माड़साब और टीवी

माड़साब और टीवी

बहुत समय पहले की बात है। यह कहानी एक छोटे से गाँव आदिलपुर की है। उस गाँव में एक छोटा-सा सरकारी विद्यालय था, जहाँ बच्चे शिक्षा प्राप्त करने जाते थे। उसी विद्यालय में सुधा नाम की एक लड़की पढ़ती थी। सुधा बहुत होनहार और समझदार बच्ची थी।

विद्यालय में अधिकांश शिक्षक नज़दीकी कस्बे भवानीपुर से पढ़ाने आते थे। वे पूरी ईमानदारी और लगन से बच्चों को शिक्षा देते थे। सभी शिक्षकों को सुधा की मेहनत और प्रतिभा पर गर्व था। वह पढ़ाई, खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों सहित हर गतिविधि में अव्वल रहती थी।

कक्षा 8 की बोर्ड परीक्षाएँ नज़दीक आ रही थीं। सभी शिक्षक अपने-अपने विषयों की कठिन मेहनत से बच्चों को तैयारी करवा रहे थे। इसी दौरान गणित के शिक्षक सत्यनारायण जी ने गौर किया कि सुधा का पढ़ाई में स्तर पहले की तुलना में गिर रहा है। वह किसी भी प्रश्न का सही उत्तर नहीं दे पा रही थी।

एक दिन एक घटना घटी। गणित के गुरुजी बिना किसी पूर्व सूचना के सुधा के घर पहुँच गए। जैसे ही सुधा ने अपने माड़साब को देखा, वह वहाँ से भाग गई और नज़रों से ओझल हो गई।

माड़साब ने उसके पिताजी से सुधा की पढ़ाई के स्तर के बारे में चर्चा की और उसकी गिरती पढ़ाई की चिंता भी व्यक्त की। फिर उन्होंने पूछा, “सुधा किस कमरे में पढ़ती है? मुझे वह कमरा दिखाइए।”

पिताजी उन्हें वह कमरा दिखाने ले गए। कमरे का मुआयना करते ही माड़साब को समस्या की जड़ समझ में आ गई। उस कमरे में टीवी लगा हुआ था। उन्होंने सुधा के पिताजी से कहकर टीवी हटवाकर टाँड़ पर रखवा दिया और वापस चले गए।

माड़साब ने सुधा की कमजोरी को समझकर उसे दूर करने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप, सुधा ने मन लगाकर पढ़ाई की और उनकी प्रेरणा व मार्गदर्शन की बदौलत कक्षा 8 में प्रथम स्थान प्राप्त किया।



रचयिता 

सुनिता मीना

स्थानीय सम्पादिका

उलझन सुलझन लेडीज विंग

सवाई माधोपुर (राजस्थान)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 




 
प्रशस्ति



Comments

Popular posts from this blog

निर्णय का निर्वाण (लघुकथा)

बाला और कचनार - सुनिता मीणा

एक घटना, दो पहलू