बाला और कचनार - सुनिता मीणा
बाला और कचनार
भूमिका
मनुष्य और प्रकृति का संबंध केवल उपयोगिता का नहीं, बल्कि भावनाओं और आत्मीयता का भी होता है। बच्चों का निष्कलुष मन इस संबंध को सबसे सहज रूप में महसूस करता है। वे पेड़ों, फूलों, पक्षियों और प्रकृति की हर छोटी वस्तु में अपना मित्र खोज लेते हैं। प्रस्तुत कहानी एक ऐसी ही मासूम बच्ची ‘बाला’ और एक कचनार के पेड़ के बीच पनपे स्नेह की कथा है। यह कहानी न केवल बालमन की कोमल संवेदनाओं को उजागर करती है, बल्कि हमें यह सोचने पर भी विवश करती है कि विकास की दौड़ में हम प्रकृति से कितना कुछ छीनते जा रहे हैं।
कहानी
बाला एक छोटी, मासूम-सी बच्ची थी, जो अभी कक्षा एक में पढ़ती थी। उसके चेहरे और मन — दोनों पर भरपूर मासूमियत थी। वह दुनियादारी से बहुत दूर थी।
उसका स्कूल घर से अधिक दूर नहीं था, इसलिए वह प्रतिदिन अपने दादू के साथ पैदल टहलते हुए स्कूल जाती थी। बाला चंचल, बातूनी और बेहद प्यारे स्वभाव की बच्ची थी। उसे गुलाबी रंग सदैव आकर्षित करता था।
एक दिन रास्ते में एक सुखद घटना घटी। सड़क किनारे खड़ा कचनार का पेड़ हवा में इठलाता हुआ मानो बाला से बातें करना चाहता था। उसने अपनी बात की शुरुआत एक सुंदर गुलाबी, हल्की सफेदी लिए फूल देकर की।
जैसे ही वह आकर्षक फूल बाला के हाथ में आया, वह खुशी से उछल पड़ी। उसने तुरंत अपने दादू को वह सुंदर फूल दिखाया। दादू मुस्कुराकर बोले,
“यह इस पेड़ की तरफ से तुम्हारे लिए तोहफ़ा है, क्योंकि तुम अच्छी बच्ची हो और रोज स्कूल जाती हो।”
बाला ने बड़े प्रेम से कचनार को धन्यवाद कहा।
अब तो मानो दोनों में बातचीत हुए बिना एक भी दिन नहीं निकलता था। बाला उसे निहारती, पुचकारती और कचनार भी अपनी शाखाएँ फैलाकर उसका स्वागत करता। वह रोज़ उसे फूलों के रूप में छोटे-छोटे तोहफ़े देता। इस तरह दोनों की दोस्ती को कई दिन बीत गए।
लेकिन एक दिन कुछ अनहोनी घट गई।
बाला ने देखा कि सड़क के किनारे कुछ लोग खड़े थे। उनके हाथों में औज़ार और आरी थी। इससे पहले कि बाला कुछ समझ पाती, दादू ने धीरे से कहा,
“सड़क की मरम्मत का काम शुरू होने वाला है। सड़क चौड़ी करने के कारण कचनार को यहाँ से हटाया जाएगा।”
बाला ने उत्सुकता से पूछा,
“फिर इसे कहाँ ले जाएँगे? और कैसे ले जाएँगे?”
दादू की आँखें भर आईं। वे भारी स्वर में बोले,
“मेरी बच्ची, इसे काट दिया जाएगा।”
यह सुनते ही बाला को मानो गहरा धक्का लगा। वह घबराकर बोली,
“तो क्या कचनार मर जाएगा?”
दादू की आँखों से भी आँसू छलक पड़े।
बाला रोते हुए ज़िद करने लगी,
“दादू, इन्हें रोकिए! ये मेरे दोस्त को मत मारने दीजिए। इन्हें समझाइए…”
दादू उसकी भावुक बातें सुनकर कुछ कह पाते, उससे पहले ही मजदूरों की आरी कचनार पर चल चुकी थी। कुछ ही क्षणों में थोड़ी देर पहले तक हवा में लहराता, तंदुरुस्त कचनार ज़मीन पर निढाल पड़ा था।
अपने कटे हुए मित्र को देखकर बाला का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। उसकी मासूम आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
अंत में दादू ने उसे गोद में उठाया और भारी मन से घर की ओर चल दिए।
शिक्षा
यह कहानी हमें प्रकृति के प्रति प्रेम, संवेदनशीलता और संरक्षण का संदेश देती है। पेड़-पौधे केवल पर्यावरण की शोभा नहीं बढ़ाते, बल्कि वे हमारे सच्चे साथी भी होते हैं। बच्चों का निष्कलुष मन प्रकृति से सहज जुड़ाव महसूस करता है, परंतु विकास के नाम पर जब पेड़ों को काटा जाता है, तब केवल एक पेड़ ही नहीं गिरता, बल्कि उससे जुड़ी अनेक भावनाएँ भी आहत होती हैं।
हमें यह समझना चाहिए कि सड़कें और भवन जितने आवश्यक हैं, उतना ही आवश्यक प्रकृति का संरक्षण भी है। यदि एक पेड़ काटना अपरिहार्य हो, तो उसके स्थान पर अनेक नए पेड़ लगाने का संकल्प अवश्य लेना चाहिए।
रचनाकार
सुनिता मीणा
उपप्राचार्य और स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
सवाई माधोपुर (राजस्थान)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति







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