इत्तफाक
इत्तफाक
भूमिका
कुछ मुलाकातें नियति लिखती हैं और कुछ संयोगों के बहाने जीवन में उतरती हैं। कभी एक छोटी-सी नाराज़गी किसी अनकहे रिश्ते की शुरुआत बन जाती है, तो कभी एक साधारण-सा इत्तफाक दिल के बंद दरवाज़ों पर दस्तक दे जाता है। यह कहानी भी ऐसे ही अनजाने मोड़ों, अधूरे एहसासों और उन भावनाओं की दास्तान है, जहाँ शब्द केवल पढ़े नहीं जाते, महसूस भी किए जाते हैं।
क्या सचमुच जीवन में घटने वाली हर घटना केवल संयोग होती है? या फिर कुछ रिश्ते पहले से कहीं लिखे जा चुके होते हैं, जिन्हें समय बस हमारे सामने ला खड़ा करता है?
आइए, पढ़ते हैं एक ऐसी कहानी—जो मुस्कुराती सुबह से शुरू होकर भावनाओं की गहराइयों तक उतरती है और अंत में एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाती है, जिसका उत्तर शायद दिल के पास हो, दिमाग के पास नहीं।
कहानी
"पर फड़फड़ाते हैं अरमानों के अल्फाज़ बनकर,
उतर जाते हैं पन्नों पर कोई कहानी बनकर।"
वह एक गुनगुनाती, मुस्कुराती सुबह थी। मैं कार से उतरकर अपनी धुन में आगे बढ़ रही थी। इतने में ही एक बाइक मेरे बगल से तेज़ी से निकली। सड़क पर थोड़ा कीचड़ था, जिसके छींटों ने मेरे कपड़े खराब कर दिए। मैंने चिढ़कर देखा, तब तक बाइक आगे बढ़ चुकी थी।
खैर, मुझे रोड क्रॉस करके सामने बुक शॉप में जाना था। मैं वहाँ पहुँची। देखा, दुकानदार भगवान की तस्वीर के सामने अगरबत्ती जला रहा था। शायद अभी-अभी वह भी पहुँचा था। मेरी आहट से वह पलटा और कुछ देर मुझे देखता ही रह गया। मुझे थोड़ा अजीब-सा लगा।
उसने तुरंत कहा, “सॉरी।”
मैं समझ नहीं पाई। मैंने कहा, “कोई बात नहीं, आप आराम से पूजा कर सकते हैं।”
वह बड़ी शालीनता से पूछने लगा, “कहिए, मैं आपकी क्या खिदमत कर सकता हूँ?”
मैंने कहा, “वह अभी कुछ दिनों पहले ही एक बुक पब्लिश हुई है न, जिसके लेखक हैं...”
मेरी बात पूरी सुनने से पहले ही उसने वह बुक मुझे थमा दी।
मैंने पैसे देने के लिए जैसे ही पर्स खोला, वह बड़ी नम्रता से हाथ जोड़कर बोला, “प्लीज़, रहने दीजिए।”
मैंने कुछ आश्चर्य से उसे देखा तो वह कहने लगा, “आज सुबह-सुबह मुझसे एक गलती हो गई है।”
मैं कुछ समझी नहीं, तो वह फिर बोला, “मैं आपसे माफी माँगता हूँ। दरअसल, कभी-कभी ऐसा हो जाता है।”
मैं अब भी कुछ समझ नहीं पा रही थी। तभी उसने बाहर खड़ी बाइक की ओर इशारा किया और खुद के कान पकड़ लिए। मैं सारी बात समझ गई।
मेरे होठों पर मुस्कुराहट आते ही उसने कहा, “कर दिया न अब आपने मुझे माफ?”
मैंने हँसते हुए कहा, “जी, दाग अच्छे हैं। इसीलिए अब आपको पैसे लेने होंगे।”
“ठीक है, पर एक शर्त है,” उसने कहा।
मैंने पूछा, “कहिए?”
वह बोला, “आज एक बुक मैं आपको अपनी तरफ से देना चाहता हूँ। इंकार मत करिएगा, और पढ़कर ज़रूर बताइएगा कि मेरी पसंद कैसी है।”
मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना ही उसने मुझे वह किताब थमा दी।
“कविताएँ? आपको कविताओं का शौक है?”
“जी, थोड़ा-बहुत,” कहकर उसने मेरी आँखों में देखा, फिर बोला—
“यूँ तो कविता और कहानी दोनों ही एक-दूसरे से जुड़ी हैं, पर कविता को आप गुनगुना भी सकते हो और कहानी एक एहसास बनकर हमारे दिल में उतर जाती है।”
मेरे इतना कहते ही वह खुश हो गया और बोला, “करेक्ट!”
मैंने कहा, “अब इजाज़त?”
वह मुस्कुराकर बोला, “फिर कब मिलोगी?”
मैंने सहजता से उत्तर दिया, “जल्दी ही... आपकी बुक लौटाने।”
और वहाँ से चली आई।
कार में बैठकर मैंने पहले उसकी कविता वाली बुक खोली। है न कितनी अजीब बात? पसंद मुझे कहानियाँ थीं, तभी तो खरीदने गई थी। पर उसकी दी हुई किताब खोलते समय अजीब-सी बेचैनी थी—देखूँ तो सही, क्या है इसमें?
सबसे पहली कविता थी—
“सर्द हवाओं का मंजर था,
तन्हाई का खंजर था।
बेइंतहा दर्द था
और उनकी यादों का लंगर था।”
यूँ तो मैं कविता ज़्यादा पसंद नहीं करती, पर न जाने क्यों ये पंक्तियाँ मुझे किसी के अकेलेपन का एहसास कराती चली गईं। मैंने धीरे-धीरे सारी कविताएँ पढ़ लीं। सोचने लगी—जिसने भी ये कविताएँ लिखी हैं, प्यारा तो है ही, पर तन्हा भी बेमिसाल है।
कवि का नाम सभी कविताओं में “शिव” लिखा हुआ था।
मैंने मन ही मन कहा—“वाह, शिव!”
एक दिन मेरे कदम फिर मुझे वहीं ले गए। जाकर देखा तो वहाँ वह नहीं था। एक बुज़ुर्ग बैठे थे। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि मैं उनसे किस तरह पूछूँ कि वह कहाँ है। कितना अटपटा सवाल होता यह! मुझे खुद पर कोफ्त होने लगी।
वे मुझे एकटक देख रहे थे। तभी उन्होंने पूछा, “बोलो बेटा?”
मैंने कहा, “जी, यह किताब मैं ले गई थी। वही लौटाने आई हूँ।”
“ओह! तो वह तुम हो। बैठो बेटा,” कहकर वे बोले, “शिव रोज़ मुझसे पूछता था—‘पापा, कोई मेरी बुक लौटाने आया क्या? अगर आए तो मुझे कॉल करके बुला लेना।’ दरअसल, हमेशा मैं ही यहाँ बैठता हूँ। उस दिन तबीयत ठीक नहीं होने की वजह से शिव बैठा था। कैसी लगी तुम्हें उसकी कविताएँ?”
ओह! तो वह खुद शिव है... यह सोचकर मैं अचानक चुप हो गई।
उन्होंने मुझे देखकर कहा, “ज़रूरी नहीं बेटा कि सबको सबका लिखा पसंद ही आए।”
यह सुनते ही मेरे मुँह से निकल गया, “अरे नहीं अंकल, बहुत अच्छा लिखा है उन्होंने।”
वे मुस्कुराए और बोले, “हाँ बेटा, मैं जानता हूँ। दर्द को शब्दों में ढालना जितना मुश्किल होता है, कविता उतनी ही बढ़िया बनती है।”
मैंने हैरानी से उन्हें देखा। उनकी आँखों में बेबसी आँसू बनकर चमक रही थी। मैंने उन्हें पढ़ने की कोशिश की।
वे कहने लगे—
“शिव हमारी इकलौती संतान है, जो बहुत मन्नतों के बाद हमें मिली। पर यह अपनी माँ के साए से जल्दी ही महरूम हो गया। हालाँकि मैंने उसे माँ की कमी कभी महसूस नहीं होने दी, फिर भी कभी-कभी वह उदास आँखों से मुझसे पूछता—‘माँ कहाँ चली गई, पापा?’”
“तो मैं उसे चमकते सितारे दिखाकर कहता—‘वह देखो ऊपर तारे... उनमें से एक तुम्हारी माँ है।’”
“और बाकी?”
पर उसका जवाब वह कभी सुनना ही नहीं चाहता था। बस पूछता और फिर चुप हो जाता।
“इतनी-सी उम्र में भी वह दूसरों की पीड़ा महसूस कर लेता था। फिर अचानक बात बदलकर पूछता—‘पापा, चाँद बहुत खूबसूरत है न?’ और मैं कहता—‘तेरे लिए ऐसी ही चाँद-सी दुल्हन लाऊँगा।’”
यह सुनकर वह जो भी समझता, तुरंत खिलखिलाकर हँस देता।
बचपन के दिन इसी तरह बीत गए। बड़ों को अक्सर यह एहसास देर से होता है कि बच्चे बड़े हो गए हैं, पर बच्चों को बहुत जल्दी यह समझ आ जाता है कि वे बड़े हो रहे हैं।
कॉलेज के दिनों में शिव की मुलाकात नंदा से हुई। वे दोनों बहुत तेजी से एक-दूसरे के करीब आ गए। मैं भी कई बार नंदा से मिला। मुझे भी वह बहुत पसंद आ गई थी। थी ही वह बेहद खूबसूरत...”
इतना कहकर उन्होंने मुझे देखा और बोले—
“बिल्कुल तुम्हारी तरह।”
उनकी नज़र कुछ पल मुझ पर ठहर गई।
मैंने धीरे से पूछा, “फिर?”
उन्होंने एक लंबी साँस ली।
“फिर कुछ दिनों से वह उदास-सा रहने लगा था। शिव, जो हर बात मुझसे शेयर करता था, अब छुपाने लगा था। पूछने पर कुछ नहीं कहता। बस ‘यूँ ही’ कहकर उठ जाता।”
“बात की तह तक पहुँचने के लिए मैं एक रोज़ नंदा के घर जा पहुँचा। दरवाज़ा खटखटाने पर अंदर से आवाज़ आई—‘खुला है, आ जाइए।’”
मैं जैसे ही दरवाज़ा खोलकर अंदर पहुँचा, सामने खड़ी महिला को देखकर ही समझ गया कि यह नंदा की माँ होंगी।
मुझे नमस्कार करते हुए वे बोलीं, “आइए भाई साहब।”
मैंने पूछा, “आप मुझे जानती हैं?”
“जी।”
“कैसे?”
वे हल्का मुस्कुराईं और बोलीं—
“वैसे ही, जैसे आप नंदा को जानते हैं।”
मैंने पूछा, “नंदा कहाँ है?”
उन्होंने अंदर कमरे की ओर इशारा कर दिया।
मैं जैसे ही वहाँ पहुँचा, मेरी आँखों को यकीन नहीं हुआ। यह वही नंदा थी, जो मुझसे मिलती रही थी? चेहरा मुरझाया हुआ, आँखें बुझी हुई...
मेरी आँखों में उमड़ते सवालों को देखकर उसकी माँ ने सूनी आँखों से उसकी ओर देखते हुए कहा—
“इसे कैंसर है... वह भी आख़िरी स्टेज पर।”
मैं धम्म से वहीं बैठ गया।
अब शिव की सारी परेशानी और उदासी समझ में आने लगी थी।
उसकी माँ ने मुझे पानी दिया और बोलीं—
“भगवान पता नहीं किस स्याही से मुकद्दर लिखता है, जो किसी-किसी के हिस्से सिर्फ आँखों का पानी आता है।”
मैंने भारी मन से कहा—
“जी बहनजी... मेरा शिव तो बचपन से ही बदनसीब रहा है।”
मैंने नंदा के सिर पर हाथ फेरा और वहाँ से चला आया।
घर जाकर देखा तो शिव शून्य में निहारते हुए खामोश बैठा था। जैसे ही मैं पहुँचा, वह बच्चे की तरह मुझसे लिपट गया—
“पापा, आप कहाँ चले गए थे? मैं कितना डर गया था!”
मैंने उसके आँसू पोंछे और कहा—
“मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।”
शायद वह एक सुकून भरा पल था, जब शिव ने अपनी सारी पीड़ा केवल अपने आँसुओं में मुझे बता दी।
कुछ ही समय बाद नंदा चल बसी।
हम बाप-बेटे फिर पहले की तरह अकेले हो गए।
वैसे तो दो लोग अकेले कैसे हो सकते हैं? फिर भी, दो लोगों के साथ होने के बावजूद भीतर से अकेले रह जाना ही शायद अकेलापन है।
एक दिन मैंने शिव को कुछ गुनगुनाते हुए सुना।
मैंने कहा, “बहुत सुंदर गीत है बेटा।”
उसने पूछा, “पापा, आपको अच्छा लगा?”
मेरे ‘हाँ’ कहने पर उसने अपनी कविताएँ मुझे दिखाईं। उनमें उसका पूरा दर्द मुझे दिखाई दे रहा था।
दुनिया के लिए वे सिर्फ कविताएँ थीं, पर मैंने उनमें उसकी तन्हाई, बेबसी और पीड़ा सब पढ़ ली।
फिर वही किताब, किताब के रूप में तुम्हारे सामने है।
“बताओ बेटा, कैसी लगी तुम्हें?”
मैंने अपनी आँखों में आए आँसुओं को पीते हुए कहा—
“बहुत अच्छी है, अंकल।”
तभी बाहर बाइक की आवाज़ सुनाई दी।
पलटकर देखा तो शिव चला आ रहा था।
“बेटा, तुम्हें तो मैंने फोन भी नहीं किया। फिर तुम कैसे?”
वह मुस्कुराकर बोला—
“अरे पापा, यहाँ से गुजर रहा था। इनकी गाड़ी दिखी तो चला आया।”
मैंने कहा—
“आपकी कविताएँ...”
वह पहले मुझे और फिर अपने पापा को हैरानी से देखने लगा।
तभी अंकल बोले—
“मैंने बता दिया है।”
“आप भी ना, पापा...” कहकर वह सिर खुजलाने लगा।
फिर उसने संकोच से पूछा—
“आपको पसंद आई मेरी कविता?”
मैंने हामी में सिर हिला दिया।
तभी उसके पापा बोले—
“मैं अभी आता हूँ।”
और वहाँ से चले गए। शायद वह हमें अकेले छोड़ना चाहते थे।
कुछ क्षणों की खामोशी के बाद शिव बोला—
“मेरा नाम तो आपको पता ही है। क्या मैं भी आपका नाम जान सकता हूँ?”
मैंने उसे गहरी नज़रों से देखा और कहा—
“जी... मैं नंदा।”
यह सुनते ही उसे जैसे झटका लगा।
वह धीमे स्वर में बोला—
“यह नहीं हो सकता...”
हालाँकि उसने यह अपने आप से बहुत धीरे कहा था, फिर भी मैंने सुन लिया।
मैंने कहा—
“नाम इत्तफाकन एक जैसे हो सकते हैं।”
वह हल्की मुस्कान के साथ बोला—
“जी, पर हर बात में इत्तफाक नहीं होता।”
इतना कहकर उसने एक फोटो मेरे सामने रख दी।
उसे देखकर मैं चौंक पड़ी, क्योंकि वह हूबहू मेरी हमशक्ल थी।
अब मेरे होंठ बुदबुदा उठे—
“ऐसा नहीं हो सकता...”
किसी खामोश कहानी की तरह रहता है,
दर्द हर आँख में पानी की तरह रहता है।
रचनाकार
विजया डालमिया
संपादक, मेरी निहारिका और
राष्ट्रीय संयोजक, उलझन सुलझन,
महिला लेखिका प्रकोष्ठ
हैदराबाद









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