खुशबू वाला शहर
खुशबू वाला शहर
भूमिका
यादों की अपनी एक खुशबू होती है—जो समय, दूरी और परिस्थितियों के पार जाकर भी मन को छू लेती है। ऐसी ही अनकही, अनछुई और कहीं भीतर तक उतर जाने वाली अनुभूतियों को समेटे हुए विजया डालमिया (संपादक *मेरी निहारिका*) की कहानी *“खुशबू वाला शहर”* पाठकों को एक ऐसे भावलोक में ले जाती है, जहाँ शहर सिर्फ ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि रिश्तों, प्रतीक्षाओं और अधूरी रह गई बातों का बन जाता है। यह कहानी केवल अमृता और अपूर्व की स्मृतियों का सिलसिला नहीं, बल्कि हर उस दिल की दास्तान है जिसने कभी किसी को पूरे मन से चाहा हो और फिर उसे समय के हवाले करना पड़ा हो। आखिर उस पैकेट में क्या था जो बीते लम्हों को फिर से जीवंत कर गया? क्या सचमुच यादों की खुशबू कभी खत्म होती है? इन सवालों की टीस और मिठास को महसूस करने के लिए पाठक खुद को इस कहानी में डूबने से रोक नहीं पाएंगे।
कहानी
जब- जब मैं इस शहर से गुजरती हूँ दिल मानो वहीं थम जाता है। हालांकि अब वहाँ कुछ नहीं। न ही, हमारे लिए शहर मायने नहीं रखता। मायने रखते हैं वहां रहने वाले इंसान। हर इंसान अपनेआप में एक यादों का शहर लेकर चलता है। जैसे ही ट्रेन थमी, मेरी भी यादों की कड़ी इस शहर के इंसान पर आकर थम गई। शाम के 6:00 बज रहे थे, किंतु ठंड की वजह से यूं लग रहा था मानो कितना अंधेरा हो गया हो... ठीक मेरे मन की तरह।
एक बार अगर यादों के कोहरे ने मुझे घेरना शुरू कर दिया तो फिर बस मुझे कुछ दिखाई नहीं देता... सिवाय एक धुंधली आकृति के। तभी जैसे मुझे किसी ने कोहरे की चादर हटाकर आवाज दी... अमृता जी ....अमृता जी। मैंने देखा एक दुबली-पतली काया ट्रेन की खिड़की से झांक कर इशारों में मुझसे कुछ कह रही थी। मैंने खिड़की खोली तो उसने खिड़की से ही मुझे एक पैकेट थमाया यह कहते हुए कि...." यह आपका सामान"। मैं कुछ पूछती उससे पहले ही ट्रेन चल पड़ी। मैंने पैकेट खोला। एहसासों की आकृतियाँ शक्ल के रूप में चहलकदमी करने लगीं।
... अमृता सुनो ना, तुम्हारे बालों में यह गुलाब बहुत अच्छा लगेगा.... कहकर जब उसने गुलाब लगाया तो मैं इंकार न कर सकी। यह वही गुलाब था।
.... मैं तुम्हारे लिए कुछ लाई हूं....
.. क्या..?
... यह रुमाल...
... अच्छा ! इसमें स्पेशल क्या है...? जैसे ही उसने शरारती अंदाज में मुझसे पूछा मैंने कहा.... देखो मैंने तुम्हारा नाम इसमें कितने सुंदर अंदाज में एंब्रॉयडरी से सजाया है....।
उसने मेरे हाथों को चूमकर कहा... तुम मेरे लिए रुमाल लेकर आई, यही बहुत स्पेशल था। इस पर तुम्हारे हाथों की एंब्रायडरी.... वाह भई वाह...
मैंने हौले से उस नाम पर उंगली फिराई तो वही एहसासों का स्पर्श मुझे मुझे सहलाते चला गया।
...अमृता क्या बात है? क्यों परेशान हो?
... अरे मेरा वह ब्रेसलेट नहीं दिख रहा जो मैं हमेशा पहनती हूँ। पता नहीं कहाँ गुम हो गया।
... छोड़ो, कहीं खो गया होगा। एक ब्रेसलेट के लिए इतनी परेशान?
... नहीं यार, वह मेरे लिए बहुत लकी है। आज मेरा लकी ब्रेसलेट मेरे पास था पर मैं लकी नहीं थी शायद। मैंने ब्रेसलेट एक साइड में रख दिया।
... सुनो अपूर्व यह गोल्डन पेन अपने पास रखो। तुम इंटरव्यू के लिए जा रहे हो ना। अच्छा दिखेगा।
... थैंक्स अमृता। यार तुम मेरा कितना ख्याल रखती हो। अमृता जब कभी तुम मुझसे दूर जाओगी तो मैं इसी पेन से तुम्हें खत लिखा करूंगा...।
... अच्छा... कह कर उसने जब उसकी आँखों में झांका तो वह कहने लगा.... तुम्हारे सुनहरे वाले पेन से मेरे दिल के जज्बात सुनहरे हो गए... कहकर उसने पेन अपने शर्ट में लगा लिया।
सुनहरा पेन आज भी जगमगा रहा था, पर जज्बात सारे धूमिल हो चुके थे।
जुदा होना कितना कठिन है, यह तब समझ में आता है जब अकेले चलते-चलते सर्द राहों में हमें प्यार की कोई शाॅल नहीं मिलती। आँखों की सूजन समझाती है कि रोने से ज्यादा अच्छी वो सूजी आँखें थीं जो रात भर जागकर बात करने के बाद आती थीं।
ओह अपूर्व... यह सामान तुम्हारे लिए बहुत कीमती था, पर मेरे लिए तो तुम्हारा वह साथ ...तुम्हारी प्यारी बातें ही मायने रखती थीं।लौटा सको तो लौटा दो वो लंबी-लंबी बातों वाली छोटी-छोटी रातें। वो एहसास जो हाथों को छूकर राहों में साथ-साथ थिरकते थे। वह पैगाम जो आँखों ने आँखों को दिए और खामोशी ने समझ कर मीठी मुस्कान के साथ स्वीकृति दी। क्या लौटा सकोगे मेरा वो वक्त जो हमने साथ बिताया? वो आँसू जो हमने साथ बहाये और वह लम्हे जिनमें हम साथ -साथ मुस्कुराए?
खुश्क हुई आंखों से एक आँसू गिरा। अमृता ने यादों की पोटली बंद कर दी। सूखे गुलाब से खुशबू आज भी आ रही थी।
बीती यादें जब कभी
छूकर गुजर जाती हैं
तन -मन में एक हलचल सी मचा
जाती हैं
सो गए जो ख्वाब
फिर से जाग जाते हैं
फिर रातों में नींद
कहाँ आती है...
रचनाकार
विजया डालमिया संपादक मेरी निहारिका

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