चीकू - विजया डालमिया

चीकू

चीकू आम के बगीचे में जाकर चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में आँसू और पीड़ा—दोनों ही साफ़ दिखाई दे रहे थे। जब भी घर में कोई उसे कुछ कह देता, वह मायूस होकर आम के उसी पेड़ के नीचे आ बैठता, जहाँ उसकी दादी उसे अक्सर लेकर आया करती थीं। पेड़ की पत्तियाँ मानो उसे सहला रही होतीं और उनकी छाँव में उसे असीम शीतलता मिलती थी।

अब शाम हो चली थी। थोड़ी ही देर में अँधेरा होने वाला था, पर चीकू को घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी। वह छोटा ज़रूर था, पर इतना समझता था कि घर पर कोई उसका इंतज़ार करने वाला नहीं है। हाँ, एक दादी ही थीं, जो उसे भरपूर लाड़-दुलार देती थीं। वे भी एक महीने पहले उसे छोड़कर भगवान के घर चली गई थीं।

दादी ने ही उसे बताया था कि उसके मम्मी-पापा भगवान के घर में रहते हैं और तारे बनकर चमकते हैं। तभी से जब भी वह छत पर जाता, तारों भरे आकाश में अपने मम्मी-पापा को ढूँढ़ने की कोशिश करता। जो तारा सबसे अधिक चमकदार दिखाई देता, उसे लगता कि वही उसके मम्मी-पापा हैं।

आज उसे दादी की बहुत याद आ रही थी। चाची के बच्चों ने उसे धक्का देकर गिरा दिया था। उसके मुँह से अनायास "माँ" शब्द निकल पड़ा। यह सुनते ही चाची ने ऐसी बात कह दी, जिसका अर्थ तो उसका बाल-मन पूरी तरह नहीं समझ पाया, लेकिन उनके चेहरे के भावों से बहुत कुछ समझ गया। दुखी होकर वह वहीं चला आया।

इन्हीं विचारों में खोए-खोए उसे नींद आ गई। सपने में दादी दिखाई दीं। उन्होंने उसे बहुत प्यार किया और स्नेह से कहा, "तू अकेला नहीं है। मेरे कान्हा जी हर पल, हर घड़ी तेरे साथ हैं।"

चीकू ने मासूमियत से कहा, "दादी, वे तो कुछ कहते ही नहीं। बस मुरली लिए, हाथ में लड्डू पकड़े, सज-धजकर बैठे रहते हैं।"

दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "नहीं बेटा, वे सब देखते हैं, सब समझते हैं। उन्होंने ही तो मुझे बताया कि आज चीकू बहुत उदास है। इसलिए मुझे तुम्हारे पास आना पड़ा।"

यह सुनकर चीकू की आँखें चमक उठीं।

"सच, दादी?"

"हाँ बेटा। और सुनो, अब जब भी तुम्हारे मन में कोई बात आए, उसे एक कागज़ पर लिखकर कान्हा जी के मंदिर में छिपाकर रख देना, ताकि कोई और उसे पढ़ न सके। अगले दिन उस कागज़ को फाड़कर फेंक देना। तुम्हारी हर सच्ची इच्छा वे अवश्य पूरी करेंगे। बस, तुम कभी उदास मत होना।"

इतने में उसे आवाज़ें सुनाई दीं—

"चीकू... चीकू... कहाँ हो तुम?"

उसने आँखें मलकर देखा। उसके चाचा, चचेरे भाई-बहन और घर के सभी लोग उसे ढूँढ़ रहे थे।

वह तुरंत उठकर बोला, "मैं यहाँ हूँ!"

चाचा ने दौड़कर उसे अपने कलेजे से लगा लिया। उस स्नेहिल स्पर्श को पाकर चीकू मन ही मन कह उठा—

"थैंक्यू, दादी... थैंक्यू, कान्हा जी!"

और फिर एक नई आशा, नए विश्वास और मुस्कान के साथ वह घर की ओर लौट पड़ा।

कहानी एक नज़र में

रचनाकार

विजया डालमिया

संपादक, मेरी निहारिका और राष्ट्रीय संयोजिका

उलझन सुलझन, महिला लेखिका प्रकोष्ठ

हैदराबाद

पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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