दीवार के उस पार

 कहानी

"दीवार के उस पार"

गाँव के अंतिम छोर पर एक पुराना अखाड़ा था, जहाँ वर्षों से पहलवानों की पीढ़ियाँ कुश्ती सीखती रही थीं। उस अखाड़े में एक साधारण लेकिन ज़िद्दी लड़का रोज़ आता — नाम था वीर।

वीर न तो बहुत बलवान था, न ही चालाक। लेकिन उसके भीतर एक आग थी — खुद को साबित करने की। हर बार अखाड़े में उतरता और हर बार हार जाता और लोग हँसते। 

साथी पहलवान ताने कसते- "तेरे बस की बात नहीं वीर!"

"छोड़ दे अखाड़ा, दूसरों की ताकत देख!"

कभी-कभी तो उसे ये भी सुनना पड़ता -

"तू तो बस सामने वाले की थकावट का इंतज़ार करता है-  खुद से कुछ नहीं करता!"

एक दिन...एक संन्यासी आचार्य निखिल जी महाराज अखाड़े के बाहर बैठे थे। वो गाँव में प्रवचन के लिए आए थे। वीर ने झिझकते हुए प्रणाम किया और पूछा- "गुरुदेव, क्या जीत का रास्ता दूसरों की गलती से भी बनता है?"

आचार्य जी मुस्कराए। आँखें जैसे वीर के मन की तहों में उतर गईं।

"अपनी ताकत से लड़ना सीखिए, न कि दूसरों की कमजोरी से,क्योंकि सफलता अपने प्रयास से मिलती है —दूसरों की विफलता से नहीं।"

यह कहकर वे उठे और अखाड़े की दीवार की ओर इशारा किया।

"उस दीवार को देखो- कितनी ऊँची है?"

वीर बोला, "कम से कम आठ फीट..."

आचार्य जी बोले,

"अब मान लो — तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं-

एक, उस दीवार पर चढ़ो अपनी मेहनत से; दूसरा, उस पार वाला खुद नीचे गिर जाए और तुम खुद को ऊपर समझो…बताओ, कौन-सी ऊँचाई तुम्हारी होगी?"

वीर चुप।

उस दिन के बाद वीर ने अभ्यास बदल दिया।

अब वह दूसरों की हार की प्रतीक्षा नहीं करता,

बल्कि अपनी कमर की पकड़, साँसों की लय, और मन की स्थिति को सुधारने लगा।

धीरे-धीरे उसकी हार कम होने लगी - क्योंकि अब वह दूसरों को नहीं, खुद को मात देने लगा था।

गाँव की सालाना कुश्ती प्रतियोगिता थी। सामने था रघु पहलवान -जो अब तक अजेय था। वीर ने कोई चाल नहीं चली, न ही रघु की थकावट का इंतज़ार किया। वह अपनी पूर्ण तैयारी, संतुलन और संयम के साथ लड़ा और वही हुआ जिसका सबको इंतज़ार था । वीर ने रघु को चित्त कर दिया।

लोग बधाई देने आए। किसी ने कहा –“वाह! अच्छा हुआ रघु का पैर फिसल गया।”

वीर मुस्कराया और बोला —

“नहीं…रघु फिसला नहीं,

मैं आज खुद के भीतर की कमजोरी से जीत गया।”

उस दिन वीर ने सिर्फ एक कुश्ती नहीं जीती थी —

उसने साबित कर दिया कि सच्चा विजेता वह है

जो दूसरों की हार पर नहीं,

अपने आत्मबल पर खड़ा होता है।

आचार्य निखिल जी का वह वाक्य अब गाँव की दीवार पर अंकित था - "अपनी ताकत से लड़ना सीखिए, न कि दूसरों की कमजोरी से।"

रचनाकार

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






Comments

Popular posts from this blog

निर्णय का निर्वाण (लघुकथा)

बाला और कचनार - सुनिता मीणा

एक घटना, दो पहलू