माँ गणित में कमजोर होती हैं!
माँ गणित में कमजोर होती हैं!
“इस उम्र में भी इनकी डाइट तो देखो... एक बार में चार-चार रोटियाँ चाहिए खाने के लिए!”
इतना सुनना था कि उसकी माँ ने हल्की मुस्कान के साथ एक ऐसा वाक्य कहा, जिसने वातावरण को अचानक गंभीर संवेदना से भर दिया—
“हाँ बेटा, माँ गणित में कमजोर होती हैं... उन्हें गिनती नहीं आती।”
सुनंदा ने आश्चर्य से देखा। माँ कुछ पल रुकीं और फिर बोलीं—
“काश, माँ भी हिसाब रख पाती किसी चीज़ का...
नौ महीने की तकलीफ का हिसाब,
रातों की अधूरी नींद का हिसाब,
बच्चों की बीमारी में जागी दुआओं का हिसाब,
अपने हिस्से की इच्छाएँ छोड़ देने का हिसाब,
और सबसे बढ़कर, नि:स्वार्थ प्रेम का हिसाब...”
कमरे में कुछ पल के लिए मौन पसर गया।
सच ही तो है, माँ गणित में सचमुच कमजोर होती हैं। वे कभी यह नहीं गिनतीं कि उन्होंने कितना दिया और बदले में कितना पाया। वे यह भी नहीं सोचतीं कि किस बच्चे ने कितनी सेवा की, किसने कितनी उपेक्षा। उनके लिए प्रेम का कोई कैलकुलेशन नहीं होता। वे अपने हिस्से का सुख, समय, स्वास्थ्य और इच्छाएँ चुपचाप परिवार के नाम लिख देती हैं।
शायद इसी कारण माँ को समझने के लिए गणित नहीं, संवेदना चाहिए।
आज के समय में, जब रिश्तों में भी लाभ-हानि का हिसाब बढ़ता जा रहा है, यह प्रसंग हमें ठहरकर सोचने को विवश करता है कि जिन हाथों ने हमें थामकर चलना सिखाया, क्या हमने कभी उनके मौन त्यागों की कीमत समझने का प्रयास किया?
माँ सचमुच गिनती नहीं जानतीं—
क्योंकि वे प्रेम को जोड़ती हैं,
त्याग को घटाती नहीं,
और! अपने बच्चों की खुशियों को हमेशा स्वयं से गुणा कर देती हैं।
शायद इसीलिए संसार की सबसे बड़ी संपत्ति किसी बैंक में नहीं, माँ के हृदय में जमा होती है।
प्रस्तुति
विजया डालमिया
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति









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