एकांत

एकांत

भूमिका

मानव जीवन के विस्तृत आकाश में यदि कोई एक भाव ऐसा है जो सबसे अधिक निजी, सबसे अधिक सच्चा और सबसे अधिक गूढ़ है, तो वह है—एकांत। यह केवल अकेले होने की स्थिति नहीं, बल्कि अपने भीतर उतरने की वह यात्रा है जहाँ व्यक्ति स्वयं से साक्षात्कार करता है। प्रमिला त्रिवेदी जी की यह काव्य रचना “एकांत” इसी आंतरिक यात्रा का अत्यंत संवेदनशील और मार्मिक चित्रण है।

कवयित्री ने जीवन की “सूनी राहों” और “अनजाने खयालों” के माध्यम से उस मानसिक स्थिति को उकेरा है, जहाँ बाहर का कोलाहल थम जाता है और भीतर का मौन मुखर हो उठता है। यहाँ एकांत भयावह नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का एक मधुर अवसर बनकर सामने आता है। “मेरे हिस्से का एकांत” — यह पंक्ति विशेष रूप से यह संकेत देती है कि हर व्यक्ति का अपना एक निजी संसार होता है, जहाँ उसके अनुभव, उसकी पीड़ाएँ और उसकी स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं।

इस कविता में खोए हुए रिश्तों की कसक है, नाराज़गी के कुछ क्षण हैं, और मन के अनकहे भावों का एक गहरा द्वंद्व भी है। किन्तु इन सबके बीच एक आशा की किरण भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है—“संघर्ष के दिन भी बीतेंगे, जो रूठे हैं वो मानेंगे।” यह विश्वास ही कविता को निराशा से निकालकर सकारात्मकता की ओर ले जाता है।

प्रमिला जी ने “दर्पण के रूठ जाने” और “गीतों के बह जाने” जैसे प्रतीकों के माध्यम से उस संवेदनशीलता को अभिव्यक्त किया है, जहाँ व्यक्ति स्वयं से भी दूर हो जाता है। परंतु इसी अवस्था में एकांत एक मरहम की तरह कार्य करता है—एक ऐसा चंदन, जो मन के ताप को शांत करता है।

भाषा की सरलता, भावों की गहराई और प्रतीकों की सजीवता इस रचना को विशेष बनाती है। यह कविता पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए आमंत्रित करती है। यह हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम वास्तव में अपने एकांत को समझते हैं, या उससे भागते हैं?

अंततः, “एकांत” केवल एक कविता नहीं, बल्कि आत्मसंवाद की एक प्रक्रिया है—एक ऐसा दर्पण, जिसमें झाँककर हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकते हैं। प्रमिला त्रिवेदी जी की यह रचना न केवल हृदय को स्पर्श करती है, बल्कि मन के भीतर एक गहरी शांति और आत्मबोध का संचार भी करती है।

कविता

।।एकांत।।

जीवन की सूनी राहो में

जाने अंजाने खयालो में

कुछ शोर नही है शांत है ये,

मेरे हिस्से का एकांत है ये,

खोये रिश्तों का बंधन है,

कुछ और नही ये चंदन है,

कुछ नाराज़गी के पल है,

थोड़ा गुस्सा थोड़ी अनबन है,

कुछ और भी बाते मन में है,

कहने से फिर क्यों डरते है,

संघर्ष के दिन भी बीतेंगे, 

जो रुठें है वो मानेगें, 


कुछ शोर नही अब शांत है,

मेरे हिस्से का एकांत है

रुठा मुझसे मेरा दर्पण, 

भाव भी अब कुछ आते नही,

गीत बह गये झरने जैसे,,

बहती सरिता का आलम है

कुछ शोर नही है अब शांत है,

मेरे हिस्से का एकांत है ,,,,,

रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी

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