वादा - विजया डालमिया
वादा
भूमिका
कुछ रिश्ते जन्म से मिलते हैं और कुछ परिस्थितियाँ उन्हें जन्म देती हैं। समय के साथ इन रिश्तों का स्वरूप बदलता है, भावनाएँ बदलती हैं और मन की व्याख्याएँ भी बदल जाती हैं। किन्तु हर प्रेम का अर्थ केवल प्रेमी-प्रेमिका का संबंध नहीं होता। कभी-कभी स्नेह, संरक्षण, अपनापन और त्याग भी प्रेम के सबसे पवित्र रूप बनकर सामने आते हैं।
"वादा" ऐसी ही एक मार्मिक कहानी है, जिसमें भावनाओं की कोमलता, रिश्तों की गरिमा और आत्मसंयम का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह कथा बताती है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि दूसरे के सम्मान और सुख की रक्षा करने का नाम है। एक ऐसा वादा, जो बिछड़ने के बाद भी रिश्ते की पवित्रता को जीवनभर जीवित रखता है।
कहानी
"प्रेम, कहाँ हो तुम?"** कहते हुए प्रिया दनादन सीढ़ियाँ चढ़ गई। दूसरे माले पर प्रेम का कमरा था। जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ने की वजह से उसका गोरा चेहरा गुलाबी हो चला था। सफेद सलवार-सूट में वह मानो खिला हुआ गुलाब लग रही थी।
कमरे के बाहर कमर पर हाथ रखे वह एकटक प्रेम को निहार रही थी, जो अपने ही संसार में खोया कुछ लिख रहा था। उससे अधिक देर प्रतीक्षा नहीं हुई, तो उसने हल्के से गला खंखारा। तब भी प्रेम ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। तब उसने अपनी चूड़ियाँ खनकाईं।
प्रेम नज़रें उठाकर हल्के से मुस्कुराते हुए बोला—
"तुम्हारे साथ तुम्हारा गला, खाँसी और चूड़ियाँ—सब अंदर आ सकते हैं।"
यह सुनते ही प्रिया हँस पड़ी। वह अंदर आई, उसके पास एक कुर्सी खींचकर बैठ गई और बोली—
"कुछ नया लिख रहे हो क्या?"
"हाँ... ऐसे ही, बस।"
"ऐसे ही क्या? मुझे भी तो बताओ।"
यह कहते हुए वह उसकी डायरी में झाँकने लगी। प्रेम ने तुरंत डायरी बंद कर दी और कहा—
"अभी नहीं। हाँ, बोलो... क्या काम है?"
यह सुनते ही प्रिया रुआँसी होकर बोली—
"क्यों? मैं बिना किसी काम के नहीं आ सकती क्या?"
प्रेम ने फिर वही बेरुखी दिखाई।
"देखो प्रिया, मुझे अभी बहुत काम है। तुम जानती हो न, मेरी परीक्षा सिर पर है।"
इतना सुनते ही प्रिया की आँखें भर आईं। वह चुपचाप वहाँ से चली गई।
पिछले कई दिनों से वह प्रेम के इस बदले हुए व्यवहार को महसूस कर रही थी। फिर भी वह समझदार लड़की थी। उसने स्वयं को समझाया—
"सच ही तो है। उसके इम्तिहान बिल्कुल पास हैं। मुझे तो खुश होना चाहिए कि वह अपनी पढ़ाई और भविष्य को लेकर इतना गंभीर है।"
यह सोचते ही उसके होंठों पर फिर से मुस्कान लौट आई।
उधर, जैसे ही प्रिया वहाँ से गई, प्रेम की आँखें नम हो उठीं।
"उफ़... यह मैं क्या कर रहा हूँ? उस मासूम को सच बता क्यों नहीं देता? लेकिन मैं भी क्या करूँ... सही समय का इंतज़ार तो करना ही होगा।"
अब उसका मन लिखने में नहीं लग रहा था। वह यादों में खो गया।
उसे वह दिन याद आया, जब प्रिया अपनी सहेलियों के साथ बगीचे में आँख-मिचौली खेल रही थी। एकदम मासूम... खिलती हुई कली।
अचानक झाड़ियों में से एक साँप निकल आया। किसी को भी अंदाज़ा नहीं था कि अगले ही पल क्या होने वाला है।
प्रेम दौड़कर आया और उसने प्रिया को अपनी ओर खींच लिया। साँप लहराता हुआ दूसरी दिशा में निकल गया।
प्रिया की आँखों पर पट्टी बँधी हुई थी, इसलिए वह कुछ समझ नहीं पाई। लेकिन उस स्पर्श ने उसके मन की गहराइयों को छू लिया। किसी का पहला स्पर्श उसकी धड़कनों में उतर गया था। वह मासूम बच्ची की तरह प्रेम से लिपटी रही।
प्रेम ने उसकी आँखों से पट्टी हटाई और उसे धीरे से अपने से अलग करते हुए कहा—
"अगर अभी साँप काट लेता तो?"
प्रिया ने आँखें मटकाते हुए शरारत से कहा—
"क्या तुम साँप हो?"
यह सुनकर प्रेम हँस पड़ा। उसने उसके गाल पर प्यार से हल्की-सी चपत लगाई और बोला—
"बदमाश!"
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
दिन यूँ ही बीतते रहे।
मैं प्रिया से आठ वर्ष बड़ा था। बचपन में ही माता-पिता और अपनी छोटी बहन को खो चुका था। प्रिया की माँ दूर के रिश्ते में मेरी बुआ लगती थीं। वे ही मुझे अपने घर ले आई थीं।
प्रिया के विशाल घर में एक कमरा मेरे नाम का था। अपने नाम के अनुरूप मैं सबके साथ प्रेम और अपनत्व से रहता था। अंकल-आंटी भी मुझसे बहुत स्नेह करते थे।
और प्रिया...
उसके लिए तो मैं मानो जादुई छड़ी था। पढ़ाई की कोई समस्या हो, कहीं जाना हो या कोई जिद पूरी करवानी हो—उसे हर बार मेरी ही याद आती। मेरी कोई बात उसके मम्मी-पापा टालते नहीं थे और मेरी बात वह कभी टाल नहीं पाती थी।
एक बार जब प्रिया बहुत बीमार पड़ी, तब मैं ही था जो उसे समय पर दवा देता, खाना खिलाता और उसकी देखभाल करता रहा। कई दिनों तक मैंने उसकी सेवा की।
तब अंकल-आंटी अक्सर कहा करते—
"प्रेम, तुम न होते तो न जाने क्या होता!"
बगीचे वाली घटना के बाद से प्रिया में बहुत परिवर्तन आ गया था। वह अब पहले जैसी चंचल नहीं रही। उस एक स्पर्श ने उसके मन के किसी अनजाने कोने को झकझोर दिया था। अब जब भी वह मुझसे बातें करती, अचानक खामोश हो जाती और नज़रें झुका लेती। उसके व्यवहार में आया यह परिवर्तन मुझसे छिपा नहीं था।
अभी कुछ ही दिन पहले की बात है। अंकल और आंटी किसी काम से बाहर गए हुए थे। अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। तभी प्रिया मेरे कमरे में आई। बिना कुछ कहे उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींचते हुए छत पर ले गई।
वह बच्चों की-सी खुशी से आसमान की ओर देखते हुए बोली—
"देखो न... बारिश की बूँदें कितनी चमक रही हैं!"
इतना कहकर उसने अपने दोनों हाथ आगे फैला दिए और मेरे हाथों को भी अपने हाथों के साथ फैला लिया, मानो हम दोनों उन बूँदों को अपनी हथेलियों में कैद कर लेंगे।
मैं उसकी मासूम खुशी देख मुस्कुरा तो रहा था, लेकिन मन में चिंता भी थी। मैंने धीरे से समझाया—
"देखो प्रिया, ज़्यादा भीगोगी तो सर्दी लग जाएगी। चलो, अब अंदर चलते हैं।"
यह कहते हुए मैं उसे पकड़कर भीतर ले आया।
भीतर आते ही वह कुछ पल तक मुझे अपलक निहारती रही। उसकी आँखों में अनकहे भाव तैर रहे थे। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, वह अचानक मुझसे लिपट गई।
मैं एक पल के लिए हक्का-बक्का रह गया।
मैंने धीरे से उसे अपने से अलग किया और सहज स्वर में कहा—
"जाओ... पहले कपड़े बदल लो। फिर अदरक और काली मिर्च वाली गरम चाय बना लाना।"
वह बिना कुछ कहे मुस्कुराई और चली गई।
लेकिन उस दिन के बाद से मेरा मन बेहद अशांत रहने लगा। मैं स्वयं से ही लड़ रहा था। समझ नहीं पा रहा था कि उसे कैसे समझाऊँ? कैसे बताऊँ कि जिस भावना को वह प्रेम समझ रही है, उसका स्वरूप वैसा नहीं है जैसा वह सोच रही है।
मैं नहीं चाहता था कि उसकी कोमल भावनाओं को ठेस पहुँचे। उससे भी अधिक यह नहीं चाहता था कि वह स्वयं को कभी अपमानित या शर्मिंदा महसूस करे।
बहुत देर तक सोचने के बाद मैंने एक निर्णय लिया।
मैंने मेज़ पर रखी डायरी खोली, पेन उठाया और लिखना शुरू किया...
"प्यारी प्रिया,
जिस दिन से मैं इस घर में आया, उसी दिन से तुम सबका निष्छल और अथाह स्नेह मुझे मिला। तुमसे मैंने एक बार कहा भी था कि मेरे माता-पिता ने बड़े प्रेम से मेरा नाम 'प्रेम' रखा था। उनका विश्वास था कि मैं जहाँ भी जाऊँगा, लोगों के दिलों में प्रेम बनकर बस जाऊँगा।
एक बात मैंने तुमसे आज तक नहीं कही।
मेरी एक छोटी बहन भी थी। उसका नाम मैंने कभी तुम्हें नहीं बताया। जानती हो, उसका नाम क्या था?
प्रिया।
हाँ... उसका नाम भी प्रिया ही था।
जब मैं पहली बार इस घर में आया और तुम्हें देखा, तो एक क्षण के लिए मुझे लगा, जैसे मेरी वही नन्ही बहन मेरे सामने खड़ी हो। उसी पल तुम मेरे हृदय में मेरी छोटी बहन बनकर बस गईं।
मैंने हमेशा तुम्हें उसी स्नेह, उसी ममता और उसी अपनत्व से देखा, जैसा एक बड़ा भाई अपनी छोटी बहन को देखता है।
लेकिन पिछले कुछ समय से तुम्हारे व्यवहार में जो परिवर्तन आया है, उसने मुझे भीतर तक विचलित कर दिया है।
ऐसा नहीं है कि मैं तुम्हें सच बता नहीं सकता था। कई बार मन हुआ कि सब कुछ स्पष्ट कर दूँ। पर हर बार यही लगा कि कहीं मेरी बात सुनकर तुम स्वयं को अपराधी न मान बैठो। मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारी सहज मुस्कान कभी शर्मिंदगी में बदल जाए।
मुझे पूरा विश्वास है कि यह पत्र पढ़ते समय तुम्हारी आँखें नम होंगी। शायद तुम स्वयं को दोष भी दोगी।
लेकिन, मेरी प्यारी प्रिया, ऐसा कभी मत करना।
भावनाएँ कभी अपराध नहीं होतीं। वे तो बस मन की सहज अभिव्यक्ति होती हैं। परिस्थितियाँ ही उन्हें सही अर्थ देती हैं।
मैं तो हमेशा यही चाहता हूँ कि तुम पहले की तरह दनदनाती हुई मेरे कमरे में आओ, पूरे अधिकार से मुझे डाँटो, मुझसे बहस करो, मुझसे रूठो और फिर हँसते-हँसते सब भूल जाओ।
तुम्हारी झुकी हुई नज़रें मैं कभी नहीं देख सकता।
इसलिए यह पत्र लिखकर जा रहा हूँ।
जब तक तुम्हें यह पत्र मिलेगा, तब तक मैं इस घर से जा चुका होऊँगा।
घबराना मत...
मैं हमेशा के लिए नहीं जा रहा हूँ।
जिस दिन तुम दुल्हन बनोगी, उस दिन तुम्हें डोली में बैठाने के लिए तुम्हारा यह बड़ा भाई अवश्य आएगा।
यह मेरा वादा है।
तुम्हारा,
प्रेम"
पत्र पढ़ते-पढ़ते प्रिया की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली। हर शब्द उसके हृदय को भीतर तक भिगो रहा था। उसे लगा, जैसे उसके मन का सारा भ्रम एक ही क्षण में टूटकर बिखर गया हो।
जिस स्नेह को वह प्रेम का नाम दे बैठी थी, वह तो एक बड़े भाई का निस्वार्थ, निष्कलुष और पवित्र वात्सल्य था।
उसके हाथ काँप रहे थे। उसने पत्र को अपने सीने से लगा लिया। आँखें बंद कर लीं और फूट-फूटकर रो पड़ी।
आज उसे प्रेम की हर बेरुखी का कारण समझ में आ गया था। उसका हर मौन, हर दूरी और हर अनकहा व्यवहार अब उसके सामने स्पष्ट था। वह उसे ठुकरा नहीं रहा था, बल्कि उसके निष्कलुष मन और सम्मान की रक्षा कर रहा था।
उसकी स्मृतियों में प्रेम का स्नेहिल चेहरा बार-बार उभर रहा था—कभी उसकी बीमारी में सेवा करते हुए, कभी उसकी हर छोटी-बड़ी जिद पूरी करते हुए, तो कभी उसे साँप से बचाते हुए।
अब उन सभी स्मृतियों का अर्थ बदल चुका था।
प्रिया ने अपने आँसू पोंछे। होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। उसने पत्र को सावधानी से मोड़ा और अपनी डायरी में सहेज लिया।
धीरे से उसके होंठों पर शब्द आए—
"भैया... आपने सचमुच अपना वादा निभाया। आपने मुझे टूटने नहीं दिया, बल्कि रिश्तों की सबसे पवित्र परिभाषा सिखा दी।"
उसने आकाश की ओर देखा। मानो दूर कहीं प्रेम भी मुस्कुरा रहा हो।
कुछ वादे पूरे होने के लिए साथ रहना आवश्यक नहीं होता; वे विश्वास, त्याग और आत्मीयता की स्मृतियों में जीवन भर निभते रहते हैं।
कविता
लिखा कुछ आज, जो वक़्त का तकाज़ा है,
मेरे दिल का दर्द अभी ताज़ा-ताज़ा है।
गिर पड़ते हैं मेरे आँसू कुछ सोचकर,
लगता है, कलम में स्याही से भी ज़्यादा दर्द समाया है।
रचयिता
विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका, महिला लेखिका प्रकोष्ठ
उलझन सुलझन
हैदराबाद
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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