीज़ थी – ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से दोस्ती करने की तमन्ना। जब वह छोटा था, तबसे बर्फ से ढके पहाड़ उसे बुलाते थे, जैसे कहते हों – "आओ, हमें छूकर दिखाओ!" और एडमंड कहता – "एक दिन जरूर!"
धीरे-धीरे वह बड़ा हुआ और खूब मेहनत करने लगा। एक दिन वह आल्पस पहाड़ पर चढ़ गया। फिर एक-एक कर कई ऊँचे पहाड़ों को जीत लिया।
पर उसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश थी – दुनिया के सबसे ऊँचे पहाड़ सागरमाथा (जिसे माउंट एवरेस्ट भी कहते हैं) पर चढ़ना। यह हिमालय में था और इसकी ऊँचाई थी – 8,848 मीटर!
सब कहते – "यह तो नामुमकिन है!" पर एडमंड नहीं माना। उसने एक बहादुर नेपाली साथी तेनसिंग नोर्गे के साथ 29 मई, 1953 को उस विशाल पर्वत की चोटी पर झंडा फहरा दिया!
वो पल जैसे जादू था – एडमंड हिलेरी और तेनसिंग एवरेस्ट पर चढ़ने वाले दुनिया के पहले इंसान बन गए!
अब तो जैसे एडमंड को साहस का स्वाद लग गया था। उन्होंने दुनिया की दस और ऊँची चोटियों पर चढ़ाई की। दक्षिणी ध्रुव और फिर उत्तरी ध्रुव तक भी गए – और वो बन गए पहले ऐसे इंसान, जिन्होंने पृथ्वी के दोनों सिरों को छू लिया।
एक बार उन्होंने एक मज़ेदार योजना बनाई – "सागर से आकाश तक"। तीन नावों में गंगा नदी के उल्टे बहाव में सफर करते हुए कोलकाता से बदरीनाथ तक जाना था! उनके साथ उनका बेटा पीटर भी था। रास्ता कठिन था, पर उन्होंने हार नहीं मानी – जब तक एक बड़ी चट्टान ने उन्हें रोक न दिया।
एवरेस्ट पर चढ़ने के बाद एडमंड को नेपाल के शेरपाओं से बहुत प्यार हो गया। उन्होंने उनके लिए स्कूल, अस्पताल, पुल और पानी की व्यवस्था करवाई। शेरपा लोग उन्हें देवता जैसा सम्मान देते थे।
पर एक दुखद दिन भी आया – जब एक दुर्घटना में उनकी पत्नी और बेटी नहीं रहीं। एडमंड बहुत उदास हो गए। लेकिन फिर उन्होंने ठान लिया कि अब वे दूसरों की मदद करेंगे। वे भारत में न्यूजीलैंड के राजदूत भी बने और खूब अच्छे काम किए।
इतना कुछ करने के बाद भी, एडमंड कभी घमंडी नहीं हुए। वे हमेशा मुस्कराते थे, और बच्चों से कहते थे –
"सपने ऊँचे देखो, और कदम जमाकर चलो – पहाड़ भी रास्ता दे देंगे!"
11 जून, 2008 को, एडमंड हिलेरी इस दुनिया से चले गए। लेकिन जब-जब कोई एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ता है, वह मन ही मन उन्हें जरूर याद करता है।
सीख
सच्चा साहस वो होता है जो ऊँचाइयों से नहीं डरता और दूसरों की मदद करना नहीं भूलता।
सूचना स्रोत
श्री सुमनेश 'सुमन'
पाठ्य रूपांतर और विस्तार
चैट जीपीटी
प्रस्तुति


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