कभी-कभी…

 कभी-कभी…

वक्त की बारिश में भीगी-भीगी ज़िंदगी की शाखों से रिसकर जब कुछ पल टपकते हैं, तो कई यादें उग आती हैं ख्यालों की ज़मीन पर। बिना आवाज़, बिना दस्तक, खामोशी से किसी की याद दिल में उतरकर बारिश की तरह बरसने लगती है, और दिल के पास, कमबख्त, न ही रेनकोट होता है, न ही छतरी।

राजीव चाय की चुस्कियाँ लेते-लेते यादों की बारिश में भीग रहा था। पर वह इसमें अकेला नहीं था—उसके साथ थी उसकी मैडम।

अपने ट्रेनिंग पीरियड के दौरान बेंगलुरु में पहली बार वहीं मिला था उनसे। जिस पेइंग-गेस्ट में वह रहता था, वहाँ और भी कई लड़के थे। उन्होंने ही बताया था,

“मैडम से ज़रा संभलकर रहना। टाइम से उठ जाना, टाइम से खाना, टाइम से सोना…”

इन सारी हिदायतों के साथ एक हिदायत और थी—

“उनसे ज़्यादा बात मत करना। बहुत रिज़र्व हैं, और अकड़ू भी।”

मैंने पूछा,

“रिज़र्व हैं इसलिए अकड़ू हैं या…?”

उन्होंने कहा,

“अकड़ू हैं, इसलिए रिज़र्व हैं।”

बात खत्म हो गई।

एक दिन सारे दोस्त बाहर गए हुए थे और मैं बीमार हो गया। तेज बुखार की वजह से न ही खाना खाया, न ही बाहर निकला। दवा लेने की भी हिम्मत नहीं थी। घर की याद करते-करते एक आँसू आँखों से टपक पड़ा।

इतने में… ठक-ठक…

“क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?”

देखा तो मैडम खड़ी थीं। जैसे ही मैं उठने की कोशिश करने लगा, वे बोलीं,

“अरे नहीं, लेटे रहो।”

अंदर आकर पूछा,

“कब से बीमार हो?”

“आज सुबह से ही।”

“तो बताया क्यों नहीं?”

कहते-कहते वे इधर-उधर देखने लगीं। शायद थर्मामीटर ढूँढ़ रही थीं, पर वह था नहीं। उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा—माथा तप रहा था। उनकी आँखों में चिंता उभर आई।

उन्होंने एक कॉल किया। थोड़ी ही देर में एक आदमी फल, चाय-बिस्किट, थर्मामीटर और दवा लेकर हाज़िर था।

“लो, चाय पी लो।”

मैंने कहा,

“मन नहीं है।”

वे बोलीं,

“पर ज़रूरत है।”

और मुझे अपने हाथों से बिस्किट खिलाने लगीं।

मैं सब कुछ चुपचाप करता जा रहा था, यह सोचते हुए—कितनी अच्छी ‘अकड़ू’ हैं।

बाद में दवा देते हुए बोलीं,

“आगे से ऐसा कभी मत करना। मैं फिर आऊँगी।”

और चली गईं।

तो यह थी मेरी पहली मुलाकात मैडम से। उसके बाद जब तक मैं ठीक नहीं हुआ, वह लगातार फोन के माध्यम से मेरा हाल-चाल पूछती रहीं। एक अंजाना-सा रिश्ता हम दोनों के बीच जैसे कायम हो गया।

अब रोज़ सुबह फोन की घंटी बजती, और उधर से मैडम की आवाज़—

“गुड मॉर्निंग! कैसे हो? सब ठीक? नींद आई? कुछ नया?”

यह उनके फिक्स सवाल थे, और मेरा फिक्स जवाब—

“जी, सब ठीक।”

दिन यूँ ही गुजरते गए, और हमारी नज़दीकियाँ भी बढ़ती गईं। बातचीत का दायरा बढ़ गया। वह हर बात मुझे अपने नज़रिए से समझाने लगीं, और ताज्जुब की बात—उनका नज़रिया मुझे भाने लगा।

मैं उनकी नज़रों से दुनिया देखने लगा। वह कब मेरी ज़रूरत बन गईं, पता ही नहीं चला।

कभी-कभी सोचता—क्या वह भी मेरे बारे में ऐसा ही महसूस करती होंगी?

पर नहीं… वे मुझसे बड़ी हैं।

बस, यहीं आकर सोच रुक जाती।

लेकिन बातें हमारी दिन-रात होती रहीं। हम अपनी हर खुशी और दुख साझा करने लगे। वह मुझे कभी “गुड बॉय”, कभी “बुद्धू” कहतीं—और मुझे यह बहुत अच्छा लगता।

वह अपने परिवार से दूर बेंगलुरु में पेइंग-गेस्ट चला रही थीं, और मैं कब उन्हें अपनी ज़िंदगी में ‘अपना’ समझ बैठा—पता ही नहीं चला।

हर पल अजीब-सी बेचैनी, दिल में उनका ख्याल… रातें उनके ख्वाबों में गुजरतीं, और सुबह उनकी आवाज़ से शुरू होती।

वह भीगा पल मुझे आज भी याद है।

मेरे सारे दोस्त दो दिन के लिए बाहर गए थे। बारिश जमकर हो रही थी। मैं कंबल में दुबका, चाय की चुस्की ले ही रहा था कि दस्तक हुई।

“आ जाओ, दरवाज़ा खुला है।”

देखा—सामने मैडम।

“अरे… इतनी सुबह? क्या बात है?”

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। कुर्सी खींचकर बैठ गईं और मेरे हाथ से चाय लेकर पीने लगीं।

एक पल को लगा—जैसे उन्होंने मुझे छू लिया हो।

फिर उनके चेहरे पर नज़र गई—उदासी, दर्द और एक सन्नाटा… उस सन्नाटे में जाने कितनी बातें शोर कर रही थीं।

मैंने पूछा,

“क्या बात है? सब ठीक?”

वे हल्का-सा मुस्कुराईं—

“यह तो मेरा डायलॉग है।”

“हाँ… तो फिर?”

“मैं कल बेंगलुरु से जा रही हूँ… हमेशा के लिए। मेरी सगाई पक्की हो गई है।”

एक ही साँस में सब कह गईं।

मैं खामोश रहा। अंदर जैसे सब कुछ भीग गया।

“बहुत-बहुत बधाई… अब तो कुछ मीठा हो जाए।”

मैंने आँसू छुपाने के लिए आँवला कैंडी का डिब्बा उठा लिया।

उन्होंने मुझे देखा—

“वाकई?”

मैं समझ नहीं पाया—सवाल था या तंज।

वे पास आईं, डिब्बा रख दिया, मेरा हाथ पकड़ा और सामने बैठ गईं।

“यह सिर्फ हम जानते हैं कि हम एक-दूसरे के लिए क्या हैं। कभी-कभी दिल बिना कुछ कहे जब किसी से जुड़ जाता है, तो वह बंधन बहुत गहरा और अमिट होता है।”

“हमारी बातों के बीच जो मौन था न… वहीं हमने सबसे ज़्यादा बातें की हैं। जहाँ शब्द नहीं होते, सिर्फ एहसास होते हैं—वही पल सबसे सच्चे होते हैं।”

मैं बस उन्हें देखता रह गया।

“राजीव… तुम मेरे गुड बॉय हो। यह शादी मैं घरवालों के लिए कर रही हूँ। तुम परिस्थितियों को जानते हो।”

उन्होंने मेरी आँखों में देखा—मैंने नज़रें झुका लीं।

उन्होंने मेरा चेहरा उठाया—

“राजीव, आज का दिन फिर नहीं आएगा। शायद हम फिर कभी न मिलें। पर आज मैं तुमसे एक वादा चाहती हूँ…”

“क्या?”

“तुम अपनी ज़िंदगी में वह सब हासिल करोगे, जो तुम मुझे बताते थे… और मुझे एक इजाज़त दे दो—आज के बाद मैं तुम्हें फोन न करूँ।”

मेरे आँसू बह निकले।

उन्होंने आँसू पोंछे और बोलीं—

“तुम बहुत मासूम हो… हमेशा ऐसे ही रहना। आज तक हम हँसते रहे… पर आज पहली और आख़िरी बार साथ रो रहे हैं।”

वे फूट-फूटकर रो पड़ीं।

मैंने खुद को संभालते हुए कहा—

“मैडम… हमारे अच्छे पलों को आँसुओं में मत बहने दीजिए।”

फिर मोबाइल उठाकर कहा—

“आखिरी बार… अपनी आवाज़ में कह दीजिए—गुड मॉर्निंग… कैसे हो… सब ठीक… नींद आई… कुछ नया… और अपने गुड बॉय को गुड बाय कह दीजिए।”

उनकी सिसकियाँ और तेज़ हो गईं।

उन्होंने मेरे माथे को चूमा और कहा—

“पता है… मछलियाँ पानी से अलग होकर क्यों मर जाती हैं? क्योंकि किसी का साथ पहले आदत, फिर ज़रूरत और फिर ज़िंदगी बन जाता है… अपना ख्याल रखना।”

और वे चली गईं।

सच ही कहा था उन्होंने—

किसी का साथ पहले आदत, फिर ज़रूरत, और फिर ज़िंदगी बन जाता है।

लेकिन… यह ज़रूरी तो नहीं कि जो ज़िंदगी में नहीं रह सके, वह दिल में भी न रहें।

हमेशा रोशन रखेंगे तेरी चाहत के दिए हम,

क्या पता किस मोड़ पर, किस पल तेरा आना हो जाए…

रचनाकार

 
विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग)
हैदराबाद (तेलंगाना)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 








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