शिक्षा और संस्कार ही सूबे सिंह जी की सबसे बड़ी पूँजी
प्रस्तावना
शिक्षक सूबे सिंह जी ने शिक्षा और संस्कारों को अपनी सबसे बड़ी पूँजी बनाया है। उनके सान्निध्य में पले-बढ़े विद्यार्थियों ने यह सिद्ध किया है कि सच्ची शिक्षा जीवन को दिशा देती है और आत्मबल का निर्माण करती है। उनके शिष्य आज शिक्षा, पुलिस, सेना, बी.एस.एफ. और आई.टी. जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी उत्कृष्ट सेवाएँ दे रहे हैं, जो उनके शिक्षण कौशल और जीवन मूल्यों की जीवंत झलक है। सूबे सिंह जी की शिक्षण यात्रा केवल किताबों तक सीमित न रहकर चरित्र, अनुशासन और समाज निर्माण की संपूर्ण दृष्टि से परिपूर्ण रही है। प्रस्तुत साक्षात्कार इसी दृष्टि को उजागर करता है, जिसमें उनके विचार, अनुभव और शिक्षा विभाग में व्याप्त कुरीतियों पर उनके स्पष्ट सुझाव शामिल हैं।
✦ सूबे सिंह जी पर संवादात्मक साक्षात्कार ✦
बातचीत
प्रश्न 1: सूबे सिंह जी, आपके शिक्षण का मूल आधार क्या रहा?
उत्तर: मैंने हमेशा शिक्षा को केवल रोजगार पाने का साधन नहीं, बल्कि जीवन निर्माण का मार्ग माना। शायद इसी का परिणाम है कि मेरे सान्निध्य में जितेन्द्र सिंह गुर्जर आज आई.टी. इंजीनियर बनकर सरकारी विभाग में कार्यरत हैं और शिक्षा से आत्मबल लेकर जीवन में आगे बढ़ रहे हैं।
प्रश्न 2: आप शिक्षा को किस रूप में देखते हैं?
उत्तर: शिक्षा मेरे लिए आत्मबल और आत्मनिर्भरता का माध्यम है। देखिए, अनिल कुमार आज बी.एस.एफ. में कमांडेंट हैं। यह केवल डिग्री से नहीं, बल्कि शिक्षा से मिले अनुशासन और आत्मबल का परिणाम है।
प्रश्न 3: आपके शिक्षण कौशल की विशेषता क्या रही?
उत्तर: मेरी कोशिश रही कि विद्यार्थी केवल पाठ्य-पुस्तक का ज्ञान न लें, बल्कि व्यवहार में भी श्रेष्ठ बनें। डॉ. सुरेशपाल सिंह गुर्जर शिक्षा विभाग, मुरादाबाद में कार्यरत हैं और रविशंकर गुर्जर अमरोहा में। वे दोनों आज अपने-अपने विद्यालयों में बच्चों को वही संस्कार दे रहे हैं, जो उन्होंने मुझसे पाए।
प्रश्न 4: आपने अपने विद्यार्थियों को शिक्षा के किस पहलू पर बल दिया?
उत्तर: मैंने हमेशा कहा कि शिक्षा का मूल्यांकन अंकों से नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता से होना चाहिए। उदाहरण के लिए, बोबी शर्मा जो लखनऊ पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर हैं, उन्होंने ईमानदारी और कर्मनिष्ठा से सेवा को ही शिक्षा का सबसे बड़ा फल बताया।
प्रश्न 5: आपके शिष्यों की सफलता का श्रेय किसे दिया जा सकता है?
उत्तर: मैं केवल मार्गदर्शन देता हूँ, असली मेहनत तो बच्चों की है। अजयपाल गुर्जर अमरोहा के शिक्षा विभाग में हैं, गिरधारी सैनी शिक्षा विभाग में, और जोगेन्द्र सिंह गुर्जर पुलिस विभाग में। इनकी सफलताएँ यह बताती हैं कि परिश्रम ही सबसे बड़ा हथियार है।
प्रश्न 6: आज के शिक्षण विभाग में कौन-कौन सी कुरीतियाँ आपको सबसे अधिक चिंतित करती हैं?
उत्तर: सबसे अधिक चिंता नकल की प्रवृत्ति और अध्यापकों की औपचारिकता की है। रविकुमार सैनी और संगीता यादव जैसे छात्र, जिन्होंने ईमानदारी से सफलता पाई, यह सिद्ध करते हैं कि बिना नकल और शॉर्टकट्स के भी सफलता संभव है।
प्रश्न 7: इन कुरीतियों पर कैसे काबू पाया जा सकता है?
उत्तर: शिक्षा को नौकरी-केंद्रित न बनाकर व्यक्तित्व-केंद्रित करना होगा। साथ ही अध्यापकों का प्रशिक्षण आवश्यक है। यदि हर शिक्षक अपने विद्यार्थियों को परिवार का हिस्सा मानकर पढ़ाए, तो नकल और ट्यूशन संस्कृति अपने आप समाप्त हो जाएगी।
प्रश्न 8: आपके विचार में शिक्षा विभाग को आप क्या प्रेरणा देना चाहेंगे?
उत्तर: मैं यही कहना चाहूँगा कि एक शिक्षक केवल ज्ञान का स्रोत नहीं है, वह समाज का शिल्पकार है। मेरे शिष्यों की सफलता, चाहे सेना में हो या पुलिस में, इस बात की गवाही है कि सच्चा शिक्षक पीढ़ियों को दिशा दे सकता है।
प्रश्न 9: एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ा शिक्षण कौशल क्या होना चाहिए?
उत्तर: शिक्षक को विद्यार्थियों की छिपी हुई प्रतिभा पहचानने का कौशल आना चाहिए। हर बच्चा अलग होता है। यदि मैंने यह न पहचाना होता, तो शायद मेरे किसी शिष्य को उसकी उपयुक्त राह न मिलती।
प्रश्न 10: आपके अनुसार शिक्षा का अंतिम उद्देश्य क्या है?
उत्तर: शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं है। शिक्षा का लक्ष्य ऐसा जीवन है जो स्वयं के लिए, परिवार के लिए और राष्ट्र के लिए उपयोगी हो। जब मेरे शिष्य विभिन्न विभागों में सेवा कर रहे हैं, तब मुझे यही लगता है कि मेरी शिक्षा सफल रही।
👉 इस संवाद से साफ़ झलकता है कि सूबे सिंह जी की शिक्षण यात्रा केवल किताबों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन और समाज निर्माण की एक संपूर्ण दृष्टि रही।
सूचना स्रोत
श्री सूबे सिंह
पाठ्य उन्नयन एवं विस्तार




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