भाग्य
।।हरिओम।।
भाग्य
एक वृद्धा माई गाँव से बाहर की ओर अपनी कुटिया में रहती थी। शरीर पर मात्र हड्डियों का ढांचा बचा था। उधर से जानेवाले राहगीर उसकी दशा देखकर थोड़ा-बहुत भोजन उसे दे देते थे, उसी से वह अपना गुजारा कर लेती थी।
एक दिन की बात नारद मुनि भ्रमण करते हुये उधर आये। माई की हालत देख उनको तकलीफ हुई। उन्होंने कहा कि माई मैं भगवान विष्णु के धाम जा रहा हूँ, कुछ तुम्हें भी पूछना है तो बताओ। तब उसने कहा कि मेरे कष्ट का निवारण कब होगा यह पूछना ।
नारद मुनि विष्णु-धाम पहुँचे। भगवान तो भक्त की मुद्रा से ही सब कुछ समझ जाते हैं, उन्होंने पूछा कि बोलो मुनिवर आज चिन्तित क्यों? मुनि ने वृद्धा का वृत्तांत सुनाकर उसके कष्ट का समय कब तक है यह पूछा।
इस पर विष्णु जी ने कहा इसकी उम्र बहुत लम्बी है। पिछ्ले जन्म में इसने कभी किसी जरूरतमंद को कुछ नहीं दिया और ना ही किसी दीन-दु:खी की सेवा की। अपने कर्म-खाते में इसने जो डाला है वही वह पा रही है। अत: इस जन्म में इसके भाग्य में यही लिखा है, जिसे मैं भी नहीं मिटा सकता !
विष्णु-धाम से वापसी पर वृद्धा ने नारद जी से पूछा कि विष्णु जी ने क्या कहा! नारद ने जवाब दिया कि राहगीरों द्वारा दिये भोजन में से कुछ हिस्सा पशु-पक्षियों को डाल देना और ईश्वर का गुणगान करते हुये कहना हे प्रभु तुमने मुझे बहुत कुछ दिया, तेरा बारम्बार धन्यवाद।ऐसा कहकर मुनि चले गये।
माई मुनि के बताये अनुसार करने लगी। कुछ समय बाद उस रास्ते राहगीरों की संख्या बढ़ी, भोजन भी ज्यादा मिलने लगा, अब उसने गाय को भी उस भोजन में से देना शुरू किया। धीरे-धीरे अन्य भूखे लोगों में भी वितरण करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसकी स्थिति बदल कर खुशहाल हो गयी। अब उसका जीवन भक्तिमय हो गया था।
समय बीतने लगा, नारदजी फिर उस माई की कुटिया के पास पहुँचे तो देखते हैं कि माई की कुटिया के पास एक पीपल वृक्ष लगा है जहाँ कुछ राहगीर विश्राम कर रहे हैं, आस-पास गायें चर रही है। वृद्धा माई खुश नजर आ रही है।
मुनि आश्चर्यचकित हो विष्णु जी के पास पहुँच बोले, प्रभु आप भी झूठ बोलते हो? आपने तो कहा था इसके भाग्य में नहीं है, फिर यह कैसे हुआ?
तब विष्णु जी बोले, मैं तो विधि के लेख अनुसार ही बोला था, लेकिन इसने अभी किये अच्छे व्यवहार एवं कर्म द्वारा अपने भाग्य को परिवर्तित कर लिया। मैं तो सिर्फ मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों का फल देता हूँ। सब कुछ मनुष्य स्वयं बदल सकता है।
कथा सार
अपने सुकर्म द्वारा व्यक्ति विधी के लिखे लेख को मिटा कर भाग्य की रेखा बदल सकता है।
प्रेषक और रचनाकार
सुलोचना धनावत
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




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