गर्मी की भोर - सुनिता मीणा
गर्मी की भोर
एक गाँव में दो सहेलियाँ रहती थीं—रूमाली और शेफाली। दोनों के घर पास-पास ही थे। गर्मी के दिन थे। गाँव में गर्मी की छुट्टियाँ आने पर बाहर घूमने और खेलने का सबसे अच्छा अवसर रहता था। दोनों सहेलियाँ दिनभर चंगा-पो, पाँच कंकर, गुड्डा-गुड़िया और न जाने कितने खेल खेलती थीं।
एक दिन दोनों ने कुछ नया खेल खेलने की सोची। पुराने खेलों से वे ऊब चुकी थीं। अगली सुबह दोनों उठीं और घरवालों को बिना बताए घर से निकल गईं। घर से थोड़ी दूर एक बहुत बड़ा बाड़ा था, जहाँ बहुत सारे देसी बबूल के पेड़ थे। शेफाली को बबूल का गोंद बहुत पसंद था, तो रूमाली को उसके पातड़े। फिर क्या था! दोनों को अपनी-अपनी पसंद की चीज़ मिल गई। रूमाली पातड़े एकत्रित करने लगी और शेफाली बबूल के पेड़ पर चढ़कर गोंद खाने लगी।
चैट जीपीटी द्वारा निर्मित सांकेतिक चित्रऐसा करते-करते काफी समय बीत गया। अब दोनों को प्यास भी लगने लगी थी। उन्होंने घर जाने का निश्चय किया। रूमाली ने शेफाली को आवाज़ लगाई, जो अभी तक बबूल के पेड़ पर चढ़ी हुई थी। जैसे ही उसने रूमाली की आवाज़ सुनी, हड़बड़ाहट में उसका पैर फिसल गया और वह बबूल के पेड़ से घिसटते हुए नीचे जमीन पर आ गिरी। उसके हाथ-पैर छिल गए और खून भी निकल आया।
अब क्या था! दोनों डर गईं और रोने लगीं। भयभीत होकर वे धीरे-धीरे घर आईं और चुपचाप अंदर जाकर बैठ गईं। डर के कारण उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया। जब शेफाली की माँ ने उसे खाना खाने के लिए आवाज़ लगाई, तो वह बाहर नहीं आई। उसकी माँ को कुछ अंदेशा हुआ। वे अंदर गईं और देखा कि उसके हाथ-पैर में चोट लगी है। पहले तो माँ ने उसे खूब डाँटा, फिर मलहम लगाकर पट्टी बाँधी।
शेफाली को वह गर्मी की भोर सदैव याद रहेगी।
सृजक
सुनिता मीणा
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन लेडीज विंग
सवाई माधोपुर (राजस्थान)
प्रस्तुति








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