गांव में शादी-ब्याह

गांव में शादी-ब्याह

भूमिका

शादी केवल दो लोगों का मिलन नहीं होती, बल्कि वह संस्कारों, रिश्तों, परंपराओं और अपनत्व का एक जीवंत उत्सव होती है। आज के आधुनिक दौर में, जहां शादियां भव्य सजावट, चमकदार रोशनी, बैंक्वेट हॉल और औपचारिकताओं तक सीमित होती जा रही हैं, वहीं गांव की शादियों में आत्मीयता, सामूहिकता और अपनापन अपनी पूरी गरिमा के साथ दिखाई देता है।

क्या आपने कभी सोचा है कि गांव की शादी आखिर इतनी विशेष क्यों होती है? वहां ऐसा क्या होता है कि बरसों बाद भी उसकी स्मृतियां मन में ताजा बनी रहती हैं? क्या गांव की शादी केवल एक आयोजन होती है, या फिर वह परिवार, समाज और संस्कृति को जोड़ने वाला उत्सव होती है?

प्रस्तुत कहानी “गांव में शादी-ब्याह” केवल एक बालक के अनुभवों का वर्णन नहीं है, बल्कि यह गांव और शहर के जीवन, रिश्तों, संस्कारों तथा भारतीय विवाह परंपराओं का जीवंत चित्रण भी है। शहर की औपचारिक और सीमित शादियों को देखने वाला रोहन पहली बार गांव की शादी में पहुंचता है, जहां उसे रिश्तों की गर्माहट, सामूहिक सहभागिता, लोकगीत, रस्में और आत्मीयता का ऐसा संसार देखने को मिलता है, जो उसके मन पर अमिट छाप छोड़ देता है।

आइए, पढ़ते हैं एक ऐसी कहानी, जो केवल शादी का वर्णन नहीं करती, बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ने का एहसास भी कराती है।

कहानी

गांव में शादी-ब्याह

मेरा नाम रोहन है। मेरे पापा एक कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करते थे। हम लोग हैदराबाद की एक हाई-फाई सोसायटी के फ्लैट में रहते थे।

उस समय मेरी उम्र करीब दस साल रही होगी। मुझे आज भी याद है कि पापा-मम्मी के साथ शादी या किसी फंक्शन में जाना, वहां बहुत सलीके से सबसे मिलना, खाना खाना, शगुन का लिफाफा देना और फिर अपने घर वापस आ जाना।

मैंने कभी पूरी शादी नहीं देखी थी। कभी-कभी हम देर से पहुंचते थे, तो दूल्हा-दुल्हन को वरमाला पहनाते हुए देख लेते थे।

एक दिन पापा ऑफिस से आए। वे बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। उन्होंने मम्मी से उत्साहित होकर कहा,

“अल्का, सुनो! हमारी जो बुआ जी हैं न, वे नागपुर के पास एक छोटे से गांव में रहती हैं। उनकी बेटी की शादी है। उन्होंने हम सबको एक सप्ताह पहले ही बुलाया है।”

मम्मी ने आश्चर्य से पूछा,

“अच्छा! यह तो अच्छी बात है, लेकिन एक सप्ताह हम वहां कैसे रुक सकते हैं? वह भी गांव में! वहां सबके पैर छुओ, घूंघट में रहो—यह सब कैसे करूंगी?”

पापा ने मुस्कुराते हुए कहा,

“कितने साल हो गए गांव गए हुए! बहुत मजा आएगा। इस रोज की भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ दिन छुटकारा मिलेगा। साथ ही उन रिश्तेदारों से भी मिल पाएंगे, जिन्हें कई वर्षों से देखा नहीं है। बस फोन पर ही बात हो जाती है।”

मैंने देखा कि मम्मी को गांव जाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन पापा तो मानो मन ही मन गांव पहुंच चुके थे। वे बहुत खुश थे।

मैंने उत्सुकता से पूछा,

“पापा, क्या गांव में बहुत मजा आता है?”

पापा ने प्यार से कहा,

“हां बेटा, बहुत मजा आता है। मेरा बचपन उसी गांव में बीता है। शायद शुरू में तुम्हें अच्छा न लगे, लेकिन दो दिन वहां रहोगे, तो सब अच्छा लगने लगेगा।”

पापा ने जाने की तैयारी शुरू कर दी। मम्मी भी सामान जुटाने में लग गईं, क्योंकि हमें दो दिन बाद निकलना था। स्कूल से छुट्टी भी स्वीकृत करवा ली गई।

दो दिन बाद सुबह चार बजे ही पापा ने मुझे जगा दिया—

“रोहन, उठो! जल्दी तैयार हो जाओ। हमें निकलना है, नहीं तो ट्रैफिक बहुत हो जाएगा।”

पांच बजे तक हम तैयार होकर नीचे आ गए। पापा ने पार्किंग से गाड़ी निकाली और हम गांव की ओर रवाना हो गए।

नागपुर से आगे एक छोटा-सा गांव था, जहां पापा की बुआ जी रहती थीं।

रास्ते में खेत, खलिहान, पेड़ और संतरे के बगीचे देखते-देखते हम करीब ग्यारह बजे गांव पहुंच गए। गांव पहुंचकर पापा थोड़ी देर रास्ता भूल गए। किसी से पूछने पर हम बुआ जी के घर पहुंचे।

वहां पहुंचते ही हमारा जोरदार स्वागत हुआ। बुआ जी बड़े से आंगन में बाहर आईं और पापा को गले से लगा लिया। हमने उनके पैर छुए। फिर हम खाट पर बैठ गए।

मम्मी अंदर घर में चली गईं। आज पहली बार मैंने मम्मी को घूंघट में देखा था। मैं हंस रहा था और बार-बार उनका घूंघट उठाकर देख रहा था। मम्मी घूंघट के अंदर से आंखें निकालकर मुझे गुस्से से देख रही थीं।

अंदर जाते ही बुआ जी बोलीं,

“ये अपने दामू की बहू है।”

मम्मी सबके पैर छू रही थीं। यह देखकर मैं बाहर आया और पापा से पूछा,

“पापा, आपका नाम दामू है क्या?”

पापा हंसते हुए बोले,

“बेटा, मेरा नाम दामोदर है। गांव में ऐसे ही नाम छोटे करके बुलाते हैं। सब मुझे दामू कहते थे।”

यह सुनकर मैं हंसने लगा।

कुछ देर बाद हमारे लिए नाश्ता आया—गुड़ के सेव, नमकीन मट्ठी, बर्फी, गुलाब जामुन और एक गिलास दूध। पापा ने बड़े मजे से नाश्ता किया। मैंने केवल नमकीन मट्ठी ही खाई।

फिर हम गांव घूमने निकल पड़े। गांव में हर आदमी पापा को जानता था। सब उनसे “राम-राम” करते, हालचाल पूछते और फिर पापा आगे बढ़ जाते।

मैं सोच रहा था कि शहर में तो हमें कोई जानता भी नहीं। बस होली-दिवाली पर लोग इकट्ठे होते हैं, बाकी समय तो कोई किसी से नमस्ते तक नहीं करता।

शाम तक बुआ जी के घर में काफी मेहमान आ चुके थे। गर्मी के दिन थे, इसलिए सबके सोने का इंतजाम छत पर किया गया था। वहां बिस्तर बिछे थे और बड़े-बड़े पंखे लगे थे।

हम सब सात बजे तक खाना खाकर छत पर चले गए। नीचे आंगन में औरतें गीत गा रही थीं। यह सब मैंने पहली बार देखा था।

पापा ने बताया,

“बेटा, चार दिन बाद शादी है। तब तक ऐसे ही गीत गाए जाएंगे। हल्दी, मेहंदी और भात की रस्में होंगी। जो बीच में मंडप बना है, वहीं फेरे पड़ेंगे।”

मैंने आश्चर्य से पूछा,

“क्या शादी घर में ही हो जाएगी? बैंक्वेट हॉल नहीं जाएंगे?”

पापा ने कहा,

“हां बेटा, यहां शादी घरों में ही होती है। घर इतना बड़ा है कि सब काम यहीं हो जाते हैं। बारात को स्कूल में ठहराया जाता है।”

अगले दिन पापा शादी के कामों में व्यस्त हो गए। वहां मेरी उम्र के कुछ बच्चे थे। वे मुझे अपने साथ खेलने ले गए। उनके खेल मेरी समझ में नहीं आ रहे थे। मैं बस एक ओर खड़ा होकर उन्हें देखता रहा।

चार दिन बाद शादी का दिन आया। सब तैयार हो गए। बारात आई। दूल्हा-दुल्हन की जयमाला दरवाजे पर ही हो गई। फिर दावत शुरू हुई। मेज-कुर्सियों पर बैठकर पत्तलों में खाना परोसा जा रहा था। पापा भी सबको खाना परोसने में लगे हुए थे।

खाना खाने के बाद सब लोग मंडप के चारों ओर बैठ गए। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। मैं सुबह तक जागता रहा। मैंने पहली बार पूरी शादी देखी थी।

सुबह विदाई का समय आया। सबकी आंखें नम थीं। दुल्हन की विदाई के समय सभी रो रहे थे। विदाई के बाद लोग काम समेटने में लग गए और मैं जाकर सो गया।

दोपहर को भूख लगने पर मेरी आंख खुली। आंगन में जाकर देखा तो सब लोग खाना खा रहे थे। हमने भी खाना खाया। अगले दिन हमें वापस लौटना था।

रात को सब देर तक बातें करते रहे।

सुबह जब चलने का समय आया, तो बुआ जी भावुक होकर रोने लगीं। उन्होंने पापा से कहा,

“बेटा, कभी-कभी आ जाया कर। शादी में तुझसे ठीक से बात भी नहीं हो पाई।”

पापा उन्हें समझा रहे थे। बुआ जी ने ढेर सारी मिठाई और अन्य सामान गाड़ी में रखवा दिया। मुझे भी कपड़े और कुछ पैसे मिले।

हम घर की ओर चल पड़े।

आज कई साल बीत चुके हैं, लेकिन मैं उस शादी में बिताए सात दिनों को आज भी नहीं भूल पाया हूं। शहर की शादियां तो हम एक सप्ताह बाद ही भूल जाते हैं, लेकिन गांव की शादी की आत्मीयता और अपनापन मन में हमेशा बस जाता है।

आज भी मेरा मन करता है कि फिर कभी गांव की शादी देखूं। बुआ जी के जाने के बाद पापा कभी वहां जा ही नहीं पाए।

मैं भी अपने बच्चों को गांव ले जाना चाहता हूं। उन्हें अपने संस्कार देना चाहता हूं, हमारे पारंपरिक रीति-रिवाजों से परिचित कराना चाहता हूं, ताकि वे भी अपनी अगली पीढ़ी को बता सकें कि हमारी भारतीय संस्कृति में शादी-ब्याह केवल कोई इवेंट नहीं होते, बल्कि ईश्वर को साक्षी मानकर निभाया जाने वाला एक पवित्र संस्कार होते हैं।

रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी

स्थानीय सम्पादिका 

उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ 

बेंगलुरु

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 







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