कार से उतरा चाँद

कार से उतरा चाँद

क्यों पढ़ें? 

एक ऐसा शीर्षक, जो जिज्ञासा को जन्म देता है—क्या सच में चाँद आसमान से उतरकर ज़मीन पर आ सकता है? या यह किसी अधूरी चाह, टूटे मन और समाज की कठोर सच्चाइयों के बीच जन्मी उम्मीद की कहानी है? यह कथा केवल एक स्त्री की पीड़ा नहीं, बल्कि उसके आत्मसम्मान, मातृत्व की तड़प और रिश्तों की पुनर्परिभाषा की मार्मिक यात्रा है, जो अंततः यह प्रश्न छोड़ जाती है—क्या मातृत्व सिर्फ जन्म देने से ही सिद्ध होता है?

कहानी 

शाम का धुंधलका है या उदास ममता है,
भूली-बिसरी यादों से फूटती हुई दुआ देखूँ।

"सरला... चलो, जल्दी से तैयार हो जाओ," माँजी बाहर से कहे जा रही थीं। पर मेरा मन बिल्कुल भी नहीं था। इसलिए मैं सुनकर भी अनसुना कर रही थी। अनमनी और अनियंत्रित भावनाओं को रोकने के लिए अपने आप से काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है, बावजूद इसके वे थमती नहीं।

                काल्पनिक और सांकेतिक चित्र गूगल से साभार

सरला एक सुलझी और समझदार लड़की थी। उस पर उसकी खूबसूरती और सादगी से भरी बातें किसी का भी दिल जीत लेती थीं। हर कोई उससे बात करना चाहता था, फिर भी आज वह खुद से रूठी हुई थी।
"मैं क्यों रूठी हूँ अपने आप से?" यह सवाल वह कई बार अपने आप से कर चुकी थी, पर जवाब में बस छलकते हुए आँसू और खामोशी ही मिलती।

मुझे याद आया, जब पिछली बार मैं प्रतिभा की गोद-भराई के फंक्शन में गई थी। तब कितने चाव से तैयार होकर और आगे बढ़-बढ़कर काम कर रही थी। तभी मेरे पाँव में मानो ब्रेक सा लग गया, जब मैंने किसी को यह कहते सुना—
"पाँच साल होने को आए शादी को... अभी तक गोद खाली है।"

सुनकर मुझे बेहद खराब लगा, पर मैंने जाहिर नहीं होने दिया। मैं उसी तरह प्रतिभा के साथ हँसती रही।

माँजी के बार-बार कहने पर मैं पड़ोस में जाने के लिए तैयार हो गई। जब प्रतिभा की गोद में नन्हा-मुन्ना आया, तो सबसे ज्यादा खुश भी मैं ही थी। मेरी सहेली अब माँ बन चुकी थी, और मैं मासी।

दो दिन बाद, जब प्रतिभा अस्पताल से आई, तो मैं दौड़ते हुए उसके घर जा पहुँची। मैंने तो अपनी तरफ से बच्चे का नाम भी सोच लिया था—"चाँद"... हाँ, उसे मैं चाँद ही कहूँगी। मैं बार-बार गुनगुना रही थी—
"तू मेरा चाँद, मैं तेरी चाँदनी..."

जैसे ही मैं वहाँ पहुँची, प्रतिभा की सास ने मुझे रोक दिया—
"कहाँ जा रही हो? रुको... अभी तो आए हैं बच्चे को लेकर।"
"पर... काकी, मुझे मिलना है," मैंने कहा।

उन्होंने मुझे घूरकर देखा, तो मैं सकपका गई। मैं वहीं सोफे पर बैठ गई। हर दो मिनट में मेरी निगाह प्रतिभा के कमरे की तरफ उठ रही थी। तभी उसकी भाभी ने मुझे इशारा किया और हम दोनों कमरे की ओर बढ़ चले।

जैसे ही मैंने नन्हे को देखा, मेरी ममता उमड़ आई। मैंने "मेरे चाँद" कहकर उसे सीने से लगा लिया। इतने में ही उसकी सास आईं और मेरे हाथ से बच्चे को लेकर बोलीं—
"बस! अब सब बाहर बैठो।"

मैं मायूसी भरी आँखों के साथ बाहर आ गई। तभी मैंने जो सुना, उससे मुझे गहरा धक्का पहुँचा।
प्रतिभा की सास, उसकी भाभी को डाँट रही थीं—
"तुझे जरा भी अक्ल नहीं है, जो उसकी गोद में बच्चा दे दिया! जानती नहीं, वह बाँझ है!"

"बाँझ"... यह शब्द मेरे दिल में तीर की तरह चुभ गया। मैं रोती हुई अपने घर चली आई।

शाम को सुधांशु ने मेरा चेहरा देखकर पूछा, तो मैंने "कुछ नहीं" कहकर करवट बदल ली। पर नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी।

"बाँझ... और मैं?"
मेरा अतीत मेरे सामने आ खड़ा हुआ, जहाँ मेरी एक गलती ने मुझे घरवालों की नजरों से गिरा दिया था। प्यार करना गुनाह था—और यह मुझसे हुआ। प्यार में दो लोग मिलते हैं, जुड़ते हैं, और कभी-कभी अंतरंग पलों में कमजोर भी पड़ जाते हैं... जिसका खामियाजा सिर्फ लड़की को ही भुगतना पड़ता है।

भगवान ने लड़की को बनाते वक्त उसकी रचना ही ऐसी की है कि वह अपनी भूल चाहकर भी छुपा नहीं सकती। मेरी एक गलती ने मेरा और मेरे परिवार का सिर झुका दिया। कसूरवार तो थी ही मैं। खामोशी से घरवालों ने जो कहा, वह सब मैंने मान लिया। फिर कभी पलटकर उस रास्ते नहीं गई। बहुत बड़ी कीमत चुकाई थी मैंने उन लम्हों की।

शादी के बाद मैंने अपना हर फर्ज ईमानदारी और समर्पण से निभाया। सुधांशु और उसके घरवालों ने हमेशा मुझे पलकों पर बैठाकर रखा। धीरे-धीरे मैं सब कुछ भूल गई थी, पर आज अचानक जैसे शांत झील में किसी ने कंकर मार दिया हो—सब कुछ फिर से उभर आया।

रोते-रोते ना जाने कब मेरी आँख लग गई।

सुबह जब मैं उठने लगी, तो उठ ही नहीं पाई। सुधांशु ने कहा—
"लेटी रहो, तुम्हें तेज बुखार है। सारी रात तुम कुछ बुदबुदा रही थीं।"
मैंने डरते हुए पूछा—"क्या?"
वह बोला—"मैं समझ नहीं पाया।"

मैंने राहत की साँस ली। उसने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
"मैं तुम्हारे लिए नाश्ता लाता हूँ। थोड़ा खाकर दवा ले लो, अच्छा महसूस करोगी।"
मैंने मासूमियत से सिर हिला दिया।

इस बात को आज एक महीना हो गया था। मेरी तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। सुधांशु और माँजी बहुत चिंतित थे। मैं शून्य में ताकती रहती। सुधांशु पहले से भी ज्यादा मेरा ध्यान रखने लगा। माँजी भी हर पल मेरे पास बैठकर भगवान का जाप करतीं और पंचामृत पिलातीं।

आज सुधांशु ने कहा—
"मैं दो दिन के लिए ऑफिस के काम से बाहर जा रहा हूँ। माँजी अकेली हैं, तुम ध्यान रखोगी ना?"
मैंने फिर सिर हिला दिया।

तीसरे दिन मैं बालकनी में बैठी थी। माँजी मेरे बालों में कंघी कर रही थीं। तभी एक कार आकर रुकी। उसमें से सुधांशु उतरा, और उसके पीछे-पीछे एक छह साल का सुंदर बच्चा।

मेरे मन में अजीब-सी हलचल होने लगी। सुधांशु उसे लेकर मेरे पास आया और बोला—
"देखो... हमारा चाँद... कितना प्यारा है।"

माँजी आरती की थाली लेकर आईं और बच्चे का तिलक कर आरती उतारने लगीं। मैं खामोशी से सब देखती रही।

तभी वह बच्चा मेरे पास आकर बोला—
"माँ..."

यह शब्द सुनते ही मैं फूट-फूटकर रो पड़ी। मैंने उसे सीने से लगा लिया—
"चाँद... मेरे चाँद..."

माँजी और सुधांशु भी अपने आँसू पोंछने लगे।

अब मैं लोगों की नजर में बाँझ नहीं थी।
मैं आधुनिक युग की वह कुंती थी, जिसे उसका कर्ण मिल गया था।

नई सुबह की नई किरणें रोशन हो गईं मन-आँगन में,
होठों पर मुस्कान बन कलियाँ खिल गईं जीवन के मधुबन में।
खुशियों के फूल महक उठे दिल के इस उपवन में,
नए पलों की नई महक महसूस हुई सूने जीवन में।

— विजया डालमिया, संपादक ‘मेरी निहारिका’

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