दीप फिर जल उठे - विजया डालमिया

दीप फिर जल उठे 

भाग एक

“मम्मी, इसमें से पापा की खुशबू आ रही है।”

जैसे ही परी ने विवेक की आलमारी खोलते हुए यह बात कही, मेरी रुलाई फूट पड़ी। मैंने उसे लिपटाकर ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। मुझे इस तरह रोता देखकर वह घबरा गई।

“मम्मा, आपको क्या हुआ? मत रोओ न… प्लीज़, मम्मा… प्लीज़!”

छह साल की मासूम बच्ची, खुद रोते-रोते मुझे चुप करा रही थी। अपनी नन्हीं-नन्हीं उँगलियों से मेरे आँसू पोंछ रही थी। मैंने उसे ज़ोर से अपने सीने से भींच लिया और न जाने कितनी देर हम यूँ ही बैठे रहे—हम, यानी पिंकी और मैं, सुधा।

एक साल हो चुका था विवेक को हमारा साथ छोड़े हुए।

जाने वाले कभी नहीं पूछते, कुछ बताते भी नहीं। बस चुपचाप चले जाते हैं। वक्त किसी का गुलाम नहीं होता। वह तो अपनी मर्ज़ी से सबको चलाता रहता है। कब किसे अपना बना ले और कब किसे दूर कर दे—कोई नहीं जानता। बस समय सब जानता है। भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, उसकी परख उसी को होती है।

‘है’ से ‘थे’ तक का सफ़र ही ज़िंदगी है।

कितने खूबसूरत दिन थे वे!

मुझे अच्छे से याद है, जब विवेक ने मेरा घूँघट उठाया था और मुझे देखते ही रह गया था। फिर मेरी चूड़ियों की खनक से जैसे होश में आया और पहला वाक्य उसके मुँह से निकला था—

“माय गॉड! कितनी खूबसूरत हो तुम!”

और मैं बस शर्म से लाल हो गई थी। चूड़ियों की खनक जैसे कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई थी।

सुख के पल पंख लगाकर उड़ने लगे।

विवेक हमेशा कहते—

“सुधि, भगवान ने तुम्हें बहुत फुर्सत में बनाया है, यार!”

और मैं शादी के साल भर बाद भी उसी पहली रात की तरह शरमा जाती।

एक भी शाम ऐसी नहीं होती थी जब हम बाहर घूमने न जाते हों—कभी मोटरसाइकिल पर, तो कभी पैदल-पैदल। विवेक के साथ जब भी मैं कहीं जाती, मेरा चेहरा गुलाब की तरह खिल उठता और विवेक की नज़रें बस मुझ पर टिकी रहतीं।

उस दिन पार्टी में भी, जब कपल गेम में हम जीते थे, तो सबने हमें “मेड फॉर ईच अदर” कहकर बधाई दी थी। मुझे अच्छी तरह पता था कि अब जाते-जाते विवेक इसे भी अपने अंदाज़ में सेलिब्रेट करेगा—गजरे वाले से गजरा लेकर, पान के ठेले से पान खरीदकर और एक सिगरेट पीकर।

वैसे विवेक स्मोकिंग नहीं करता था, पर जब बेहद खुश होता तो उसे तलब होती थी। सच कहूँ, मुझे भी उसका यह अंदाज़ बहुत अच्छा लगता था।

उसे मोगरे और मेहँदी की खुशबू बहुत पसंद थी। साथ ही मेहँदी भरे हाथ और पान से रचे सुर्ख लाल होंठ भी। बड़ा रोमांटिक हो जाता था वह। ऐसे में कई गाने भी गुनगुनाने लगता, जिनमें एक उसका सदाबहार पसंदीदा गीत था—

“ना कजरे की धार, ना मोतियों के हार,

ना कोई किया सिंगार, फिर भी कितनी सुंदर हो…”

मैं मुस्कुरा देती।

फिर हमारी ज़िंदगी में परी, खुशियों की सौगात बनकर आई—हमारी दुनिया का सबसे खूबसूरत मोड़। विवेक तो उसे ‘परी’ ही कहता था। सच में, वह बेहद खूबसूरत थी।

वैसे तो हर माँ-बाप के लिए उनकी संतान दुनिया में सबसे सुंदर होती है, पर परी जितनी प्यारी बच्ची मैंने कहीं नहीं देखी थी।

विवेक कहता—

“बिल्कुल तुम पर गई है।”

और मैं हँसकर कहती—

“दिल तुम्हारे जैसा है।”

वह बिल्कुल अपने पापा की तरह चुलबुली थी। मोगरे की खुशबू और पान की लाली की दीवानी। बचपन से ही उसके बाल लंबे थे। मेरे गजरे में से छोटा-सा टुकड़ा उसे भी लगा देते, तो वह खुशी से नाचने लगती। पान खाते समय थोड़ा-सा टच करा देते, तो वह उसी में खुश हो जाती।

हमारी छोटी-सी दुनिया थी—जहाँ किसी और के आने की कोई गुंजाइश नहीं थी। लेकिन किसी के जाने की भी कहाँ थी!

मुझे अच्छी तरह याद है वह रात, जब बिजली जाने की वजह से मैं और परी बेहद परेशान थे। हमारी परेशानी देखकर विवेक ने कहा—

“चलो, बाहर घूमकर आते हैं।”

परी मचलकर बोली—

“आइसक्रीम भी खाएँगे, पापा!”

कुछ ही देर में हम मोटरसाइकिल पर हँसते-मुस्कुराते निकले थे। तभी न जाने कहाँ से एक कार तेज़ रफ्तार में आई और हम उछलकर गिर पड़े।

पीछे से आती ट्रक से हमें बचाने के लिए विवेक ने हमें ज़ोर से धक्का दे दिया और खुद…

वह दर्दनाक मंजर मुझे पत्थर-सा बना गया।

परी की आवाज़ भी मुझ तक नहीं पहुँच रही थी। न जाने भीड़ में कहाँ से हमारे एक परिचित निकल आए और उन्होंने स्थिति संभाली।

मैं और परी जैसे काठ की गुड़िया बन गए थे—बेजान।

दर्द का रंग बहुत पक्का होता है। आँसुओं से भी नहीं धुलता।

बस, अब परी के लिए ही जीना है—यह सोचकर मैंने खुद को संभाला और घर से निकलकर बाहर की दुनिया में कदम रखा, जहाँ विवेक हर कदम मेरे खयालों में मेरे साथ-साथ चलता, मुझे हिम्मत देता रहता।

मैंने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली।

भाग दो 

कुछ दिनों से मैं देख रही थी कि परी बेहद खुश रहने लगी थी। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक दिखाई देती।

एक दिन मैंने उससे पूछा—

“क्या बात है, बेटा? आजकल बहुत खुश रहती हो!”

वह मुस्कुराते हुए बोली—

“मम्मा, मेरे एक दोस्त अंकल हैं। बहुत अच्छे हैं।”

मैंने हल्की हैरानी से पूछा—

“अच्छा! कहाँ हैं तुम्हारे दोस्त अंकल? कभी घर पर भी बुलाओ उन्हें।”

परी ने खुशी से गर्दन हिला दी।

एक दिन अचानक मैंने देखा कि हमारे सामने वाला घर, जो काफी समय से खाली पड़ा था, उसमें हलचल दिखाई दे रही थी। रोशनी जगमगा रही थी। यूँ तो विवेक के जाने के बाद जैसे मेरी नज़रें दुनिया से हट-सी गई थीं, पर उस दिन उस घर की रौशनी ने मेरा ध्यान खींच लिया। जाने क्यों, वह उजाला मुझे अच्छा लगा।

तभी एक बात समझ में आई—कभी-कभी नज़रें उठाकर देखने से भी नज़ारे बदल जाते हैं।

दूसरे दिन से मैंने सात दिनों की छुट्टी ले रखी थी। सुबह उठकर आलस में यूँ ही बालकनी में बैठी थी कि अचानक सामने एक चेहरा दिखाई दिया।

उसे देखते ही मेरे मुँह से अनायास निकला—

“प्रेम… और यहाँ?”

उसे देखते ही मेरे मन का पंछी अतीत में छलाँग लगा बैठा। जैसे कल ही की तो बात हो।

प्रेम से पहली मुलाकात

प्रेम से मेरा मिलना भी एक इत्तेफ़ाक ही था।

कॉलेज में गेट-टुगेदर था। सभी अपने-अपने ग्रुप में मस्ती कर रहे थे और मैं हमेशा की तरह एक कोने की टेबल पर चुपचाप बैठी सबको देख रही थी।

अचानक एक लड़के के आते ही सब ज़ोर-ज़ोर से खुशी जताने लगे। मैंने सोचा—न जाने कौन है, जिसे मैं नहीं जानती।

जानती भी कैसे?

मैं तो बहनजी टाइप लड़कियों में आती थी—सीधी-सादी, चोटी गूँथी हुई। जहाँ मेरी सहेलियाँ नए-नए स्टाइल के कपड़े पहनतीं, मैं साधारण सलवार-सूट में ही खुश हो लेती।

खुशियाँ तो हमारी मुट्ठी में ही होती हैं—मुट्ठी खोलो और पा लो।

न किसी से ज़्यादा मिलना, न बात करना। कॉलेज में सब मुझे मज़ाक में ‘पढ़न्तु’ कहते थे।

जब भी किसी को नोट्स चाहिए होते, सब कहते—

“चलो, पढ़न्तु के पास चलो, नोट्स मिल जाएँगे।”

मैं चुपचाप सबकी बातें सुनती और प्रतिक्रिया में बस मुस्कुरा देती। शायद मेरी यही आदत लोगों को मेरे करीब ले आती थी।

हाँ, तो मैं बता रही थी कि वह लड़का अचानक माइक हाथ में लेकर गाना गाने लगा। उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि माहौल ही बदल गया। सब मस्ती में झूमने लगे।

वाकई उसकी आवाज़ बहुत अच्छी थी।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मैं घर जाने के लिए बाहर ऑटो का इंतज़ार कर रही थी। तभी वही लड़का मोटरसाइकिल पर मेरे सामने आकर रुका।

उसने गॉगल उतारा, मेरी तरफ देखा और कहा—

“चलिए, मैं आपको ड्रॉप कर देता हूँ।”

मैं असमंजस में उसे देखती रह गई।

वह मुस्कुराकर बोला—

“आपको खा नहीं जाऊँगा। रात काफी हो चुकी है।”

“मुझे पता है…” मैंने धीमे से कहा।

“तो फिर क्यों…?” उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी, ताकि मैं खुद फैसला कर सकूँ।

उसकी आँखों और बातों में मुझे सच्चाई नज़र आई। मैं सकुचाते हुए उसके पीछे बैठ गई।

उसने मोटरसाइकिल स्टार्ट की।

हम थोड़ी ही दूर पहुँचे थे कि अचानक बारिश शुरू हो गई। उसने गाड़ी की रफ्तार थोड़ी बढ़ा दी। तभी एक स्पीड ब्रेकर पर मोटरसाइकिल उछली और मैं भी असंतुलित होकर उससे टकरा गई।

एक अजीब-सी सिहरन मेरे पूरे बदन में दौड़ गई।

उसने तुरंत पूछा—

“आप ठीक तो हैं न?”

“जी…” मैंने संकोच से कहा।

बारिश और तेज़ हो चुकी थी। तभी सड़क किनारे एक चाय का ठेला दिखाई दिया। चाय की भीनी महक ने जैसे मन में तलब जगा दी।

मैं कुछ कहती, उससे पहले ही उसने गाड़ी रोक दी।

छोटे-से शेड के नीचे बैठकर गर्म चाय पीना उस बारिश में किसी सुकून से कम नहीं था। हम बारिश थमने का इंतज़ार करते हुए बेंच पर बैठ गए।

तभी पहली बार हमने एक-दूसरे की तरफ मुस्कुराकर देखा।

“मैं प्रेम… और आप?”

“मैं… सुधा।”

फिर हिम्मत करके मैंने कहा—।

“आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है।”

वह हल्का मुस्कुराया—

“अच्छा! आपने सुनी?”

मैंने गर्दन झुकाकर धीरे से हामी भर दी।

फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया।

उसने बताया कि वह अकेला है। गायन में रुचि होने के कारण उसने संगीत सीखा और अब वही उसका पेशा भी बन गया है।

“अब यही शौक मेरा पेट भी भरता हैc ।”

यह कहकर वह हँस पड़ा।

मैं खामोशी से उसे देखती रही—यह सोचते हुए कि कोई इतनी सहजता से अपने संघर्षों को भी मुस्कुराकर कैसे कह सकता है।

अचानक वह बोला—

“बोलने में और हँसने में इतनी कंजूसी क्यों?”

मैं झेंप गई और अपनी साड़ी के पल्लू से पानी निचोड़ने लगी।

उसने चाय वाले से कहा—

“एक कप चाय और देना।”

शायद उसने मेरी खामोशी को ही सहमति मान लिया था।

फिर उसने मेरे बारे में पूछा। मैंने संक्षेप में कहा—

“मैं भी आपकी तरह ही हूँ…”

“मतलब?”

“मतलब… अकेली। अनाथ आश्रम में पली-बढ़ी हूँ। अभी जिन्होंने मुझे गोद लिया है, उन्हीं के साथ रहती हूँ।”

मेरी बात सुनकर वह कुछ पल चुप रहा। शायद उसने मेरे अकेलेपन को महसूस कर लिया था।

फिर धीमे से बोला—

“अगर आपको ऐतराज़ न हो, तो क्या हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं?”

मैंने फिर वही मुस्कान देकर जवाब टाल दिया।

तब तक बारिश थम चुकी थी, लेकिन शायद हमारे दिलों में चाहतों की एक अनकही बारिश शुरू हो गई थी।

मैं तो मन ही मन चाह रही थी कि यह बारिश कभी थमे ही नहीं…

भाग तीन

मुझे घर छोड़ने के बाद उसने मुस्कुराते हुए कहा—

“प्रेम नाम है मेरा… याद तो रहेगा न?”

मैंने हमेशा की तरह गर्दन झुकाकर हल्का-सा सिर हिला दिया। उसकी नज़रों की तपिश मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। मैंने धीमे से “बाय” कहा और भीतर जाने लगी।

तभी उसकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी—

“मैं कल फिर आऊँगा।”

अगली सुबह सबके लिए सामान्य थी, पर मेरे लिए बहुत कुछ बदल चुका था। न चाहते हुए भी मैं प्रेम का इंतज़ार करने लगी। कॉलेज में भी मन नहीं लगा। हर वक्त उसकी बातें और उसकी नज़रों की तपिश मन में बनी रही।

शाम हुई।

बाहर मोटरसाइकिल की आवाज़ सुनते ही मैं लगभग दौड़ती हुई बाहर आई, लेकिन सामने जो था, वह प्रेम नहीं…

विवेक था।

वही विवेक, जो आगे चलकर मेरी ज़िंदगी का साथी बना—मगर अधूरा।

उसके बाद मैं प्रेम से कभी नहीं मिली।

समय अपनी रफ्तार से चलता रहा। मेरी ज़िंदगी में विवेक आया, प्यार आया, घर-परिवार आया और फिर परी के रूप में खुशियों का सबसे सुंदर उपहार भी। लेकिन कहीं मन के किसी कोने में, पहली बारिश की वह मुलाकात हल्की-सी याद बनकर रह गई थी।

आज अचानक सामने प्रेम को देखकर मन में अनगिनत भाव उमड़ने लगे थे।

मैं खुद को रोक नहीं पाई।

सोचा—पड़ोसी होने के नाते ही सही, मिल तो आऊँ।

खाली हाथ जाना मुझे अच्छा नहीं लगा। फटाफट मैंने प्रेम की पसंद के प्याज़ के भजिए बनाए, चाय तैयार की और परी को साथ लेकर थोड़ी ही देर में उसके घर पहुँच गई।

दरवाज़ा खुला।

हम आमने-सामने थे।

प्रेम ने मुस्कुराते हुए हाथ बढ़ाया और कहा—

“प्रेम नाम तो याद है न?”

मेरे चेहरे पर बरसों पुरानी वही मुस्कान लौट आई।

तभी उसकी नज़र परी पर पड़ी।

वह नीचे झुककर बोला—

“हैलो! मैं प्रेम हूँ।”

परी मासूमियत से बोली—

“आप मुझे प्रेम करोगे?”

उसकी बात सुनकर मैं अचंभित रह गई। एक अजनबी से ऐसा सवाल?

तभी मेरे सामने एक नया सच खुला।

प्रेम, परी से पहले भी कई बार मिल चुका था। वह मेरे बारे में सब कुछ जानता था।

मैंने जब शिकायती नज़रों से उसकी ओर देखा, तो वह धीमे स्वर में बोला—

“कुछ लगाव और चाहतें ऐसी होती हैं कि हाथों में हाथ भले ही न हों, फिर भी हम उनसे बंधे रहते हैं। मैं उसी रात तुमसे जुड़ गया था।”

मैं चुपचाप सुनती रही।

वह आगे बोला—

“दूसरे दिन मैं तुमसे मिलने आया भी था। लेकिन तभी विवेक मिला। वह मेरा जिगरी दोस्त था। उसने बताया कि तुम्हारा रिश्ता तय हो चुका है। उस दिन मैं एक कसक लेकर लौट गया।”

उसकी आवाज़ में वर्षों की टीस साफ सुनाई दे रही थी।

“दिल कहीं लग नहीं रहा था। इसलिए मैंने शहर छोड़ दिया। सोचा, नई जगह शायद सुकून दे दे। लेकिन कुछ रिश्ते जगह बदलने से नहीं बदलते।”

उसने हल्की मुस्कान के साथ आगे कहा—

“फिर कुछ समय पहले मुझे विवेक के बारे में पता चला। मैं वापस इसी शहर आ गया। यहीं मेरी मुलाकात परी से हुई। हमारी दोस्ती हो गई। उसी ने इस खाली घर के बारे में बताया।”

इतना कहकर उसने अपनी नज़रें मुझ पर टिका दीं।

कुछ पल की खामोशी के बाद उसने पूछा—

“मैंने… कोई गलती तो नहीं की न?”

इस बार मैंने गर्दन नहीं झुकाई।

उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“नहीं।”

तभी परी ताली बजाते हुए प्रेम के पास जाकर खड़ी हो गई।

मैंने माहौल हल्का करने के लिए कहा—

“चाय ठंडी हो गई।”

वह मुस्कुराया—

“कोई बात नहीं… गरम भजियों के साथ ठंडी चाय भी अच्छी लगती है।”

उस दिन न जाने कितने बरसों बाद मुझे लगा कि घर की दीवारों के भीतर कोई आवाज़ फिर से गूँजी है। जैसे लंबे समय से बंद खिड़की से हवा ने धीरे से दस्तक दी हो।

पाँच दिन बाद ही दिवाली थी।

दिवाली की सुबह से ही मैं बेहद उदास थी।

बार-बार मन में एक ही बात उठ रही थी—

“क्या दीप जलाएँ हम, तक़दीर ही काली है…”

विवेक के जाने से जो अँधेरा मेरे दिल और ज़िंदगी में पसरा था, वह जैसे आज उतरकर आँगन में भी फैल गया था।

मैं बीते दिनों की यादों में इस कदर खोई रही कि दिन कब ढल गया, पता ही नहीं चला।

तभी अचानक चारों ओर रोशनी फैल गई।

मैं चौंककर बाहर आई।

देखा—प्रेम और परी ढेर सारी मिठाइयाँ, पटाखे, आकाशदीप और कैंडल्स लिए खड़े थे।

परी की आँखें, जो लंबे समय से सूनी हो गई थीं, उनमें आज आशा के दीप जगमगाते दिखाई दे रहे थे।

मुझे न जाने क्या हुआ।

मैं एक छोटी बच्ची की तरह रोते हुए प्रेम के सीने से लग गई।

उसने मुझे और परी को अपने आगोश में भर लिया।

उस दिवाली…


खुशियों के दीप फिर से जल उठे।

समाप्त 

लेखिका

विजया डालमिया

राष्ट्रीय संयोजिका

उलझन सुलझन महिला लेखिका प्रकोष्ठ

हैदराबाद (तेलंगाना)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 












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