बिना नानी के भी… नानी का घर

बिना नानी के भी… नानी का घर 

मायका, मामा, मासी, माँ—और फिर माँ की माँ, यानी नानी… ये वो रिश्ते हैं जो ममत्व से जुड़े हैं। इसलिए बच्चे हर छुट्टियों में नानी के घर जाना चाहते हैं, क्योंकि वहाँ की मिट्टी में माँ की ही सुगंध होती है। ये वो घर है, जिसके कोने-कोने भी उन्हें माँ के नाम से जानते हैं। इसलिए नानी न हो, तो भी बच्चे उसे नानी का घर ही कहते हैं।


नानी के घर की खूबी… मासी—यानी माँ जैसी, और मामा—यानी दो माँ का प्यार! और आज़ादी कितनी—ये तो पूछो ही मत। इसीलिए माँ और नानी के साथ गलियारे में दौड़ता है बचपन।

“बिज्जू, रुक… वहाँ मत जा!”

“क्यों, मम्मी…?”

“बस कह दिया ना…”

उनकी बात सुनी और भाग गए—कोई सवाल ही नहीं।

“मम्मी, हमें नए ड्रेस पहनने कब मिलेंगे?”

“अभी दशहरे पर…”

और तभी से नजरें आते-जाते उस ट्रंक को बड़ी हसरत से देखने लगतीं, जिसमें नए ड्रेस रखे होते थे। इसीलिए हर त्योहार का भी बड़ी बेसब्री से इंतज़ार किया जाता।

“मम्मी, मेरी लंबी चोटी कर ना…”

“कितनी लंबी तो है…”

कहकर मम्मी दिखातीं, पर मुझे पसंद नहीं आती। तब मम्मी रिबन में रिबन जोड़कर बालों की तरह गूंथ देतीं। चोटी लंबी हो जाती—और मैं खुश।

“मम्मी, पिक्चर देखने जाना है… पुरानी वाली, तेरी पसंद की…”

थोड़ी आनाकानी के बाद मम्मी तैयार हो जातीं।

“मम्मी, तू हमको प्यार नहीं करती…”

जब मैं उन्हें देखती, तो उनकी आँखों में अपने प्रति बेशुमार प्यार—जो हमेशा अव्यक्त रहा—स्पष्ट दिखता।

“मेरे बर्थडे पर मुझे फ्रेंड्स को बुलाना है…”

“अपने यहाँ लड़कियों के जन्मदिन नहीं मनाए जाते…”

मैं थोड़ी गुस्से से उन्हें देखती और कहती—“क्यों…?”

बाद में मम्मी कहतीं—“ठीक है, बुला लेना…”

और मैं अपनी जीत पर फूली नहीं समाती।

यह भी भूल जाती कि मेरी इन्हीं सहेलियों के घर आने पर मम्मी उन्हें इतने प्यार से खाना खिलाती थीं, जो किसी बर्थडे पार्टी से कम नहीं था। पर हम बेवकूफ थे, जो इतनी छोटी-छोटी बातों का बड़ा महत्व समझ नहीं पाते थे… अब समझते हैं।

मम्मी कहती थीं—“बिना नानी के भी नानी का घर, नानी का ही कहलाता है…”

आज, जब मोहन की दादी—यानी मैं—अपनी नानी के यहाँ आई, तब नानी का घर बिना नानी के एक अलग ही सूनेपन का एहसास करा गया। जैसे मंदिर तो है, मगर भगवान की मूरत नहीं।

स्टेशन से ही कुछ यादों को तलाशते हुए, कुछ यादों से मुलाकात करते हुए जैसे ही घर पहुँची—जानी-पहचानी खुशबू और हवा का एक स्पर्श सहला कर कह गया—“आ गई तू…?”

ऐसा लगा मानो नानी की मुस्कुराती आँखें मुझे देखकर प्यार से आशीर्वाद दे रही हों। तभी नजर पड़ी नीचे आँगन में—जहाँ नानी का बसेरा था, वहाँ आज एक सन्नाटा बिखरा पड़ा था।

दिल से आवाज आई—

“बिना नानी के भी… नानी का घर, नानी

 का ही कहलाता है…”

मम्मी की यह बात भी आज सच हो गई।

सृजक

विजया डालमिया 

राष्ट्रीय संयोजिका 

उलझन सुलझन, लेडीज लेखिका विंग 

हैदराबाद (तेलंगाना)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 




प्रस्तुति



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