वो आँसू जो बह नहीं पाए

वो आँसू जो बह नहीं पाए

“वो बातें जो कह नहीं पाए,

वो आँसू जो बह नहीं पाए…”

आँखों में नमी लिए शैलेश यह गाना सुन रहा था। पुराने गाने सुनना उसका बहुत पुराना शौक था और यह गीत तो उसके दिल के बेहद करीब था। जब भी यह गीत बजता, वह अक्सर उसका वॉल्यूम बढ़ा देता और आँखों की बरसात के साथ यादों की उस सड़क पर निकल पड़ता, जहाँ हर मोड़ पर अतीत उसका इंतज़ार करता था।

यादों को बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलता और दुख शब्द बन जाने का रास्ता नहीं जानते। जिंदगी के खूबसूरत लम्हों को हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं, लेकिन उन्हें महसूस करने के लिए भी कभी-कभी यादों में कैद होना पड़ता है। शायद इसलिए कि यादें हमेशा वहीं ठहर जाती हैं, जहाँ हमसे कोई बिछड़ा था।

आज भी भीगते-भीगते शैलेश अपनी जिंदगी के उसी मोड़ पर जा पहुँचा था, जहाँ से कोई आगे बढ़ गया था और कोई पीछे रह गया था।

रेडियो पर पुराने गाने सुनना उसका पसंदीदा शौक था। जब भी यह गाना आता, वह वॉल्यूम बढ़ा देता और मिनी आकर कहती—

“क्या भैया! जब देखो तब यही गाना…”

वह उसे मज़ाकिया अंदाज़ में घूरकर देखता और मिनी हँसती हुई चली जाती।

मिनी उससे छह साल छोटी थी। दसवीं में पढ़ती थी और पढ़ाई में अक्सर अपने भैया की मदद लेती रहती थी। बाकी समय पड़ोस की एक लड़की के साथ चकल्लस करने में बीत जाता। कुछ ही दिनों पहले वे लोग इस मोहल्ले में रहने आए थे और मिनी ने ही उसे पड़ोस के लोगों से परिचित कराया था।

उस दिन स्कूल में टीचर्स डे था। मिनी तैयार होकर आई और बोली—

“भैया, मुझे डर लग रहा है। बच्चों को कैसे पढ़ाऊँगी?”

शैलेश हँस पड़ा।

“अरे, इसमें डरने की क्या बात है? जब तेरे जैसी शैतान को टीचर्स पढ़ा सकते हैं, तो…”

वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाया। एक तो मिनी का उदास चेहरा और दूसरी ओर किसी की आवाज़, जो उसे पुकारते हुए वहाँ तक आ रही थी।

आवाज़ सुनते ही मिनी तेजी से भागी।

“अच्छा भैया, मैं चलती हूँ…”

“ऑल द बेस्ट! मेरा आशीर्वाद तो लेती जा…”

पता नहीं मिनी ने सुना भी या नहीं।

कुछ दिनों बाद वह दौड़ती हुई आई—

“भैया, देखो! मुझे स्पीच में फर्स्ट प्राइज मिला है।”

“अरे वाह! लेकिन तू कब से यह सब करने लगी?”

“वो शीला है ना! उसने इतना सुंदर लिखकर दिया कि सब सुनते ही रह गए।”

“अरे वाह! तेरी सहेली तो बड़ी चतुर है।”

“हाँ, वो तो है।”

अचानक एक दिन वही चिरपरिचित आवाज़ सुनाई दी—

“मिनी… मिनी…”

कोई प्रत्युत्तर न पाकर वह लड़की शैलेश के कमरे की तरफ चली आई।

तब पहली बार शैलेश ने उसे देखा।

कमरे के पास वह खामोशी से खड़ी रेडियो पर बजता वही गीत सुन रही थी। जैसे ही गीत खत्म हुआ, वह सकपकाकर उसकी ओर देखने लगी। नमस्ते की और जाने लगी।

शैलेश ने कहा—

“मिनी आती ही होगी। माँ के साथ बगल में गई है।”

वह मुस्कुराकर बैठ गई। उसकी नजरें कमरे का मुआयना कर रही थीं।

कुछ देर बाद उसने कहा—

“मिनी हर सब्जेक्ट में परफेक्ट हो गई है, जब से आप उसे पढ़ाने लगे हैं।”

शैलेश मुस्कुराया।

“तुम भी तो उसकी मदद करती हो।”

“हम सब एक जैसे हैं।”

फिर अचानक उठते हुए बोली—

“अच्छा! मैं चलती हूँ।”

और वह चली गई।

अगले दिन मिनी स्कूल से आते ही बोली—

“भैया, कल शीला आई थी। आपने मुझे बताया नहीं?”

“अरे! मैं भूल गया।”

“क्या भैया! शीला ने पता है आपके लिए क्या कहा?”

“क्या?”

“बड़े गैर-जिम्मेदार हैं तुम्हारे भैया।”

शैलेश को हँसी आ गई।

“अच्छा! और क्या बोली?”

मिनी ने बात बदलते हुए कहा—

“कल उसका बर्थडे है। आपको भी बुलाया है।”

शैलेश ने उसे चिढ़ाते हुए कहा—

“कहीं वहाँ मेरी पिटाई तो नहीं होगी?”

“क्या भैया! आप भी…”

कहकर वह उसके सीने से लग गई।

इस बार भी उसे गैर-जिम्मेदारी का खिताब मिला, क्योंकि वह जन्मदिन में नहीं जा पाया। बाद में मिनी ने बताया कि सिर्फ उन्हें ही आमंत्रित किया गया था।

शैलेश को थोड़ा अफसोस हुआ। उसे दूर करने के लिए अगले ही दिन वह मिनी के साथ शीला के घर चला गया।

भीतर प्रवेश करते ही एक सुरीली आवाज़ उसके कानों में मिश्री की तरह घुल गई—

“तोरा मन दर्पण कहलाए…”

उफ़! कितनी मीठी आवाज़ थी।

शैलेश के कदम वहीं ठिठक गए।

तभी सामने से शीला आती दिखाई दी। उसे देखते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए। शैलेश ने मुस्कुराते हुए कान पकड़कर जैसे ही माफी माँगी, वह भी मुस्कुरा दी।

“आइए ना…”

कहकर वह अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

उसका कमरा देखकर शैलेश को विश्वास ही नहीं हुआ कि यह दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़की का कमरा है। हर वस्तु जैसे अपना परिचय स्वयं दे रही थी—साहित्यिक पुस्तकें, गीतों और ग़ज़लों की कैसेटें और एक तरफ रखी वीणा।

शैलेश ने पूछा—

“यह…?”

मिनी तुरंत बोल पड़ी—

“यह शीला की है, भैया। शीला जितना अच्छा गाती है, उतनी ही अच्छी वीणा भी बजाती है।”

शैलेश चुपचाप खड़ा उसे देखता रहा।

मिनी और शीला आपस में बातें कर रही थीं, लेकिन शैलेश का मन कहीं और जा चुका था। वह बादल बन अपने चाँद की तलाश में निकल पड़ा था।

विचारों और एहसासों को रोका नहीं जा सकता।

वह कमरा एक पल में ही उसे अपना-सा लगने लगा था। वहाँ ऐसा कुछ भी तो नहीं था, जो उसका हो… फिर भी जब वह वहाँ से लौटा, तो उसका बहुत कुछ वहीं छूट गया था।

अब वह अक्सर मिनी से शीला के बारे में बातें करने लगा। उसकी कोशिश रहती कि जब भी शीला आए, वह उसके साथ बैठकर कुछ बातें कर सके।

उसकी संजीदगी और हर चीज़ को समझने का उसका अंदाज़ शैलेश को भीतर तक प्रभावित करने लगा था।

यूँ तो वह खुद भी बहुत होशियार था, किंतु शीला के सामने न जाने क्यों कुछ कह नहीं पाता था। शायद उसकी गंभीर आँखें उसे रोक देती थीं।

कई मौकों पर शीला ने उसे अपनी ओर देखते हुए पकड़ लिया।

नतीजा यह हुआ कि वह उससे कतराने लगी।

हरियाली तीज का दिन शैलेश कैसे भूल सकता था!

उस दिन सबने मिलकर पिकनिक का कार्यक्रम बनाया था। सुबह की भोर की लालिमा के साथ उसका मन भी हरा-भरा हो गया, जब उसने शीला को हरे रंग की पोशाक में देखा।

लंबे खुले बाल बार-बार उसके गालों को छूने की गुस्ताखी कर रहे थे। पैरों में पायल थी और हाथों में घड़ी की जगह कंगन।

शैलेश बस उसे देखता रह गया।

वह अपने बालों के साथ जद्दोजहद कर रही थी। तभी शैलेश वहाँ पहुँच गया। उसने धीरे से उसके बालों को पीछे किया। न जाने उसकी आँखों में शीला ने क्या पढ़ लिया कि उसने झट से अपने बाल बाँध लिए।

बंधे हुए बालों में वह और भी खूबसूरत लग रही थी।

तनिक झुंझलाकर उसने कहा—

“खुलापन कभी-कभी तकलीफ दे जाता है।”

शैलेश ने धीरे से कहा—

“पर बंधन भी तो खूबसूरत है।”

उसका इशारा समझकर शीला ने कहा—

“बंधन में बाध्यता ज़रूरी नहीं।”

और वह वहाँ चली गई जहाँ बाकी लोग बैठे थे।

मिनी ने शैलेश को देखते ही पूछा—

“भैया, कहाँ चले गए थे?”

शैलेश ने शीला की ओर देखते हुए उसे छेड़ा—

“खुले मन को बाँधने।”

दिन बीतते रहे और शैलेश का यकीन अब यकीन में बदल चुका था कि उसे शीला से प्यार हो गया है।

शायद अब तक मिनी भी समझने लगी थी, लेकिन लिहाज़ के कारण कुछ नहीं कहती थी।

और शीला…

उसे तो जैसे पहले ही दिन सब समझ आ गया था।

उसने शैलेश से एक दूरी बनानी शुरू कर दी थी, जिसे शायद सिर्फ शैलेश ही समझ पा रहा था। उसके बाद वह किसी भी पिकनिक में शामिल नहीं हुई।

शैलेश अंदाज़ लगाता रहता कि उसकी समझदारी शायद उससे कहीं आगे निकल चुकी है। वह दूर रहकर भी समझ रही थी कि उसकी दीवानगी कुछ ज़्यादा बढ़ रही है।

इसीलिए अब वह उनके घर आने के बजाय मिनी को अपने घर बुलाने लगी।

दुनिया में इतने चेहरे थे, फिर उसकी नजर सिर्फ एक चेहरे पर आकर क्यों ठहर गई थी?

शीला उससे छोटी थी, फिर भी वह उससे क्यों डरता था?

उसकी चाहत पाक थी, पाप नहीं।

फिर जब वह सामने होती तो उसके शब्द क्यों खो जाते थे? वह जड़ क्यों हो जाता था?

आज बहुत दिनों बाद शीला घर आई थी। घर में पूजा थी, इसलिए उसने पीली साड़ी पहन रखी थी। लंबी ढीली चोटी को उसने जूड़े का रूप दे दिया था और उसमें लगे जूही के फूल उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहे थे।

शैलेश उसे बहुत दिनों बाद देख रहा था।

मिनी ने भी आज लाल साड़ी पहन रखी थी। दोनों न जाने किस बात पर खिलखिला रही थीं।

तभी शीला उठकर रसोई की तरफ चली गई।

शैलेश खुद को रोक नहीं सका। उसके कदम भी अनायास उसी दिशा में बढ़ गए।

शीला घड़े से पानी निकालकर पी रही थी।

शैलेश को देखकर उसने पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ा दिया।

गिलास लेते समय उसकी उँगलियाँ अनजाने में शीला की उँगलियों को छू गईं।

शीला ने शायद उस स्पर्श को उसकी मंशा समझ लिया। वह तुरंत वहाँ से बाहर चली गई।

शैलेश स्तब्ध खड़ा सोचता रह गया—

यह लड़की हर बात पहले ही कैसे समझ जाती है?

पता नहीं इस वक्त उसके मन में क्या चल रहा होगा।

वह मेरी हर बात समझती है, बस मेरी चाहत क्यों नहीं समझ पाती?

काश! तुम इतनी छोटी होतीं कि मैं तुम्हें अपनी जेब में रख लेता। जब जी चाहता तुम्हें देखता और जब जी चाहता तुम्हें गले से लगा लेता।

मेरा एक ही जुर्म है ना—मुझे तुमसे प्यार हो गया।

तो क्या हुआ?

प्यार ही तो हुआ है।

तुम हो ही इतनी प्यारी और मासूम… और समझदारी के साथ मासूमियत बहुत कम लोगों में पाई जाती है।

शैलेश अक्सर मन ही मन शीला से बातें किया करता। मन जवाब नहीं देता, तो वह शीला की ओर से अपने मनचाहे जवाब पाकर खुद को बहलाता रहता।

धीरे-धीरे उसे अकेलेपन का अँधेरा भी अच्छा लगने लगा।

समय बीतता गया।

मिनी और शीला दोनों पढ़ाई के लिए बाहर चली गईं और शैलेश के पास रह गईं सिर्फ उन दिनों की यादें।

लोग चले जाते हैं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें वहीं ठहर जाती हैं।

यही उसके साथ हो रहा था।

जब भी मिनी से बात होती, वह खुद ही कह देती—

“भैया, शीला भी ठीक है। आप अच्छे से रहना।”

उसके सूने मन को रातरानी के फूल खिलने का इंतज़ार था। किंतु अभी वह मौसम आया नहीं था।

फिर भी उसने मन में ठान लिया था कि अबकी बार हिम्मत करके कह देगा—

“क्या तुम मेरे साथ आसमान में उड़ने के लिए तैयार हो?

क्या तुम मेरे आँगन में अपनी महक बिखेरना चाहोगी?”

उस दिन भी वह शीला के ख्यालों में खोया हुआ था कि अचानक उसकी नजरों को यकीन ही नहीं हुआ।

सामने से शीला चली आ रही थी।

धीरे-धीरे वह उसके करीब आ गई।

शैलेश पलकें झपकाना ही भूल गया।

उसने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में हल्की-सी नमी थी, जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रही थी।

उसने धीरे से कहा—

“कैसे हैं?”

आज भी उसके बाल खुले थे और उसके गालों को छूने की वही शरारत कर रहे थे।

शैलेश ने उस दिन की तरह ही उसके बालों को उसके चेहरे से हटाया।

आज उसने उसे रोका नहीं।

बस मुस्कुरा दी।

और तभी शैलेश की आँख खुल गई।

क्या यह सपना था?

हाँ… सपना ही था।

काश! पूरा हो जाए।

तभी फोन की घंटी बजने लगी।

शैलेश ने फोन उठाया।

“हैलो…”

“भैया…”

“हाँ, बोल। क्या बात है? तू इतनी घबराई हुई क्यों है?”

कुछ क्षण चुप्पी रही।

फिर मिनी की काँपती हुई आवाज़ आई—

“भैया… वो शीला…”

शैलेश का दिल धक से रह गया।

“हाँ, क्या हुआ?”

“भैया… शीला अभी कुछ देर पहले ही…”

“हाँ बोल मिनी! कुछ देर पहले क्या?”

दूसरी तरफ से सिसकती हुई आवाज़ आई—

“शीला अब नहीं रही।”

शैलेश जैसे पत्थर का हो गया।

“क्या…?”

“उसे हार्ट अटैक आया था और वह…”

आगे की आवाज़ उसके कानों तक पहुँची ही नहीं।

फोन उसके हाथ में था, लेकिन उसकी दुनिया जैसे वहीं थम गई थी।

जिस प्रेम को उसने कभी शब्द नहीं दिए, वह आज हमेशा के लिए मौन हो चुका था।

जिसे वह एक दिन अपने मन की बात कहने वाला था, वह सुनने के लिए इस दुनिया में रही ही नहीं।

शैलेश की आँखों से आँसू बहते रहे।

और उसके होंठों पर बस वही अधूरी पंक्तियाँ थीं—

“वो आँसू जो बह नहीं पाए…

वो बातें जो कह नहीं पाए…”

विजया डालमियावो आँसू जो बह नहीं पाए



“वो बातें जो कह नहीं पाए,

वो आँसू जो बह नहीं पाए…”

आँखों में नमी लिए शैलेश यह गाना सुन रहा था। पुराने गाने सुनना उसका बहुत पुराना शौक था और यह गीत तो उसके दिल के बेहद करीब था। जब भी यह गीत बजता, वह अक्सर उसका वॉल्यूम बढ़ा देता और आँखों की बरसात के साथ यादों की उस सड़क पर निकल पड़ता, जहाँ हर मोड़ पर अतीत उसका इंतज़ार करता था।

यादों को बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलता और दुख शब्द बन जाने का रास्ता नहीं जानते। जिंदगी के खूबसूरत लम्हों को हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं, लेकिन उन्हें महसूस करने के लिए भी कभी-कभी यादों में कैद होना पड़ता है। शायद इसलिए कि यादें हमेशा वहीं ठहर जाती हैं, जहाँ हमसे कोई बिछड़ा था।

आज भी भीगते-भीगते शैलेश अपनी जिंदगी के उसी मोड़ पर जा पहुँचा था, जहाँ से कोई आगे बढ़ गया था और कोई पीछे रह गया था।

रेडियो पर पुराने गाने सुनना उसका पसंदीदा शौक था। जब भी यह गाना आता, वह वॉल्यूम बढ़ा देता और मिनी आकर कहती—

“क्या भैया! जब देखो तब यही गाना…”

वह उसे मज़ाकिया अंदाज़ में घूरकर देखता और मिनी हँसती हुई चली जाती।

मिनी उससे छह साल छोटी थी। दसवीं में पढ़ती थी और पढ़ाई में अक्सर अपने भैया की मदद लेती रहती थी। बाकी समय पड़ोस की एक लड़की के साथ चकल्लस करने में बीत जाता। कुछ ही दिनों पहले वे लोग इस मोहल्ले में रहने आए थे और मिनी ने ही उसे पड़ोस के लोगों से परिचित कराया था।

उस दिन स्कूल में टीचर्स डे था। मिनी तैयार होकर आई और बोली—

“भैया, मुझे डर लग रहा है। बच्चों को कैसे पढ़ाऊँगी?”

शैलेश हँस पड़ा।

“अरे, इसमें डरने की क्या बात है? जब तेरे जैसी शैतान को टीचर्स पढ़ा सकते हैं, तो…”

वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाया। एक तो मिनी का उदास चेहरा और दूसरी ओर किसी की आवाज़, जो उसे पुकारते हुए वहाँ तक आ रही थी।

आवाज़ सुनते ही मिनी तेजी से भागी।

“अच्छा भैया, मैं चलती हूँ…”

“ऑल द बेस्ट! मेरा आशीर्वाद तो लेती जा…”

पता नहीं मिनी ने सुना भी या नहीं।

कुछ दिनों बाद वह दौड़ती हुई आई—

“भैया, देखो! मुझे स्पीच में फर्स्ट प्राइज मिला है।”

“अरे वाह! लेकिन तू कब से यह सब करने लगी?”

“वो शीला है ना! उसने इतना सुंदर लिखकर दिया कि सब सुनते ही रह गए।”

“अरे वाह! तेरी सहेली तो बड़ी चतुर है।”

“हाँ, वो तो है।”

अचानक एक दिन वही चिरपरिचित आवाज़ सुनाई दी—

“मिनी… मिनी…”

कोई प्रत्युत्तर न पाकर वह लड़की शैलेश के कमरे की तरफ चली आई।

तब पहली बार शैलेश ने उसे देखा।

कमरे के पास वह खामोशी से खड़ी रेडियो पर बजता वही गीत सुन रही थी। जैसे ही गीत खत्म हुआ, वह सकपकाकर उसकी ओर देखने लगी। नमस्ते की और जाने लगी।

शैलेश ने कहा—

“मिनी आती ही होगी। माँ के साथ बगल में गई है।”

वह मुस्कुराकर बैठ गई। उसकी नजरें कमरे का मुआयना कर रही थीं।

कुछ देर बाद उसने कहा—

“मिनी हर सब्जेक्ट में परफेक्ट हो गई है, जब से आप उसे पढ़ाने लगे हैं।”

शैलेश मुस्कुराया।

“तुम भी तो उसकी मदद करती हो।”

“हम सब एक जैसे हैं।”

फिर अचानक उठते हुए बोली—

“अच्छा! मैं चलती हूँ।”

और वह चली गई।

अगले दिन मिनी स्कूल से आते ही बोली—

“भैया, कल शीला आई थी। आपने मुझे बताया नहीं?”

“अरे! मैं भूल गया।”

“क्या भैया! शीला ने पता है आपके लिए क्या कहा?”

“क्या?”

“बड़े गैर-जिम्मेदार हैं तुम्हारे भैया।”

शैलेश को हँसी आ गई।

“अच्छा! और क्या बोली?”

मिनी ने बात बदलते हुए कहा—

“कल उसका बर्थडे है। आपको भी बुलाया है।”

शैलेश ने उसे चिढ़ाते हुए कहा—

“कहीं वहाँ मेरी पिटाई तो नहीं होगी?”

“क्या भैया! आप भी…”

कहकर वह उसके सीने से लग गई।

इस बार भी उसे गैर-जिम्मेदारी का खिताब मिला, क्योंकि वह जन्मदिन में नहीं जा पाया। बाद में मिनी ने बताया कि सिर्फ उन्हें ही आमंत्रित किया गया था।

शैलेश को थोड़ा अफसोस हुआ। उसे दूर करने के लिए अगले ही दिन वह मिनी के साथ शीला के घर चला गया।

भीतर प्रवेश करते ही एक सुरीली आवाज़ उसके कानों में मिश्री की तरह घुल गई—

“तोरा मन दर्पण कहलाए…”

उफ़! कितनी मीठी आवाज़ थी।

शैलेश के कदम वहीं ठिठक गए।

तभी सामने से शीला आती दिखाई दी। उसे देखते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए। शैलेश ने मुस्कुराते हुए कान पकड़कर जैसे ही माफी माँगी, वह भी मुस्कुरा दी।

“आइए ना…”

कहकर वह अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

उसका कमरा देखकर शैलेश को विश्वास ही नहीं हुआ कि यह दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़की का कमरा है। हर वस्तु जैसे अपना परिचय स्वयं दे रही थी—साहित्यिक पुस्तकें, गीतों और ग़ज़लों की कैसेटें और एक तरफ रखी वीणा।

शैलेश ने पूछा—

“यह…?”

मिनी तुरंत बोल पड़ी—

“यह शीला की है, भैया। शीला जितना अच्छा गाती है, उतनी ही अच्छी वीणा भी बजाती है।”

शैलेश चुपचाप खड़ा उसे देखता रहा।

मिनी और शीला आपस में बातें कर रही थीं, लेकिन शैलेश का मन कहीं और जा चुका था। वह बादल बन अपने चाँद की तलाश में निकल पड़ा था।

विचारों और एहसासों को रोका नहीं जा सकता।

वह कमरा एक पल में ही उसे अपना-सा लगने लगा था। वहाँ ऐसा कुछ भी तो नहीं था, जो उसका हो… फिर भी जब वह वहाँ से लौटा, तो उसका बहुत कुछ वहीं छूट गया था।

अब वह अक्सर मिनी से शीला के बारे में बातें करने लगा। उसकी कोशिश रहती कि जब भी शीला आए, वह उसके साथ बैठकर कुछ बातें कर सके।

उसकी संजीदगी और हर चीज़ को समझने का उसका अंदाज़ शैलेश को भीतर तक प्रभावित करने लगा था।

यूँ तो वह खुद भी बहुत होशियार था, किंतु शीला के सामने न जाने क्यों कुछ कह नहीं पाता था। शायद उसकी गंभीर आँखें उसे रोक देती थीं।

कई मौकों पर शीला ने उसे अपनी ओर देखते हुए पकड़ लिया।

नतीजा यह हुआ कि वह उससे कतराने लगी।

हरियाली तीज का दिन शैलेश कैसे भूल सकता था!

उस दिन सबने मिलकर पिकनिक का कार्यक्रम बनाया था। सुबह की भोर की लालिमा के साथ उसका मन भी हरा-भरा हो गया, जब उसने शीला को हरे रंग की पोशाक में देखा।

लंबे खुले बाल बार-बार उसके गालों को छूने की गुस्ताखी कर रहे थे। पैरों में पायल थी और हाथों में घड़ी की जगह कंगन।

शैलेश बस उसे देखता रह गया।

वह अपने बालों के साथ जद्दोजहद कर रही थी। तभी शैलेश वहाँ पहुँच गया। उसने धीरे से उसके बालों को पीछे किया। न जाने उसकी आँखों में शीला ने क्या पढ़ लिया कि उसने झट से अपने बाल बाँध लिए।

बंधे हुए बालों में वह और भी खूबसूरत लग रही थी।

तनिक झुंझलाकर उसने कहा—

“खुलापन कभी-कभी तकलीफ दे जाता है।”

शैलेश ने धीरे से कहा—

“पर बंधन भी तो खूबसूरत है।”

उसका इशारा समझकर शीला ने कहा—

“बंधन में बाध्यता ज़रूरी नहीं।”

और वह वहाँ चली गई जहाँ बाकी लोग बैठे थे।

मिनी ने शैलेश को देखते ही पूछा—

“भैया, कहाँ चले गए थे?”

शैलेश ने शीला की ओर देखते हुए उसे छेड़ा—

“खुले मन को बाँधने।”

दिन बीतते रहे और शैलेश का यकीन अब यकीन में बदल चुका था कि उसे शीला से प्यार हो गया है।

शायद अब तक मिनी भी समझने लगी थी, लेकिन लिहाज़ के कारण कुछ नहीं कहती थी।

और शीला…

उसे तो जैसे पहले ही दिन सब समझ आ गया था।

उसने शैलेश से एक दूरी बनानी शुरू कर दी थी, जिसे शायद सिर्फ शैलेश ही समझ पा रहा था। उसके बाद वह किसी भी पिकनिक में शामिल नहीं हुई।

शैलेश अंदाज़ लगाता रहता कि उसकी समझदारी शायद उससे कहीं आगे निकल चुकी है। वह दूर रहकर भी समझ रही थी कि उसकी दीवानगी कुछ ज़्यादा बढ़ रही है।

इसीलिए अब वह उनके घर आने के बजाय मिनी को अपने घर बुलाने लगी।

दुनिया में इतने चेहरे थे, फिर उसकी नजर सिर्फ एक चेहरे पर आकर क्यों ठहर गई थी?

शीला उससे छोटी थी, फिर भी वह उससे क्यों डरता था?

उसकी चाहत पाक थी, पाप नहीं।

फिर जब वह सामने होती तो उसके शब्द क्यों खो जाते थे? वह जड़ क्यों हो जाता था?

आज बहुत दिनों बाद शीला घर आई थी। घर में पूजा थी, इसलिए उसने पीली साड़ी पहन रखी थी। लंबी ढीली चोटी को उसने जूड़े का रूप दे दिया था और उसमें लगे जूही के फूल उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहे थे।

शैलेश उसे बहुत दिनों बाद देख रहा था।

मिनी ने भी आज लाल साड़ी पहन रखी थी। दोनों न जाने किस बात पर खिलखिला रही थीं।

तभी शीला उठकर रसोई की तरफ चली गई।

शैलेश खुद को रोक नहीं सका। उसके कदम भी अनायास उसी दिशा में बढ़ गए।

शीला घड़े से पानी निकालकर पी रही थी।

शैलेश को देखकर उसने पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ा दिया।

गिलास लेते समय उसकी उँगलियाँ अनजाने में शीला की उँगलियों को छू गईं।

शीला ने शायद उस स्पर्श को उसकी मंशा समझ लिया। वह तुरंत वहाँ से बाहर चली गई।

शैलेश स्तब्ध खड़ा सोचता रह गया—

यह लड़की हर बात पहले ही कैसे समझ जाती है?

पता नहीं इस वक्त उसके मन में क्या चल रहा होगा।

वह मेरी हर बात समझती है, बस मेरी चाहत क्यों नहीं समझ पाती?

काश! तुम इतनी छोटी होतीं कि मैं तुम्हें अपनी जेब में रख लेता। जब जी चाहता तुम्हें देखता और जब जी चाहता तुम्हें गले से लगा लेता।

मेरा एक ही जुर्म है ना—मुझे तुमसे प्यार हो गया।

तो क्या हुआ?

प्यार ही तो हुआ है।

तुम हो ही इतनी प्यारी और मासूम… और समझदारी के साथ मासूमियत बहुत कम लोगों में पाई जाती है।

शैलेश अक्सर मन ही मन शीला से बातें किया करता। मन जवाब नहीं देता, तो वह शीला की ओर से अपने मनचाहे जवाब पाकर खुद को बहलाता रहता।

धीरे-धीरे उसे अकेलेपन का अँधेरा भी अच्छा लगने लगा।

समय बीतता गया।

मिनी और शीला दोनों पढ़ाई के लिए बाहर चली गईं और शैलेश के पास रह गईं सिर्फ उन दिनों की यादें।

लोग चले जाते हैं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें वहीं ठहर जाती हैं।

यही उसके साथ हो रहा था।

जब भी मिनी से बात होती, वह खुद ही कह देती—

“भैया, शीला भी ठीक है। आप अच्छे से रहना।”

उसके सूने मन को रातरानी के फूल खिलने का इंतज़ार था। किंतु अभी वह मौसम आया नहीं था।

फिर भी उसने मन में ठान लिया था कि अबकी बार हिम्मत करके कह देगा—

“क्या तुम मेरे साथ आसमान में उड़ने के लिए तैयार हो?

क्या तुम मेरे आँगन में अपनी महक बिखेरना चाहोगी?”

उस दिन भी वह शीला के ख्यालों में खोया हुआ था कि अचानक उसकी नजरों को यकीन ही नहीं हुआ।

सामने से शीला चली आ रही थी।

धीरे-धीरे वह उसके करीब आ गई।

शैलेश पलकें झपकाना ही भूल गया।

उसने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में हल्की-सी नमी थी, जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रही थी।

उसने धीरे से कहा—

“कैसे हैं?”

आज भी उसके बाल खुले थे और उसके गालों को छूने की वही शरारत कर रहे थे।

शैलेश ने उस दिन की तरह ही उसके बालों को उसके चेहरे से हटाया।

आज उसने उसे रोका नहीं।

बस मुस्कुरा दी।

और तभी शैलेश की आँख खुल गई।

क्या यह सपना था?

हाँ… सपना ही था।

काश! पूरा हो जाए।

तभी फोन की घंटी बजने लगी।

शैलेश ने फोन उठाया।

“हैलो…”

“भैया…”

“हाँ, बोल। क्या बात है? तू इतनी घबराई हुई क्यों है?”

कुछ क्षण चुप्पी रही।

फिर मिनी की काँपती हुई आवाज़ आई—

“भैया… वो शीला…”

शैलेश का दिल धक से रह गया।

“हाँ, क्या हुआ?”

“भैया… शीला अभी कुछ देर पहले ही…”

“हाँ बोल मिनी! कुछ देर पहले क्या?”

दूसरी तरफ से सिसकती हुई आवाज़ आई—

“शीला अब नहीं रही।”

शैलेश जैसे पत्थर का हो गया।

“क्या…?”

“उसे हार्ट अटैक आया था और वह…”

आगे की आवाज़ उसके कानों तक पहुँची ही नहीं।

फोन उसके हाथ में था, लेकिन उसकी दुनिया जैसे वहीं थम गई थी।

जिस प्रेम को उसने कभी शब्द नहीं दिए, वह आज हमेशा के लिए मौन हो चुका था।

जिसे वह एक दिन अपने मन की बात कहने वाला था, वह सुनने के लिए इस दुनिया में रही ही नहीं।

शैलेश की आँखों से आँसू बहते रहे।

और उसके होंठों पर बस वही अधूरी पंक्तियाँ थीं—

“वो आँसू जो बह नहीं पाए…

वो बातें जो कह नहीं पाए…”

विजया डालमिया

राष्ट्रीय संयोजिका,  उलझन सुलझन

महिला लेखिका प्रकोष्ठ

प्रस्तुति







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