मैं ना भूलूँगी
मैं ना भूलूँगी
दिसंबर की सुबह कुछ ठंडी-ठंडी हवाओं का पैगाम लेकर आती है। उस दिन भी मैं सुस्ती में यूँ ही बिस्तर में लेटी थी। तभी इन्होंने आवाज लगाई—"उठो… चाय पी लो।"
चाय पीते-पीते मैंने इनकी तरफ देखा। कितने ही सालों से सुबह की चाय हमेशा यही मुझे बनाकर पिलाते हैं। चाय पीते-पीते मैं यादों के पन्ने पलटने लगी। हमारा जीवन यादों की डायरी ही तो है, जिसके पन्ने पलटने पर हर पन्ने पर यादें—कभी मुस्कुराती, तो कभी गुनगुनाती; कभी खिलखिलाती, तो कभी आँसू छलकाती—मिल ही जाती हैं।
वे बीते पल, जब हम साथ रोए थे, यादों में आकर अक्सर हमें हँसा जाते हैं; और जिन पलों में हम साथ-साथ हँसे थे, वही पल याद आकर कई बार हमें रुला जाते हैं। कभी रूठना, तो कभी मनाना; कभी खुद मान जाना, तो कभी झूठ-मूठ का सताना—यही तो यादें हैं, जो जब भी दस्तक देती हैं, एक झटके में समय को इधर से उधर कर देती हैं। यादों की सड़क बहुत लंबी होते हुए भी मिनटों में सफर तय कर लेती है।
उस दिन भी वही हुआ—बीते हुए पल मेरे साथ चलने लगे।
1998 में अचानक इन्हें किडनी स्टोन की समस्या हुई। कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ऑपरेशन ही करना पड़ेगा, क्योंकि स्टोन का साइज बड़ा है। उस वक्त सिरपुर कागजनगर में हमारा संयुक्त परिवार था, जहाँ मेडिकल सुविधाएँ बहुत अच्छी नहीं थीं।
इनके जीजाजी हैदराबाद में रहते थे। उनका इनके प्रति प्रेम बहुत अधिक था। उन्होंने वहाँ महावीर हॉस्पिटल में डॉक्टर सहारिया से इनका चेकअप करवाया। डॉक्टर सहारिया किडनी ट्रांसप्लांट के विशेषज्ञ थे, किंतु जीजाजी से अच्छे संबंध होने के कारण उन्होंने उनकी बात मान ली और ऑपरेशन के लिए सहमति दे दी।
जिस दिन ऑपरेशन होना था, अस्पताल में बाकी सब लोग थे, किंतु मेरे सास-ससुर, जेठ-जेठानी और बच्चे कागजनगर में ही थे। अस्पताल में आने के बाद मैंने पहली बार इनसे मिलने वालों का इतना बड़ा हुजूम देखा। काम के सिलसिले में ये अक्सर हैदराबाद आते थे और इनके सभी से संबंध बहुत ही मधुर थे—यह वही लोग थे।
हमें बताया गया था कि ऑपरेशन दो घंटे का है, किंतु उसे पाँच घंटे लग गए। ऑपरेशन थिएटर के पास किसी को जाने नहीं दिया जाता था। जो भी डॉक्टर या सिस्टर बाहर आतीं, उनसे जब पूछा जाता, तो सबका एक ही जवाब होता—"ऑपरेशन चल रहा है।"
सब बहुत घबरा रहे थे। मैं शांति से, एक ही स्वर में रामरक्षास्तोत्र का जाप करते हुए, आँखें मूँदकर बैठी थी। तभी लोगों के शोर मचाने पर एक डॉक्टर ने बताया—"स्टोन निकालने के बाद वह हाथ से फिसलकर यूरिनरी ट्रैक्ट में फँस गया है, इसलिए समय लग रहा है। पर घबराने की कोई बात नहीं है, आप लोग शांति रखें।"
जैसे-तैसे ऑपरेशन सफल होने के बाद इन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया। कागजनगर से फोन पर फोन आ रहे थे। ऑपरेशन के बाद जब मैंने अपने सास-ससुर की आवाज सुनी, तो अपने आप को रोक नहीं पाई और फूट-फूटकर रो पड़ी, यह कहते हुए—"अब सब ठीक है।"
उस पूरी रात मैं आईसीयू में इन्हें देखते, सहलाते बैठी रही। एनेस्थीसिया की वजह से ये नींद में ही थे। दिनभर की थकान के कारण मुझे भी हल्की-सी झपकी लग गई।
सुबह लगभग छह बजे, जैसे ही मेरी आँख खुली, मैंने देखा—ये मेरे सिर पर हाथ फेर रहे थे। मैं इनसे कुछ पूछती, उससे पहले ही इनके मुँह से निकले पहले शब्द थे—"तुमने चाय पी…?"
उनका इतना पूछना था कि मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैंने कहा—"इतनी तकलीफ में भी आप मेरी ही चिंता कर रहे हो…?"
तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा—"मुझे पता है, तुम्हें सुबह-सुबह चाय चाहिए होती है। चलो, उठो… चाय पीकर आ जाओ।"
यह बात औरों के लिए शायद बहुत छोटी हो सकती है, किंतु मेरे लिए एक ऐसा एहसास था, जिसके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं थे। जब हमारे पास शब्द नहीं होते, तो आँखें बरसने लगती हैं—और वही मेरे साथ हुआ।
तभी इनकी आवाज ने मुझे फिर वर्तमान में ला खड़ा किया—"क्या हुआ? क्या सोचने लगी?"
मैंने कहा—"कुछ नहीं…" और मुस्कुरा पड़ी।
सच है—यादें एक एहसास की तरह दिलों को जोड़कर रखती हैं। यादों का कोई तोड़ नहीं। यादें एक ऐसी तस्वीर हैं, जो दिल के द्वारा खींची जाती है, उस पल को हमेशा सहेजकर रखने के लिए।
आँखों में उमड़ता प्रेम और एहसासों का समंदर, जिसमें हम जब-जब डूबते हैं, तो कह उठते हैं—
"मैं ना भूलूँगी…!"

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