आपसी प्रेम - सुलोचना धनावत

आपसी प्रेम

सुनील अपनी पत्नी और बेटी को लेकर गाँव से शहर आ गया। वहाँ उसे किराने की दुकान में नौकरी मिल गई। उसकी पत्नी घर से ही मसाले, बड़ियाँ, पापड़ वगैरह बनाकर बिक्री करने लगी। दो साल बाद सुनील ने नौकरी छोड़कर अपनी निजी दुकान खोल ली। पति-पत्नी दोनों मिलकर मेहनत करने लगे, जिससे उनके पास अच्छा धन जमा हो गया और उन्होंने एक छोटा-सा घर बना लिया।

गृहप्रवेश के अवसर पर उसने अपने भाई-भाभी को भी बुलाया। भाई ने उससे पूछा कि उसके पास इतना धन होने का कारण क्या है। सुनील ने अपनी मेहनत और लगन के बारे में बता दिया।

भाई-भाभी वापस गाँव आ गए, लेकिन भाई अंदर ही अंदर ईर्ष्या की आग में जल रहा था कि उसका छोटा भाई धनी हो गया है।

इधर, सुनील के मन में विचार आया कि क्यों न अपने भाई को भी अपने साथ मिलाकर काम किया जाए। उसने वैसा ही किया। जब दो के बदले चार हाथ मिलकर काम करने लगे, तो दिन-प्रतिदिन उनकी तरक्की होने लगी। बड़े भाई का दिल भी साफ हो गया और दोनों भाई आपसी प्रेम के लिए शहर में प्रसिद्ध हो गए।

सार :
प्रेम की राह हमेशा आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करती है।

सृजक

सुलोचना धनावत

स्थानीय सम्पादिका 

उलझन सुलझन लेडीज विंग 

नागपुर (महाराष्ट्र)

प्रस्तुति





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