प्रकृति के पुजारी - सुनिता मीना
प्रकृति के पुजारी
भूमिका
क्या कभी किसी इंसान का रिश्ता पेड़-पौधों से इतना गहरा हो सकता है कि लोग उसे उसी पहचान से पुकारने लगें? क्या प्रकृति के प्रति प्रेम केवल शब्दों तक सीमित होता है, या वह किसी के जीवन का उद्देश्य भी बन सकता है?
यह कहानी एक ऐसी संवेदनशील महिला की है, जिसने अपने जीवन के खालीपन को प्रकृति के सान्निध्य में भरने का प्रयास किया। उसका पेड़ों से प्रेम केवल लगाव नहीं था, बल्कि एक ऐसा समर्पण था जिसने पूरे क्षेत्र की सोच बदल दी। आखिर कैसे एक साधारण ग्रामीण महिला लोगों के बीच *‘पेड़ों वाली माई’* के नाम से प्रसिद्ध हुई? और किस प्रकार उसके प्रेम ने एक आंदोलन का रूप ले लिया? इन प्रश्नों के उत्तर समेटे यह कहानी पाठकों को प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
कहानी
प्रकृति के पुजारी
बहुत समय पहले की बात है। आज़मगढ़ में एक किसान परिवार रहता था। परिवार में पति-पत्नी—धनवंत और सुगंधा—रहते थे।
दोनों खेती-बाड़ी करते और अपने जानवरों के साथ बहुत ही सुखद तथा सुकूनभरा जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनके जीवन में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, परंतु एक दुःख ऐसा था, जो उनके मन को भीतर तक उदास कर देता था—उनकी कोई संतान नहीं थी। जब कभी दोनों पति-पत्नी फुर्सत के क्षणों में साथ बैठते, यह पीड़ा उनके मन पर और अधिक हावी हो जाती।
समय बीतता गया। सुगंधा अत्यंत भावुक तथा अथाह दया और प्रेम से भरे हृदय वाली महिला थी। वह अपना स्नेह अपने जानवरों और उनके बछड़ों पर लुटाती, उनसे बातें करती और उन्हें दुलारती।
इसके अतिरिक्त, सुगंधा को पेड़-पौधों से भी अत्यधिक लगाव था। वह उन्हें अपना साथी मानती थी। उसका विश्वास था कि पेड़-पौधे भी हमारी ही तरह सजीव होते हैं, साँस लेते हैं और प्रेम की भाषा को समझते हैं।
उसने अपने घर के आसपास अनेक पेड़-पौधे लगा रखे थे। घर और खेत के कार्यों से निवृत्त होने के बाद भी वह अपनी बगिया के लिए समय अवश्य निकालती। वह पौधों को पानी देती, उनका ध्यान रखती, उनसे बातें करती। यह समय उसके जीवन का सबसे खुशनुमा पल बन चुका था।
धीरे-धीरे प्रकृति के प्रति उसका प्रेम और लगाव और भी प्रगाढ़ होता चला गया। अब वह अपने आसपास के लोगों को भी पेड़ों के महत्व के बारे में बताने लगी। उसकी बातें सबको बहुत रोचक और प्रेरणादायक लगतीं। देखते ही देखते आसपास के क्षेत्रों में लोग उसे ‘पेड़ों वाली माई’ के नाम से जानने लगे।
जहाँ कहीं भी वृक्षों की अवैध कटाई होती, लोग तुरंत सुगंधा को सूचना देते। वह लोगों को एकजुट करती और सभी मिलकर इसका विरोध करते।
सुगंधा के रग-रग में प्रकृति प्रेम बसा था। जब भी वह किसी पेड़ को कटते देखती, तो फूट-फूटकर रो पड़ती। वह उस पीड़ा और विषाद से स्वयं को सहजता से उबार नहीं पाती थी।
अपने जीवनदाताओं—पेड़-पौधों—के प्रति उसके समर्पण को देखकर अनेक प्रकृति प्रेमी उससे जुड़ते चले गए। धीरे-धीरे सुगंधा के नेतृत्व में एक समूह का गठन हुआ, जिसका नाम रखा गया—‘प्रकृति के पुजारी’।
सुगंधा ने प्रकृति से जो कुछ पाया था, उसका थोड़ा-सा अंश लौटाने का प्रयास किया। उसने यह सिद्ध कर दिया कि यदि मन में सच्ची संवेदना हो, तो एक छोटा-सा प्रयास भी समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
आज आवश्यकता है कि हम भी धरती माँ के प्रति अपने छोटे-छोटे दायित्व निभाएँ। पेड़ लगाकर, पर्यावरण की रक्षा करके और प्रकृति का सम्मान करके हम न केवल एक जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं, बल्कि आत्मसंतुष्टि और सुकून भी प्राप्त कर सकते हैं—वह सुकून, जो सचमुच अनमोल है।
कहानी से शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रकृति केवल हमारे उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे जीवन की आधारशिला है। यदि हम पेड़-पौधों और पर्यावरण की रक्षा करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और सुंदर संसार मिल सकेगा। छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव का कारण बन सकते हैं। प्रकृति के प्रति प्रेम, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी ही सच्ची मानवता का परिचय है।
रचनाकार








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