तुम जो मिल गए तो - विजया डालमिया
तुम जो मिल गए तो...
भूमिका
कभी-कभी जीवन अपनी एकरस गति में इतना शांत, इतना व्यवस्थित हो जाता है कि मन उम्मीद करना ही छोड़ देता है। लगता है कि अब कोई नया रंग, कोई नई आहट, कोई अनकहा एहसास हमारी दुनिया में प्रवेश नहीं करेगा। पर तभी, बिना दस्तक दिए, कोई अजनबी जीवन के रास्ते में आकर ठहर जाता है—इतनी सहजता से कि हम समझ भी नहीं पाते कि वह एक मुलाकात थी, संयोग था या किसी अधूरी चाहत का उत्तर।
लेकिन क्या हर मुस्कान सच होती है? क्या हर अपनापन आत्मा से जुड़ा होता है? और क्या कभी-कभी कुछ लोग हमारे जीवन में केवल हमें हमारी अपनी कमी, हमारी अपनी प्यास और हमारी अपनी ताकत का एहसास कराने आते हैं? यह कहानी एक ऐसे ही अनकहे संबंध, अधूरी उम्मीद और मीठे भ्रम के टूटने की है, जो भीतर बहुत कुछ तोड़कर भी जीवन को एक नई समझ दे जाता है।
कहानी
तुम जो मिल गए तो
अपनी ही धुन में नीलू जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए मंदिर की ओर जा रही थी। पौ फट चुकी थी। हल्की लालिमा के साथ सुनहरी किरणें धरती पर बिखरने को आतुर थीं। मन में भक्ति-भाव और होठों पर भजन, नीलू को बेहद सौम्य बना रहे थे।
अचानक वह सामने आ खड़ा हुआ और फटाफट उसके कई फ़ोटो ले लिए। नीलू कुछ समझ पाती, उससे पहले ही वह कह उठा—
“प्लीज़, ज़रा अपना दुपट्टा भी हटा देना।”
वह तनिक झुँझलाकर बोली—
“क्यों?”
उसने प्यार भरी मुस्कान के साथ कहा—
“क्योंकि तू लाली है सवेरे वाली, गगन रंग दे तू मेरे मन का।”
कहते हुए उसने बड़े स्टाइल से उसका दुपट्टा चेहरे से हटा दिया। दुपट्टा हटते ही उसके लंबे सुनहरे बाल जैसे कैद से आज़ाद होकर लहराने लगे। नीलू बालों को सँभाल भी नहीं सकी, क्योंकि हाथ में पूजा की थाली थी, और वह इसका फायदा उठाकर लगातार तस्वीरें लिए जा रहा था।
नीलू जानती थी कि वह न तो बहुत खूबसूरत है, न ही अब उसकी उम्र ऐसी बातों से विचलित होने की रही है। फिर भी न जाने क्यों, उसे अच्छा लगा। हल्के क्रोध के साथ वह बोली—
“बड़े बदतमीज़ हो!”
पर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
“मेरा रास्ता छोड़ो।”
वह तुरंत एक ओर हट गया और मुस्कुराकर बोला—
“आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। आप बहुत अच्छी हैं। आपने तो आज मेरा दिन बना दिया।”
नीलू ने कुछ नहीं कहा। उसने बड़ी शालीनता से नीलू का दुपट्टा सिर पर उढ़ा दिया और उसके साथ-साथ चलने लगा।
नीलू ने उसे गौर से देखा—गले में मफलर, हाथ में कैमरा, लाइनिंग वाली टी-शर्ट, जींस और कैनवास के जूते। वह सचमुच बहुत जँच रहा था। बार-बार उसका मफलर और कैमरे से खेलना नीलू को अच्छा लग रहा था। वह रास्ते में पड़े छोटे-छोटे पत्थरों को जूतों से उछालकर इधर-उधर फेंक रहा था, बिल्कुल किसी बच्चे की तरह।
नीलू ने पूछा—
“आपका नाम?”
“नयन,” उसने संक्षेप में कहा।
“घूमने आए हो यहाँ?”
“हूँ…”
तभी मंदिर भी आ गया।
नीलू ने पूछा—
“दर्शन करने चलोगे?”
वह बोला—
“आप जाइए।”
नीलू रोज़ की तरह पूजा-आरती के बाद बाहर आई तो देखा, नयन सीढ़ियों पर ही बैठा था। वह आश्चर्य से उसे देखने लगी।
वह मासूमियत से बोला—
“मैं यहाँ बिल्कुल नया हूँ। आप मुझे अच्छी लगीं। मुझे यहाँ एक महीने का काम है। मेरे दिल ने कहा कि आप जैसी दोस्त कहीं नहीं मिलेगी। तो… क्या आपको मेरी दोस्ती कबूल है?”
न जाने क्या हुआ, नीलू ने सहज ही कह दिया—
“ओके।”
बस, तभी उसने फिर उसकी तस्वीरें ले लीं और बोला—
“पूजा की थाली, मंदिर की सीढ़ियाँ और आपके माथे का टीका… आपको बेहद खूबसूरत बना रहे हैं।”
अब तक नीलू इतना समझ चुकी थी कि यह शख्स बातों का जादूगर है। और अपनी तारीफ़ किसे अच्छी नहीं लगती?
नीलू और नयन साथ-साथ चलते रहे। घर आते ही नयन ने ठंड से सिकुड़ते हुए कहा—
“बड़ी ठंड है… अगर गरमा-गरम कॉफी मिल जाए तो?”
वह आशा भरी नज़रों से नीलू को देखने लगा।
नीलू हँस पड़ी—
“आ जाओ। पर कॉफी नहीं है। मेरे हाथों की गरमा-गरम चाय को ही कॉफी समझकर पी लेना। भूख भी लगी होगी?”
वह हल्की शर्म के साथ बोला—
“अरे नहीं! बस चाय, जो कॉफी के टेस्ट की होगी, वही मेरे लिए काफी है।”
चाय का पहला घूँट लेते ही वह बोला—
“वाह! क्या कॉफी है! आज तक ऐसी कॉफी नहीं पी… मज़ा आ गया!”
नीलू को उससे ऐसी ही उम्मीद थी, क्योंकि वह समझ चुकी थी कि उसे हर बात में तारीफ़ करने की आदत है। फिर भी, उसकी बातें भीतर कहीं मीठी गुदगुदी छोड़ रही थीं।
उसके जाने के बाद दिन में न जाने कितनी बार नीलू को उसकी बातें याद आईं। अनायास ही उसके होठों पर मुस्कान खिल जाती। वह सोचने लगी—
“आज तक किसी ने मेरी तारीफ़ नहीं की… क्या सचमुच मैं इस सबकी हकदार हूँ?”
अगले दिन मंदिर जाते समय भगवान के साथ-साथ नयन भी उसके मन में था। रास्ते भर उसकी नज़रें उसे तलाशती रहीं। पूजा-आरती के बाद बाहर निकलकर उसने उम्मीद भरी निगाहों से सीढ़ियों की ओर देखा, पर वह वहाँ नहीं था।
नीलू एक अनकहे खालीपन के साथ घर लौट आई।
इसी तरह सात-आठ दिन बीत गए।
फिर एक शाम, आँगन में चिप्स सुखाते हुए अचानक एक आवाज़ सुनाई दी—
“अरे! आप यह सब भी घर में ही बनाती हैं?”
नीलू चौंक गई। इतने दिनों बाद अचानक मिलने पर कोई इतना बेतकल्लुफ़ भी हो सकता है—न दुआ, न सलाम!
उसने हल्की नाराज़गी से पूछा—
“कहाँ गायब हो गए थे? नज़र ही नहीं आए!”
वह थोड़ा करीब आकर शरारती अंदाज़ में बोला—
“क्यों? आपने मुझे मिस किया?”
नीलू घबराकर बोली—
“नहीं-नहीं… मैं तो यूँ ही पूछ रही थी।”
वह मुस्कुराया—
“झूठ मत बोलो। आपकी आँखें बता रही हैं कि आपने मुझे मिस किया।”
नीलू ने भी मुस्कुराकर चुनौती दी—
“अच्छा? तो आपको आँखें पढ़नी भी आती हैं? बताओ, और क्या है मेरी आँखों में?”
नयन ने गहरी नज़रों से उसकी आँखों में झाँका और धीमे स्वर में कहा—
“मैं… और सिर्फ मैं।”
उसकी बातों में जैसे कोई अजीब-सा नशा था, जिसमें नीलू धीरे-धीरे डूबने लगी थी।
“और?” उसने धीरे से पूछा।
नयन मुस्कुराया—
“और… बेशुमार प्यार।”
यह सुनते ही नयन ने देखा—नीलू की आँखों में दो मोती-से आँसू चमक उठे थे।
वह घबरा गया—
“मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?”
नीलू ने सिर हिलाया—
“नहीं… पर तुम्हें नहीं पता, अनजाने में तुमने मुझे कितनी खुशियाँ दी हैं। शायद वही आँसू बनकर बह निकली हैं।”
वह खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगी और धीमे स्वर में बोली—
“छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारियों ने मुझे कभी अपने बारे में सोचने ही नहीं दिया। जब मेरी शादी की उम्र थी, तब मैं उनकी शादियाँ करवा रही थी… और अब… अब मेरी शादी की उम्र नहीं रही।”
तभी नयन पीछे से आया और उसे बाँहों में भरते हुए बोला—
“तुम जियो मुझमें मेरी तरह…मैं नदी की एक कतरा प्यास हूँ। आज फिर सहेज लाया हूँ एक सिंदूरी साँझ, सुरमई होने से पहले…सिर्फ तुम्हारे लिए।”
कुछ खामोश तनहाइयाँ दोनों के दरमियान बहती रहीं। वे देर तक यूँ ही बैठे रहे। कुछ पल ऐसे होते हैं, जो एहसासों से भी ऊपर होते हैं—जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और मन शून्य।
नयन ने धीरे से कहा—
“दर्द एकाकी नहीं है तुम्हारा… मैं हूँ न।”
नीलू ने मन ही मन सोचा—
“शायद सचमुच कोई ख़्वाब क्षितिज पर उगा है… और उम्मीद के परिंदे ने फिर एक उड़ान भरी है।”
धीरे-धीरे नीलू के दिन और रात सुनहरे होने लगे।
लेकिन आज दो दिन हो गए थे—नयन से मुलाकात नहीं हुई थी।
बेचैन होकर वह उस जगह पहुँच गई, जिसका पता नयन ने कभी दिया था। वहाँ उसने नयन को किसी से बात करते देखा। उसकी पीठ नीलू की ओर थी, इसलिए वह उसे देख नहीं पाया।
नीलू आगे बढ़ ही रही थी कि अचानक नयन की आवाज़ ने उसके कदम रोक दिए—
“अरे यार! मैं तो यहाँ एक नई स्टोरी की तलाश में आया था। रही बात नीलू की… तो उस अनपढ़, गंवार, जाहिल से भी भला प्यार हो सकता है? वह भी उम्र में मुझसे इतनी बड़ी! मेरे लिए तो खूबसूरत लड़कियों की लाइन लगी है।”
और फिर वह अपने उसी परिचित अंदाज़ में हँस पड़ा। किन्तु आज उसकी हँसी, नीलू के कानों में पिघलते सीसे की तरह उतर रही थी।
उस दिन पहली बार नीलू ने जाना—
पैरों के नीचे से ज़मीन कैसे खिसकती है। ज़िंदा जिस्म से जान कैसे निकलती है। बिना आँसू बहाए आँखें कैसे रोती हैं। और! दिल-दिमाग को तोड़ देने वाली बेचैनी कैसी होती है। आज एक उम्र बीत चली है उस घटना को। पर नीलू चाहकर भी उस फ़रेबी से नफ़रत नहीं कर पाई। वह कुछ पल, ज़िंदगी से बहुत कुछ लेकर भी गए और बहुत कुछ देकर भी।
आज भी, मंदिर जाते समय, कई बार उसे ऐसा आभास होता है—मानो कोई धीमे से कह रहा हो—“मैं हूँ न…”
समापन पंक्तियाँ
कल मिल गए थे कुछ पल
तुम्हारी मुस्कुराती आँखों में,
आज उन्हीं को सहेजकर
बिखेर दिया है धरा और अंबर के बीच मैंने।
रचनाकार









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