उम्र कैद

भूमिका

प्रस्तुत कहानी माया शर्मा जी की सशक्त लेखनी का अद्भुत उदाहरण है जो मन वैचारिकी को नवल आयाम दे सकने में सक्षम है और लेखनी की पैनी धार की स्पष्ट अभिव्यक्ति। 

उम्र कैद

क्या शादी का मतलब कैद होता है?

अगर रैना को पहले से इसका अंदाज़ा होता, तो शायद वह कभी शादी नहीं करती।

हमेशा हँसमुख और आत्मविश्वासी रैना की शादी एक देखने में सुंदर और सुशील लगने वाले युवक से पारंपरिक रीति-रिवाज़ों के अनुसार कर दी गई। उस दौर में न मोबाइल थे, न इंटरनेट, और न ही मिलने-मिलाने की खुली छूट। लड़की और लड़के को बस एक औपचारिक झलक मिलती थी। अंतिम निर्णय तो माता-पिता और घर के बुजुर्गों का ही होता था।

शादी संपन्न हो गई। लेकिन जैसे ही रैना ससुराल पहुँची, पहले ही दिन से उसे समझ आ गया कि अब उसे अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि घर की अपेक्षाओं के अनुसार ही जीना होगा।

छह मीटर की साड़ी और सिर पर पल्लू तो अनिवार्य था ही, कई बार घूंघट गर्दन तक खींचना पड़ता।

हालाँकि साड़ी या घूंघट से रैना को कोई परहेज़ नहीं था,

लेकिन...

"यहाँ मत जाओ",

"वहाँ मत हँसो",

"ऊँची आवाज़ में मत बोलो",

"खुलकर मत मुस्कराओ" -

ऐसे असंख्य नियम थोप दिए गए।

पति थे तो सीधे-सादे, लेकिन घर में उनका कोई विशेष अधिकार नहीं चलता था।

उनके साथ कभी रैना घूमने भी जा नहीं पाई, यहाँ तक कि कभी साथ बैठकर खाना तक नहीं खा पाई।

घर की हर छोटी-बड़ी बात बढ़ा-चढ़ाकर पति के कानों तक पहुँचाई जाती और फिर रैना पर गुस्सा उतरता कभी-कभी हाथ भी उठ जाता। रैना चुपचाप सब सहती रही - बिना किसी गलती के। कई बार मन में आया कि जीवन ही समाप्त कर ले - मगर हर बार बच्चों का चेहरा आँखों के सामने आ गया।

समय बीतता गया। बच्चे बड़े हुए। रैना ने उन्हें पढ़ाया, लिखाया, अच्छे संस्कार दिए - हर वो खुशी दी, जो खुद को कभी न मिल सकी।

अब उसके पति इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन रैना आज भी उसी कैद जैसी ज़िंदगी जी रही है।

पच्चीस साल बीतने के बाद भी उस पर आज भी नए-नए नियम और ताने थोपे जाते हैं।

फिर भी, वह अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए हर दिन चेहरे पर मुस्कान ओढ़कर जीती है।

पर उसके भीतर रोज़ एक सवाल भगवान से टकराता है- "आख़िर मेरे किस गुनाह की सज़ा है ये उम्र कैद?"

रचनाकार

माया शर्मा

प्रस्तुति




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