सुमन की सुगंध - विजया डालमिया

 सुमन की सुगंध

लेखिका : विजया डालमिया 

(संपादक, मेरी निहारिका और राष्ट्रीय संयोजिका, उलझन सुलझन महिला लेखिका प्रकोष्ठ, हैदराबाद)।

भाग 1

“दी… कहाँ हो आप?” कहते हुए प्राची उसके सामने आ खड़ी हुई। आज प्राची की आँखों में खुशी की एक अलग ही चमक थी। वह शायद भागती हुई आई थी, इसलिए हाँफ रही थी।

मैंने उससे कहा,
“अरे… रे… क्या हुआ? क्यों एरोप्लेन बनी हुई है?”

वह उत्साह से बोली,
“सच दी, आज तो मैं वाकई एरोप्लेन बनकर आसमान में उड़ जाना चाहती हूँ।”

“क्यों?” मैंने मुस्कुराते हुए पूछा।

“सोचो… सोचो…” उसने आँखें मटकाते हुए कहा।

मैंने हल्की शरारत से कहा,
“तेरे देव भैया का लेटर आया है?”

“अरे हाँ! पर आपको पता है, देव भैया आ रहे हैं!”

“अच्छा?” मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा। फिर उसे पानी का गिलास पकड़ाते हुए अपनी बढ़ी हुई धड़कनों पर काबू करते हुए पूछा,
“कब?”

“कल! दी, मुझे बहुत तैयारी करनी है,” कहकर प्राची फुर्र से चली गई, पर मेरे दिल में एक अनजानी बेचैनी जगा गई।

देव…
जिसे मैं प्राची की नजरों से इतना जान चुकी थी कि वह मेरे लिए अजनबी रह ही नहीं गया था।

साल भर पहले ही मैंने प्राची के घर में किराएदार के रूप में रहना शुरू किया था। प्राची की पूरी फैमिली बहुत अच्छी थी। अंकल, आंटी और प्राची ने कभी मुझे अकेलापन महसूस नहीं होने दिया। जल्दी ही प्राची मुझे अपनी बड़ी बहन की तरह मानने लगी।

उसकी हर बात उसके देव भैया से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होती। साल भर में एक भी दिन ऐसा नहीं गया, जब प्राची ने मुझे अपने देव भैया के कारनामे न बताए हों। हर वक्त उनके बारे में सुनते-सुनते वह शख्स मेरे लिए भी खास… बेहद खास बन गया था।

यह बात मैं आज समझ पाई, जब उसने उनके आने का जिक्र किया और मेरा दिल अनायास ही धड़क उठा।

देव बाहर नौकरी करते थे और छुट्टी न मिलने की वजह से इतने लंबे समय बाद घर आ रहे थे।

अब मेरा किसी भी बात में मन नहीं लग रहा था। उस अनदेखे शख्स को देखने और पहली बार मिलने की ख्वाहिश मेरे दिल को बेचैन कर रही थी।

“देव भैया ऐसे हैं…”
“देव भैया वैसे हैं…”

न जाने कैसे होंगे प्राची के देव भैया?

किसी अनजाने के लिए इतना सोचना… क्या मैं उन्हें पसंद करने लगी हूँ?

मैंने आईने के सामने खड़े होकर खुद से पूछा।

जवाब में मुझे अपना ही चेहरा अपरिचित लगा।

अगले दिन सुबह मैं ऑफिस नहीं गई। बालकनी में जाकर बार-बार झाँकती, पर कोई नजर नहीं आया। मेरी बेचैनी बढ़ती चली गई।

मैंने खुद को समझाया—
“शायद घर में सब मिलने में व्यस्त होंगे…”

पर प्राची भी अभी तक मेरे पास क्यों नहीं आई?

दोपहर हुई… फिर शाम होने लगी। मेरे मन की बेचैनी, शाम के सन्नाटे की तरह, और गहरी होती चली गई।

मैं नीचे उतरी। नीचे भी गहरा सन्नाटा था और साथ ही अँधेरा भी। मैंने आँगन की लाइट जला दी।

आज पहली बार मैं इतनी बेचैन हो रही थी।

आख़िर क्या है यह?

जिसे कभी देखा नहीं… कभी सुना नहीं… उसे लेकर इतनी बेसब्री क्यों?

हर आहट पर लगता—शायद प्राची है…

पर हर बार निराशा हाथ लगती।

अचानक डोरबेल बजी।

मैं जल्दी से दरवाजे तक पहुँची और गेट खोला।

सामने एक नया चेहरा था… पर अनजान नहीं।

ऐसा लगा, जैसे इन्हें तो मैं जन्मों से जानती हूँ।

अचानक मेरे मुँह से निकल पड़ा—
“आइए… देव बाबू!”

इतना सुनते ही उनके पीछे छिपी प्राची भी सामने आ गई और हँसते हुए बोली,
“वाह दीदी! आपने तो भैया का ऐसे वेलकम किया, जैसे वर्षों से जानती हों!”

मैंने सहजता से कहा,
“अरे, तू ही तो रोज इनकी बातें करती थी। फिर कैसे न पहचानती?”

भाग 2 

मैंने आग्रह करके उन्हें अंदर बुलाया। वह पल मैं आज तक नहीं भूल पाई। ऐसा लगा, जैसे मेरा पूरा कमरा किसी अनजानी महक से भर गया हो।

थोड़ी देर बैठने के बाद देव ने मुस्कुराते हुए कहा,
“ये सुमन है या सुगंध?”

“वाह भैया!” प्राची तुरंत बोल पड़ी, “आपको एक साथ सुमन और सुगंध का एहसास! आप तो कॉन्वेंट के स्टूडेंट रहे हैं, आज पहली बार हिंदी की इतनी अच्छी व्याख्या कर रहे हैं।”

इतना कहकर प्राची जोर से हँस पड़ी और मेरा चेहरा हल्का गुलाबी हो गया।

मैंने बात सँभालते हुए पूछा,
“चाय लेंगे या कुछ और?”

देव ने सहज स्वर में कहा,
“अभी कुछ नहीं… फिर मिलते हैं।”

इतना कहकर देव और प्राची दोनों कमरे से बाहर निकल गए।

यह पहला मौका था, जब मेरा दिल मेरे पास नहीं था।

पूरी रात मैं देव बाबू के बारे में सोचती रही। शायद… मुझे उनसे प्यार हो गया था। मगर मैं यह बात कह नहीं सकती थी।

अगले दिन रविवार था। मैं बार-बार किसी न किसी बहाने बाहर निकलती, शायद वे कहीं दिख जाएँ।

करीब ग्यारह बजे मैंने बहाने से प्राची को आवाज लगाई—
“प्राची!”

“आई दीदी…” कहती हुई वह पलक झपकते ही मेरे सामने आ गई।

मैंने कहा,
“आज मैंने डोसा बनाया है। साथ बैठकर नाश्ता करते हैं।”

“अरे वाह दीदी! डोसा तो देव भैया को भी बेहद पसंद है!”

मैंने तुरंत कहा,
“तो फिर उन्हें भी बुला लो।”

मैंने जिस अधिकार से यह बात कही, उसे सुनकर प्राची मुस्कुरा दी।

प्राची के बुलाने पर देव बाबू भी आ गए और मैंने तीनों की प्लेट लगा दी।

मेरी निगाहें तो बस देव बाबू पर ही टिकी थीं।

देव बाबू ने मेरी ओर देखकर कहा,
“आप भी लीजिए।”

“हाँ… हाँ…” कहते हुए मैंने डोसे का एक टुकड़ा तोड़कर मुँह में रखा, लेकिन अचानक मुझे जोर का ठसका लग गया।

देव बाबू ने तुरंत अपनी ओर रखा पानी का गिलास मेरी तरफ बढ़ा दिया।

जल्दबाजी में वे भूल गए कि वह उनका पिया हुआ गिलास था, पर मैंने बिना सोचे उसी गिलास को अपने होठों से लगाकर पानी पी लिया।

यह था देव बाबू का पहला स्पर्श…

थोड़ी देर बाद प्राची ने उत्साह से कहा,
“आज हम लोग शाम को मूवी देखने जाएँगे!”

मेरे मना करने पर देव बाबू बोले,
“चलिए न… एक सप्ताह बाद मुझे भी लौटना ही है।”

“ठीक है…” मैंने धीमे स्वर में सहमति दे दी।

शाम को हम थिएटर पहुँचे। फिल्म अपने क्लाइमैक्स की ओर बढ़ रही थी कि तभी पर्दे पर एक गीत बजने लगा—

“आओ मिल जाएँ हम,
सुमन और सुगंध की तरह…”

गीत के बोल सुनकर मैंने कनखियों से देव बाबू को देखा…

पर वे भी मुझे ही देख रहे थे।

मैं झेंप गई।

फिल्म खत्म होने के बाद हम घर लौट आए।

शायद देव बाबू आज कुछ कहना चाहते थे। वे थोड़ी देर मेरे कमरे के बाहर रुके भी, पर बिना कुछ कहे वापस चले गए।

कुछ देर बाद मेरे व्हाट्सऐप पर एक संदेश आया—

“तुम्हारी आँखें बेहद खूबसूरत हैं… एकदम कमलनयन।”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

लेकिन मेरी नींद उड़ चुकी थी।

रात-रात भर मैं व्हाट्सऐप देखती रहती, शायद देव बाबू ऑनलाइन दिख जाएँ।

भाग 3 

सुमन की सुगंध

लेखिका : विजया डालमिया (संपादक, मेरी निहारिका)

संपादित एवं विराम-चिह्न सहित संस्करण

भाग – 3

जाने से एक दिन पहले देव बाबू मेरे कमरे में आए।

दो मिनट तक खामोशी पसरी रही। जैसे दोनों के पास बहुत कुछ कहने को था, पर शब्द साथ छोड़ रहे थे।

फिर धीमे स्वर में देव बाबू बोले,
“मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ…”

मैं चुप रही।

मेरे होंठ खामोश थे, पर दिल जैसे अनगिनत धड़कनों में अपना उत्तर दे रहा था।

कुछ देर इंतज़ार करने के बाद देव बाबू उठे और लौट गए। जाते-जाते एक छोटी-सी पर्ची मेरे पास छोड़ गए।

उस पर्ची पर लिखा था—

“सुमन की सुगंध हर तरफ फैले, यही मेरी अभिलाषा है।”

उन शब्दों को पढ़ते ही मेरी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। बूंदें धीरे-धीरे धरती पर गिरने लगीं।

शायद विधि को कुछ और ही मंजूर था।

अचानक देव बाबू लौट आए। उन्होंने मुझे बाँहों में भर लिया और धीमे स्वर में कहा—

“तुम मेरी हो… सात जन्मों तक मेरी।”

वह पल मेरे जीवन का सबसे सुंदर क्षण बन गया।

आज सातवाँ दिन था।

उन्हें वापस जाना था… हम सबसे दूर।

वे चले गए।

पर मेरा मन तो उन्हीं के साथ चला गया था।

मेरी साँसें, मेरी धड़कनें… सब जैसे उनके साथ ही चली गई थीं।

पीछे रह गया था तो बस—

एक शरीर… केवल शरीर।

देव बाबू फौज में थे।

एक दिन अचानक घर पर टेलीग्राम आया।

उसे पढ़ते ही घर में कोहराम मच गया।

बाहर भीड़ जमा होने लगी। लोगों के चेहरों पर बेचैनी थी। हर तरफ धीमी-धीमी सुगबुगाहट…

“देव बाबू…”

मैं उस समय ऑफिस में थी।

अचानक प्राची का फोन आया।

फोन उठाते ही उधर से टूटी हुई आवाज आई—

“दीदी… देव भैया…”

और फिर जोर-जोर से रोने की आवाज।

मेरे हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए।

कुछ समझ में नहीं आया।

मैं अपने एक सहकर्मी के साथ तुरंत घर पहुँची।

वहाँ भीड़ देखकर मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया और मैं बेहोश होकर गिर पड़ी।

जब होश आया, तो मैं अस्पताल में थी।

दो दिन बाद…

मेरे सिर पर किसी के कोमल स्पर्श से मेरी आँखें खुलीं।

मैंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं—

सामने देव बाबू खड़े थे।

मैं अवाक रह गई।

मेरे होंठ काँपे—

“देव बाबू… आप ठीक हैं न?”

वे हल्के से मुस्कुराए और बोले—

“अब तुम ठीक होकर घर चलो। सब बेसब्री से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।”

अगले दिन अस्पताल से घर पहुँची तो लगा जैसे पूरा घर किसी अनजानी खुशबू से महक रहा हो।

बाहर शहनाई बज रही थी।

घर में हर तरफ गुलाब ही गुलाब बिखरे थे।

और ग्रामोफोन पर वही गीत बज रहा था—

“आओ मिल जाएँ हम,
सुमन और सुगंध की तरह…”

(समाप्त)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 











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