मन की थाह

मन की थाह

होली का दिन था।

आँगन में रंगों की धूप उतर आई थी। हवा में अबीर की महक थी और ढोल की थाप पर पूरा मोहल्ला थिरक रहा था। रंग जैसे केवल देह पर नहीं, मन पर भी चढ़ रहे थे।

वह भी वहीं खड़ा था—भीड़ के बीच, पर अपने भीतर अकेला।

आज पहली बार उसने उसे इतने पास से देखा था।

वह अपनी ही धुन में मगन थी। गुलाबी साड़ी पर हल्का-सा अबीर, माथे पर चंचल मुस्कान, और आँखों में अनजाना विश्वास। वह झूम रही थी, नाच रही थी, जैसे होली उसके भीतर जन्मी हो। हर बार जब वह घूमती, उसके कंगनों की छनक जैसे उसके हृदय पर दस्तक देती।

वर्षों से वह उसे दूर से देखता आया था। उसके स्वभाव की सादगी, उसकी बातों की मिठास, उसकी हँसी की उजली रेखा—सब कुछ उसके लिए पूजा के समान था। उसने उसे कभी पाने की वस्तु नहीं समझा, बल्कि अपने मन-मंदिर में एक निर्मल छवि की तरह प्रतिष्ठित किया था।

उसके लिए वह केवल एक स्त्री नहीं थी—एक प्रेरणा थी, एक पवित्र भाव थी।

पर आज...

आज वह बहुत पास थी।

ढोल की थाप तेज हुई। रंगों की बौछार ने चारों ओर धुंध-सा रच दिया। उस धुंध में दूरी जैसे घुल गई। उसके हाथ में गुलाल था। वह हँसती हुई सबको रंग रही थी। अचानक वह उसके सामने आ खड़ी हुई—अनायास, सहज, बेख़बर।

“रंग नहीं लगाओगे?” उसने मुस्कुराकर कहा।

उसके हाथ काँप उठे। वह क्षण, जो अब तक कल्पनाओं में पवित्र था, वास्तविकता में सांस ले रहा था। उसके भीतर एक तूफ़ान उठा—भक्ति और चाह के बीच का संघर्ष।

उसने सोचा था, वह हमेशा उसकी मर्यादा का रक्षक रहेगा। पर उस क्षणिक आवेग में उसका मन डगमगा गया। उसने उसके गाल पर रंग लगा दिया—पर वह स्पर्श वैसा नहीं था जैसा होना चाहिए था। उसमें श्रद्धा की शीतलता नहीं, चाह की गर्मी थी।

वह क्षण छोटा था, पर उसके भीतर बहुत कुछ टूट गया।

वह ठिठक गई। उसकी मुस्कान में हल्की-सी असहजता उतर आई। उसकी आँखों में प्रश्न था—विश्वास का, मर्यादा का।

ढोल अब भी बज रहा था। लोग अब भी हँस रहे थे। पर उसके भीतर एक सन्नाटा फैल चुका था।

उसे लगा, उसने अपने ही मन-मंदिर की मूर्ति को खंडित कर दिया है। जिस छवि को उसने वर्षों से निर्मल रखा था, उसी पर उसने अपने क्षणिक भावों की धूल डाल दी।

वह अब भी वहीं खड़ी थी—पर अब वह उसके लिए केवल एक स्त्री नहीं, एक मौन दर्पण थी। उस दर्पण में उसे अपना ही चेहरा दिखाई दे रहा था—आवेग से भरा, पर पश्चाताप से झुका हुआ।

होली का रंग धीरे-धीरे फीका पड़ने लगा। लोग अपने-अपने घर लौट गए। आँगन में बिखरे रंग सूखने लगे।

वह अकेला बैठा रहा।

उसे समझ आया—प्रेम पूजा हो सकता है, पर यदि उसमें संयम न हो तो वही पूजा अपमान बन जाती है।

होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है; यह मर्यादाओं की भी परीक्षा है। रंग लगाने से पहले मन का शुद्ध होना ज़रूरी है।

उस दिन उसने सीखा—

किसी को मन में भगवान बनाना आसान है, पर उस भाव की पवित्रता को बनाए रखना कठिन।

वह अब भी उसके लिए आदरणीय थी, पर उसके अपने भीतर की मूर्ति टूट चुकी थी।

और शायद होली का यही सबसे गहरा रंग था—

जो देह पर नहीं, आत्मा पर चढ़कर सिखा जाता है कि प्रेम में अधिकार नहीं, आदर होना चाहिए।

रचनाकार


प्रमिला त्रिवेदी 

स्थानीय सम्पादिका 

उलझन सुलझन (लेडीज विंग)

बैंगलोर 
पाठ्य उन्नयन और विस्तार 



प्रस्तुति




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