जब कान्हा आए - प्रमिला

जब कान्हा आए

भूमिका

कभी-कभी इतिहास में कोई घटना केवल घटना नहीं रहती, वह युगों की चेतना बन जाती है। श्रीकृष्ण का जन्म भी ऐसी ही एक घटना है—जिसमें एक ओर अत्याचार से घिरी अंधेरी रात है, तो दूसरी ओर उसी अंधकार को चीरता हुआ दिव्य प्रकाश। मथुरा के कारागार में जन्मे कृष्ण ने केवल देवकी और वसुदेव के जीवन को नहीं बदला; उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को प्रेम, करुणा, साहस, कर्म और धर्म का एक ऐसा मार्ग दिया, जो आज भी मनुष्य के भीतर आशा जगाता है।

कृष्ण की कथा का सौंदर्य इस बात में है कि उसमें ईश्वर का विराट स्वरूप भी है और एक नन्हे बालक की निश्छल मुस्कान भी। वे देवकी के लिए दिव्य अवतार हैं, यशोदा के लिए लाल हैं, ग्वाल-बालों के लिए सखा हैं, गोपियों के लिए प्रेम की अनुभूति हैं और अर्जुन के लिए जीवन के गहनतम सत्य का उद्घोष करने वाले सारथी। शायद इसी कारण कृष्ण किसी एक रूप, एक संबंध या एक युग में सीमित नहीं होते।

‘जब कान्हा आए’ उसी अनुभूति की कहानी है—उस रात की, जब अंधकार के बीच प्रकाश ने जन्म लिया; उस क्षण की, जब भय के बीच विश्वास ने जन्म लिया; और उस यात्रा की, जिसमें एक नन्हा बालक मथुरा से गोकुल पहुँचा और देखते ही देखते लोगों के जीवन में प्रेम, आनंद और आशा का नया संगीत भर गया।

और शायद आज भी प्रश्न यही है—क्या कान्हा सचमुच आते हैं?

हाँ, जब हमारे भीतर का अंधकार प्रेम से उजाला होने लगता है, जब भय के बीच विश्वास जन्म लेता है, जब स्वार्थ के स्थान पर करुणा आती है और जब किसी दूसरे के सुख के लिए हमारा हृदय निःस्वार्थ होकर धड़कता है—तब समझिए, कान्हा आए हैं।

जब कान्हा आए

मथुरा की वह रात साधारण रात नहीं थी।

आकाश में घने बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। वर्षा की बूंदें जैसे धरती पर कोई अनकहा संदेश लिख रही थीं। यमुना शांत होकर बह रही थी और मथुरा के वातावरण में एक विचित्र-सी प्रतीक्षा थी—मानो प्रकृति स्वयं किसी महान घटना के घटित होने की राह देख रही हो।

उधर कारागार की अंधेरी कोठरी में देवकी और वसुदेव अपने उस शिशु की प्रतीक्षा कर रहे थे, जिसके जन्म ने स्वयं कंस के हृदय में भय भर दिया था।

देवकी की आँखों में चिंता थी, पर हृदय में विश्वास।

आधी रात का समय हुआ।

अचानक कारागार दिव्य प्रकाश से भर उठा। देवकी ने देखा—उनकी गोद में कोई साधारण शिशु नहीं, स्वयं श्रीहरि बाल रूप में विराजमान हैं।

देवकी की आँखों से आँसू बह निकले। यह आँसू भय के भी थे, वात्सल्य के भी और उस अद्भुत अनुभूति के भी, जिसे शब्दों में बाँध पाना संभव नहीं।

उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा—

“प्रभु! आप स्वयं मेरे पुत्र बनकर आए हैं, लेकिन कंस आपको जीवित नहीं रहने देगा।”

बालकृष्ण मुस्कुराए।

उनकी मुस्कान में जैसे आश्वासन था।

“माँ, चिंता मत करो। मेरा जन्म केवल एक घर को उजाला देने के लिए नहीं हुआ। मैं उन सभी हृदयों में प्रेम जगाने आया हूँ, जहाँ अंधकार ने अपना घर बना लिया है।”

इतना कहकर उन्होंने वसुदेव को संकेत दिया कि उन्हें गोकुल ले जाएँ।

वसुदेव ने कृष्ण को एक टोकरी में रखा और कारागार से बाहर निकल पड़े। आश्चर्य! जिन द्वारों पर कड़ा पहरा था, वे एक-एक करके अपने आप खुलते चले गए। पहरेदार गहरी निद्रा में सोए थे।

जैसे प्रकृति स्वयं उस दिव्य बालक की यात्रा में सहायक बन गई हो।

बाहर मूसलाधार वर्षा हो रही थी।

वसुदेव यमुना के तट पर पहुँचे। नदी उफान पर थी। उन्होंने कृष्ण को सिर से ऊपर उठाया और जल में उतर गए।

लहरें ऊँची थीं, रात गहरी थी और मार्ग अनिश्चित था।

लेकिन जैसे-जैसे वसुदेव आगे बढ़े, यमुना का जल शांत होने लगा।

मानो नदी भी उस नन्हे कान्हा के चरणों का स्पर्श पाने को व्याकुल हो।

वह रात केवल एक पिता की यात्रा नहीं थी। वह अंधकार से प्रकाश की ओर, भय से विश्वास की ओर और कारागार से स्वतंत्रता की ओर बढ़ती हुई एक प्रतीकात्मक यात्रा भी थी।

वसुदेव अंततः गोकुल पहुँचे।

उसी रात नंद बाबा के घर यशोदा मैया ने एक बालिका को जन्म दिया था। वसुदेव ने कृष्ण को वहाँ सुला दिया और उस बालिका को लेकर वापस मथुरा लौट आए।

प्रभात हुआ।

और जैसे ही गोकुल में यह समाचार फैला कि नंद बाबा के घर पुत्र जन्मा है, पूरा गोकुल आनंद से भर उठा।

बधाइयाँ गूँजने लगीं। घर-घर मंगलगीत सुनाई देने लगे। गलियों में उत्सव था और लोगों के चेहरों पर ऐसी प्रसन्नता थी, जैसे स्वयं आनंद ने बाल रूप धारण कर लिया हो।

यशोदा मैया ने जब पहली बार अपने लाल को गोद में लिया, तो उनकी आँखें भर आईं।

उन्होंने कृष्ण के माथे को चूमा और वात्सल्य से भरकर कहा—

“मेरे लाल, पता नहीं तुम कौन हो... पर इतना जानती हूँ कि तुम्हें देखकर मेरा हृदय पूरा हो गया है।”

कृष्ण मुस्कुराए।

उस छोटी-सी मुस्कान में जैसे पूरा ब्रह्मांड समा गया था।

गोकुल की गलियों में फिर एक नया संगीत गूँजने लगा—माखन की मटकियों का, ग्वाल-बालों की हँसी का, गायों की घंटियों का, बांसुरी की मधुर तान का और सबसे बढ़कर यशोदा मैया के वात्सल्य का।

कान्हा बड़े हुए तो उनकी बाल लीलाओं ने पूरे गोकुल को अपना बना लिया।

कभी माखन चुराया, कभी सखाओं के साथ शरारत की, कभी गोपियों को छेड़ा और कभी बांसुरी की ऐसी तान छेड़ी कि सुनने वाला अपना सब कुछ भूलकर उसी ओर खिंचा चला जाए।

पर कृष्ण की लीलाओं का अर्थ केवल उनकी बाल-शरारतों में नहीं था।

उनके जीवन की सबसे बड़ी सीख शायद यही थी कि ईश्वर को पाने के लिए बाहरी आडंबर से अधिक आवश्यक है—एक सच्चा, निर्मल और प्रेम से भरा हृदय।

कृष्ण ने जीवन के हर रंग को स्वीकार किया। उन्होंने प्रेम किया, मित्रता निभाई, अन्याय का विरोध किया, धर्म की रक्षा की और कर्म का मार्ग दिखाया।

उन्होंने यह भी सिखाया कि जीवन से भागना समाधान नहीं है; परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने कर्तव्य के साथ खड़ा रहना चाहिए।

इसीलिए कृष्ण केवल मंदिरों में स्थापित एक प्रतिमा नहीं हैं।

वे जीवन जीने की एक दृष्टि हैं।

आज भी जब जन्माष्टमी की रात मंदिरों में घंटियाँ बजती हैं, दीप जलते हैं और चारों ओर “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” की ध्वनि गूँजती है, तो मन अनायास कह उठता है—

कान्हा फिर आ गए।

लेकिन शायद प्रश्न यह नहीं कि कान्हा कहाँ आए।

प्रश्न यह है कि वे हमारे भीतर कहाँ आए?

क्या उन्होंने हमारे भय को विश्वास में बदला?

क्या उन्होंने हमारे क्रोध को करुणा में बदला?

क्या उन्होंने हमारे स्वार्थ को सेवा में बदला?

क्या उन्होंने हमारे भीतर किसी दुखी के लिए संवेदना जगाई?

यदि हाँ, तो समझिए—कान्हा सचमुच आए हैं।

वे किसी एक घर में जन्म लेकर पूरे संसार के हो गए थे।

और आज भी उनका जन्म तभी सार्थक होता है, जब हमारे भीतर प्रेम जन्म ले।

जहाँ प्रेम है, वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ करुणा है, वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ सत्य के लिए साहस है, वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ कर्तव्य के प्रति निष्ठा है, वहाँ कृष्ण हैं।
और जहाँ किसी के लिए निःस्वार्थ भाव से दुआ उठती है—
वहीं कान्हा का जन्म होता है।

इसलिए जन्माष्टमी केवल कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है।

यह अपने भीतर के अंधकार को पहचानने और उसमें प्रेम का दीप जलाने का अवसर है।

कंस बाहर कहीं हो या न हो, उसके भय, अहंकार, क्रोध और स्वार्थ के छोटे-छोटे रूप हमारे भीतर अवश्य जन्म लेते रहते हैं।

और जब हमारा विवेक, प्रेम और करुणा उन पर विजय पाने लगते हैं—

तभी सच में कान्हा आते हैं।

रचनाकार



प्रस्तुति











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