सुनो - विजया डालमिया
सुनो
भूमिका
कभी-कभी रिश्तों में सबसे अधिक महत्व शब्दों का नहीं, उनके पीछे छिपे भावों का होता है। एक छोटा-सा संबोधन—“सुनो”—किसी के लिए सामान्य पुकार हो सकती है, तो किसी के लिए अपनेपन का सबसे मधुर प्रमाण। लेकिन क्या केवल साथ होना ही पर्याप्त है, या किसी के मन के केंद्र में होना अधिक मायने रखता है? प्रस्तुत लघुकथा इसी सूक्ष्म भावभूमि को छूती है, जहाँ शिकायत के पीछे प्रेम छिपा है और एक सहज संवाद जीवन का गहरा अर्थ कह जाता है।
लघुकथा
सुनो…
“क्या सुनो… सुनो… करते रहते हो मुझे! नहीं सुननी तुम्हारी कोई बात।”
“क्यों..?”
“और नहीं तो क्या! ‘सुनो’ कहते हो और गायब हो जाते हो।”
“अरे? मैं तो वहीं तुम्हारे साथ…”
— “नहीं! तुम मेरे साथ नहीं… तुम मेरे पास हो!”
वह थोड़ी देर ठहरी, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“कृष्ण भगवान की तरह, जो सभी को एक दृष्टि से देखते हैं। सभी को समभाव से चाहते हैं। रासलीला करते वक्त हर गोपी के साथ होते हैं, लेकिन पास… वह सिर्फ राधा के होते हैं। सिर्फ राधा उनकी खास होती है। उनके केंद्र बिंदु में सिर्फ राधा होती है…”
यह कहते हुए उसके चेहरे पर असीम संतोष उतर आया। शिकायत कब आत्मीयता में बदल गई, पता ही नहीं चला। सामने खड़ा व्यक्ति भी समझ चुका था कि रिश्तों में दूरी कदमों की नहीं, भावों की होती है। कोई सबके साथ हो सकता है, पर *पास* वही होता है, जो हृदय के केंद्र में बसता है।
शिक्षा
रिश्तों की सच्ची ऊष्मा केवल साथ रहने में नहीं, बल्कि किसी के मन और संवेदनाओं के केंद्र में स्थान पाने में होती है। प्रेम वहाँ सबसे अधिक जीवित रहता है, जहाँ अपनापन शब्दों से नहीं, एहसासों से व्यक्त होता है।
लेखिका के प्रति कृतज्ञता भाव
ऐसी संवेदनशील और विचारोत्तेजक लघुकथाओं को पाठकों तक पहुँचाने के लिए उलझन सुलझन परिवार लेखिका के प्रति हृदय से कृतज्ञता भाव व्यक्त करता है। रचनाकार ने भावनाओं, संबंधों और जीवन मूल्यों को शब्दों के माध्यम से जीवंत बनाने का सराहनीय कार्य भी किया है।
रचनाकार
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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