गजरे में काँटे

 गजरे में काँटे

रशीद के हाथों में गजरा देखते ही रुखसार के चेहरे के भाव बदल गए। उसकी आँखों में पीड़ा उभर आई। वह किचन में जाकर कहने लगी..." आपा  ...रशीद आज गजरा लाए हैं"।..."हाँ तो अच्छा है ना। तुझ पर गजरा खूब फ़बता है"... कहकर आपा ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा। रुखसार धीरे से बोली... "फ़बता नहीं, चुभता है"।... "अरे मोगरे में भी कभी कांटे होते हैं भला"? रुखसार ने धीरे से कहा.... "हाँ ..होते हैं"। ...."क्या कहा"?... "कुछ नहीं" कहकर रुखसार कांपते कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ चली रात भर काँटों की चुभन बर्दाश्त करने के लिए।



विजया डालमिया

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