संघर्ष - सुलोचना धनावत
संघर्ष
भूमिका
जीवन में सफलता, धैर्य और उपयोगिता किसी को सहज रूप से प्राप्त नहीं होती। हर मजबूत व्यक्तित्व के पीछे संघर्ष, अनुशासन और कठिन परिस्थितियों को सहने की कहानी छिपी होती है। जिस प्रकार सोना अग्नि में तपकर कुंदन बनता है, उसी प्रकार मनुष्य भी जीवन की कठिनाइयों से गुजरकर परिपक्व और सक्षम बनता है। प्रस्तुत लघुकथा इसी सत्य को सरल और प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करती है।
लघुकथा
संघर्ष
मिट्टी ने घड़े से पूछा,
“मैं भी मिट्टी हूँ और तू भी मिट्टी। फिर पानी मुझे बहा ले जाता है, जबकि तू पानी को अपने भीतर संभालकर रख लेता है। कई दिनों तक पानी भरा रहने पर भी वह तुझे गला नहीं पाता, ऐसा क्यों?”
घड़ा मुस्कुराकर बोला,
“यह सच है कि मैं भी मिट्टी हूँ और तू भी मिट्टी। परंतु मुझे पहले पानी में भिगोकर रखा गया, फिर पैरों से गूँधा गया। उसके बाद मुझे चाक पर घुमाया गया। इतना ही नहीं, मैंने थापी की चोटें भी सही हैं और अंत में आग में तपाया गया। इन सब कठिन यातनाओं और संघर्षों को सहने के बाद ही मुझमें यह क्षमता आई कि मैं पानी को अपने भीतर संभाल सकूँ। आज मैं गर्मी के दिनों में सबकी प्यास बुझाकर उन्हें ठंडक पहुँचाता हूँ।”
घड़ा आगे बोला,
“यही कारण है कि जो पानी साधारण मिट्टी को गला देता है, वही मेरे संघर्ष को देखकर मुझमें समाया रहता है।”
शिक्षा
जिस प्रकार घड़ा अनेक कठिनाइयों और संघर्षों से गुजरकर उपयोगी बनता है, उसी प्रकार मनुष्य भी परिश्रम, अनुशासन और संघर्ष के माध्यम से जीवन में मजबूत और सफल बनता है। जो व्यक्ति आलस्य त्यागकर अपने कर्मपथ पर निरंतर आगे बढ़ता है, ईश्वर भी उसका साथ देता है।
सृजक
सुलोचना धनावत
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (महिला प्रकोष्ठ)
नागपुर (महाराष्ट्र)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






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