पाप और पुण्य - सुलोचना धनावत
पाप और पुण्य
भूमिका
मनुष्य जीवन कर्मों की भूमि है। हम जो भी करते हैं—चाहे अच्छा हो या बुरा—उसका प्रभाव कहीं न कहीं हमारे जीवन पर अवश्य पड़ता है। कई बार व्यक्ति उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुँचकर अपने किए गए कर्मों का हिसाब लगाने लगता है और यह सोचता है कि अब कुछ अच्छे कार्य कर लिए जाएँ ताकि जीवन के पापों का बोझ हल्का हो सके। परंतु क्या केवल तीर्थयात्रा कर लेने से मनुष्य के पाप धुल जाते हैं? क्या बाहरी आडंबर ही पुण्य का मार्ग है, या फिर सच्चा पुण्य हमारे व्यवहार, दया, न्याय और संवेदनशीलता में छिपा होता है?
इन्हीं प्रश्नों को सोचने पर विवश करती है यह प्रेरक और विचारोत्तेजक कहानी, जो बताती है कि ईश्वर की दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं होता। मनुष्य भले ही स्वयं को धर्मात्मा सिद्ध करने का प्रयास करे, लेकिन कर्मों का वास्तविक लेखा-जोखा ऊपर वाला ही रखता है।
कहानी
मनीराम बूढ़ा हो चला था। मन ही मन वह अपने किए गए पाप-कर्मों से डरकर कुछ पुण्य कमाने की योजना बनाने लगा। एक दिन उसने तीर्थयात्रा पर जाने का मन बनाया। उसके जाने की बात सुनकर पड़ोस के तीन और लोगों ने भी साथ चलने की सोच बना ली। वे भी स्वभाव और कर्मों में मनीराम जैसे ही थे।
उसी गाँव में एक किसान रहता था, जो पहले भी तीर्थयात्रा कर चुका था। यात्रा का अनुभव होने के कारण उसे भी साथ ले लिया गया। इस प्रकार पाँचों यात्री तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।
यात्रा सुचारु रूप से चल रही थी। अब केवल पाँच-छह घंटे का रास्ता बाकी था कि अचानक काले-काले बादलों ने आकाश को घेर लिया। चारों ओर अंधकार छा गया। कुछ दिखाई देना बंद हो गया। बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट, तीव्र हवाओं और ओलों के साथ मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई।
पाँचों यात्री जान बचाने के लिए पास ही पड़े एक खंडहरनुमा मंदिर में जा घुसे।
थोड़ी देर बाद बिजली का भयंकर शब्द गूँजने लगा। बिजली बार-बार मंदिर से टकराकर निकल जाती। भयभीत होकर वे सोचने लगे कि अवश्य ही हममें से कोई बड़ा पापी है, जिसके कारण यह संकट आया है।
कुछ देर विचार-विमर्श के बाद उनमें से एक बोला—
“यह किसान ही पापी है, इसे यहाँ से हटाना होगा।”
बाकी चारों ने भी उसकी बात का समर्थन कर दिया। उन्होंने किसान को मंदिर से बाहर धकेल दिया और पास के एक गड्ढे में गिरा दिया।
किसान हाथ जोड़कर विनती करता रहा—
“कृपया मुझे भी यहीं रहने दें। आप लोगों के साथ मैं भी बच जाऊँगा।”
लेकिन उन चारों ने उसकी बात अनसुनी कर दी।
तभी अचानक ऐसा लगा मानो आकाश फट पड़ा हो। एक भयंकर गर्जना हुई और बिजली सीधे मंदिर पर आ गिरी। देखते ही देखते मंदिर के टुकड़े-टुकड़े हो गए और वे चारों यात्री वहीं ढेर हो गए।
किसान, जो बाहर गड्ढे में पड़ा था, सुरक्षित बच गया।
सार
मनुष्य अक्सर अपने किए गए बुरे कर्मों का निष्पक्ष आकलन नहीं कर पाता। वह दूसरों को दोषी ठहराने में देर नहीं लगाता, जबकि अपने भीतर झाँकने से बचता है। परंतु ईश्वर के यहाँ हर व्यक्ति के पाप और पुण्य का सटीक लेखा-जोखा सुरक्षित रहता है। सच्चा पुण्य केवल धार्मिक यात्राओं से नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों, करुणा और मानवता से अर्जित होता है।
रचनाकार
सुलोचना धनावत
स्थानीय संपादिका
उलझन सुलझन
नागपुर (महाराष्ट्र)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







Comments
Post a Comment