साथ के बाद भी साथ

साथ के बाद भी साथ

भूमिका

क्या सचमुच किसी अपने के बिना जीवन की कल्पना संभव है?

जब कोई रिश्ता वर्षों की साझी सांसों, आदतों और भावनाओं से गहराई तक जुड़ जाता है, तब उसके बिछुड़ने का विचार ही मन को अस्थिर कर देता है। हम अक्सर यह मान लेते हैं कि “उसके बिना मैं नहीं रह सकता/सकती,” लेकिन क्या प्रेम केवल साथ रहने का नाम है, या यह एक ऐसी विरासत भी है जो हमें अकेले जीना सिखा जाती है?

यह लघुकथा इसी गहन भाव को स्पर्श करती है—जहाँ दो जीवनसाथी केवल साथ जीना ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के बिना जीने की तैयारी भी प्रेमपूर्वक करते हैं। यह कहानी जिज्ञासा जगाती है कि क्या सच में बिछड़ना अंत होता है, या एक नए आत्मविश्वास की शुरुआत?

लघुकथा

माधव और मीरा की शादी को पचास साल पूरे हो चुके थे। दोनों अब सफ़ेद बालों और झुर्रियों में भी एक-दूसरे के बिना अधूरे थे। सुबह की चाय से लेकर रात की दवाई तक—सब कुछ माधव के बिना मीरा अधूरा मानती थी, और मीरा के बिना माधव का तो जीना ही मुश्किल था।

एक दिन पार्क की बेंच पर बैठे माधव ने कहा,

“मीरा, सोचता हूँ, अगर मैं पहले चला गया, तो तुम्हें बैंक का रास्ता भी कौन बताएगा?”

मीरा मुस्कुरा दी, लेकिन उसकी आँखों में हल्की नमी थी।

“और अगर मैं पहले चली गई, तो तुम्हारी इलायची वाली चाय कौन बनाएगा, माधव?”

उस दिन से दोनों ने तय किया—अब जीवन के अंत की भी तैयारी करनी होगी, उसी अपनत्व और हँसी के साथ।

माधव ने मीरा को बैंक, एटीएम, गैस एजेंसी और बिल भरने के तरीके सिखाने शुरू किए।

मीरा ने भी माधव को दाल-चावल और खिचड़ी बनाना सिखाया।

कभी माधव रसोई में मसाले ज़्यादा डाल देता, तो मीरा हँसकर कहती,

“अब तुम्हें तो शेफ बनना पड़ेगा।”

और कभी मीरा पासबुक में गलत एंट्री कर देती, तो माधव कहता,

“चलो, अब तो तुम बैंकर बन ही गईं।”

धीरे-धीरे दोनों ने जीवन को एक “आनंदाश्रम” बना दिया—जहाँ उम्र का हर दिन, हर पल एक उत्सव बन गया।

सुबह मंदिर, दोपहर टीवी सीरियल, शाम पार्क की सैर और रात को पुराने गाने।

माधव अक्सर कहता,

“मीरा, अब मौत का डर नहीं लगता। हमने सब सिख लिया है, सब बाँट लिया है।”

मीरा मुस्कुराकर कहती,

“अब जो भी पहले जाए, दूसरे को डर नहीं रहेगा—बस यादें रहेंगी।”

एक सुबह माधव ने मीरा के लिए वही इलायची चाय बनाई, बिस्कुट रखे और कहा,

“चलो, आज बैंक चलते हैं।”

मीरा ने मुस्कुराकर कप लिया और बोली,

“अब सब आता है, कहीं जाने की जल्दी नहीं।”

शाम को जब मीरा ने वही चाय माधव के लिए बनाई, वह बेंच पर बैठे-बैठे मुस्कुरा रहा था—

मानो कह रहा हो, “अब मैं निश्चिंत हूँ… अब तुम सब जानती हो…”

मीरा ने उसके कंधे को छुआ—

वह जा चुका था। शांत, मुस्कुराता हुआ—जैसे पका पत्ता हवा में झूमकर धरती से मिल गया हो।

मीरा की आँखों से आँसू बहे, मगर चेहरा शांत था।

वह जानती थी—माधव चला गया, लेकिन उसने उसे जीवन जीने का सबसे सुंदर तरीका सिखा दिया था—

“जीवन के हर पड़ाव को प्रेम, तैयारी और आनंद से अपनाना।”

और उस दिन से मीरा का घर सचमुच “आनंदाश्रम” बन गया—

जहाँ हर याद, हर वस्तु, हर सुगंध माधव के प्रेम की तरह बस गई थी।

रचयिता

प्रमिला त्रिवेदी 

स्थानीय सम्पादिका 

उलझन सुलझन, लेडीज विंग 

बैंगलोर

प्रस्तुति

 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार







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