गुड़िया की हँसी (लघुकथा)

गुड़िया की हँसी

भूमिका

कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी उदासी को दूर करने के लिए किसी बड़े उपदेश की नहीं, बल्कि अपनत्व से भरे एक छोटे-से स्पर्श, मासूम संवाद और स्नेहिल मुस्कान की आवश्यकता होती है। बच्चों की निश्छल हँसी केवल उनके चेहरे की रौनक नहीं होती, बल्कि पूरे वातावरण को जीवंत कर देने वाली मधुर ध्वनि बन जाती है। पर जब वही हँसी कहीं खो जाए, तो संवेदनशील मन उसे खोजने निकल पड़ता है।

प्रख्यात साहित्यकार विजया डालमिया द्वारा रचित लघुकथा गुड़िया की हँसी ऐसी ही भावनात्मक अनुभूति का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है, जहाँ एक वृद्धा का स्नेहिल अपनापन एक बच्ची के मन का बोझ हल्का कर देता है। आखिर गुड़िया की हँसी कहाँ खो गई थी? और बसंती काकी ने उसे कैसे लौटा दिया? यही जिज्ञासा इस मार्मिक लघुकथा को अंत तक पढ़ने के लिए पाठकों को बाँधे रखती है।

लघुकथा

गुड़िया की हँसी

नीम के पेड़ के नीचे गुड़िया गुमसुम होकर  बैठी थी। बसंती काकी ने देखा आज उसकी आँखों में हँसी की जगह उदासी व आँसू थे। बसंती  काकी धीरे-धीरे उसके पास गई और कहा ..."अरे गुड़िया, तूने मेरा चश्मा कहीं देखा है क्या? मैं तो ढूंढ -ढूंढ कर थक गई। कहीं नहीं मिल रहा। गुड़िया ने नजर उठाकर काकी को देखा और फिर खी खी करके हँसने लगी। खड़ी होकर आँखों  को मटकाकर, हाथ नचा कर बोली... काकी, तुम भी ना पागल हो। यह देखो ...यह पहन तो रखा है चश्मा"।....अरे बिटिया मैं तो भूल ही गई। पर आज तू भी तेरी हँसी कहीं भूल आई है क्या? कहकर जैसे ही काकी ने गुड़िया के सर पर हाथ फिराया गुड़िया फिर से हँस पड़ी।

लघुकथा से मिलने वाली शिक्षा 

इस लघुकथा से शिक्षा मिलती है कि प्रेम, अपनत्व और संवेदनशील व्यवहार किसी भी दुखी मन को फिर से मुस्कुराना सिखा सकते हैं। बच्चों के मन को समझने के लिए डाँट या प्रश्नों से अधिक आवश्यक है स्नेह और आत्मीयता। कभी-कभी एक छोटा-सा हास्य, एक प्यारा संवाद और सिर पर रखा स्नेहिल हाथ भी किसी की खोई हुई खुशी लौटा सकता है।

रचयिता



Paathya






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