स्क्रीन के उस पार (लघुकथा)
स्क्रीन के उस पार
माया देवी कई महीनों से कैंसर से लड़ रही थीं। दर्द बढ़ता जा रहा था, लेकिन आँखों में एक ही इंतज़ार था—अपनी बेटी नंदिता का।
नंदिता अमेरिका में बस चुकी थी। जब उसे माँ की बीमारी का पता चला, उसने हर बार एक ही बात कही, “माँ, मैं आ रही हूँ... बस कुछ काम निपटा लूँ।”
दिन बीतते गए। काम खत्म नहीं हुए, बहाने खत्म नहीं हुए।
माया देवी अस्पताल के बिस्तर पर लेटी रहतीं और दरवाज़े की ओर देखती रहतीं। हर आहट पर लगता, शायद बेटी आ गई।
लेकिन दरवाज़ा कभी नहीं खुला।
एक दिन डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। परिवार ने नंदिता को फोन किया।
उधर से आवाज़ आई, “मैं अभी नहीं आ सकती। अगर... अगर कुछ हो जाए तो वीडियो कॉल पर दिखा देना।”
कुछ घंटों बाद माया देवी की साँसें थम गईं।
अंतिम संस्कार के समय मोबाइल एक तरफ रखा था। स्क्रीन पर नंदिता थी। उसने कुछ पल देखा, आँसू पोंछे और कॉल कट गई।
समय आगे बढ़ गया।
भारत कब आओगी?”
नंदिता ने सहज स्वर में कहा, “अब आकर क्या करूँगी? मम्मी तो हैं नहीं।”
यह वाक्य हवा में नहीं खोया।
कहा जाता है, आत्माएँ शब्द नहीं भूलतीं।
उस रात जैसे माया देवी की आत्मा अपनी पुरानी चौखट पर बैठी थी। वही घर, वही आँगन, वही यादें। उन्हें अपनी बेटी से शिकायत नहीं थी कि वह विदेश में थी। शिकायत यह भी नहीं थी कि उसके पास पैसे अधिक थे या कम।
दर्द केवल इतना था कि जीवन भर जिस बेटी के लिए उन्होंने अपनी इच्छाएँ छोड़ीं, उसके पास माँ के अंतिम दिनों के लिए समय नहीं था।
पैसा बुरा नहीं होता। पर जब पैसा इतना बड़ा हो जाए कि रिश्ते छोटे लगने लगें, तब घर मकान बन जाते हैं और लोग संपर्क सूची के नाम।
वर्षों बाद नंदिता भारत आई। माँ की तस्वीर पर माला चढ़ी थी। घर वैसा ही था, लेकिन अपनापन कहीं खो गया था।
तस्वीर के सामने खड़े होकर पहली बार उसे एहसास हुआ कि दुनिया का सबसे महँगा टिकट वह था, जो उसने कभी खरीदा ही नहीं—माँ के अंतिम दर्शन का।
उस दिन तस्वीर मुस्कुरा नहीं रही थी, पर जैसे एक मौन प्रश्न पूछ रही थी—
"जिस समय मेरी ज़रूरत थी, उस समय तुम्हारे पास क्या अधिक मूल्यवान था?"
कमरे में सन्नाटा था।
और कभी-कभी सन्नाटा ही सबसे कठोर उत्तर होता है।
रचनाकार
पुष्पा क्षेत्रपाल
अजमेर
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







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